रविवार, 28 फ़रवरी 2021

जीवन में इतना दुख क्यों है ? - ओशो

Why-is-Osho-so-sad-in-life


मेरे प्रिय,

    प्रेम।

        मनुष्य के जीवन में इतना दुख क्यों है? क्योंकि, उसके जीवन में स्वरों की तो भीड़ है, लेकिन, स्वर शून्यता बिलकुल नहीं है। क्योंकि, उसके जीवन में विचारों का शोर-गुल तो बहुत है, लेकिन, निर्विचार का मौन बिलकुल नहीं है। क्योंकि, उसके जीवन में भावनाओं का क्षोभ तो वहुत है, लेकिन, निर्भाव की समता बिलकुल नहीं है। क्योंकि, अदिशा में ठहराव बिलकूल नहीं है। और, अंतत: क्योंकि, उसके जीवन में वह तो अतिशय है, लेकिन परमात्मा विलकुल नहीं है। 


रजनीश के प्रणाम
१-४-१९७० प्रति : श्री शिव, जबलपुर

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

समर्पण के अतिरिक्त उसका और कोई द्वार नहीं - ओशो

 

There-is-no-other-door-except-dedication-Osho

प्यारी सावित्री, 

    प्रेम। 

        ध्यान में फलाकांक्षा न रखो। उससे वाधाएं निर्मित होती हैं। ध्यान के किसी अनुभव की पूनरुक्ति भी न चाहो । उससे अकारण ही विध्न होता है। बस, ध्यान में ध्यान के अतिरिक्त और कुछ भी न हो, इसका ध्यान रखो। फिर शेष सब अपने आप ही हो जाता है। प्रभु के हाथों में छोड़ो स्वयं को। अनंत की यात्रा अपने ही हाथों से होनी असंभव है। समर्पण-समर्पण समर्पण। समर्पण को स्मरण रखो। सोते-जागते, सदा ही। समर्पण के अतिरिक्त उसका और कोई द्वार नहीं है। शून्य के अतिरिक्त उसकी और कोई नाव नहीं है। 


रजनीश के प्रणाम
१७-११-१९७० प्रति : डा. सावित्री सी. पटेल, मोहनलाल डी. प्रसूतिगृह, पोस्ट किल्ला पारडी, बुलसार , गुजरात

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

आंखें खोलो और देखो - ओशो

 

Open-your-eyes-and-see-Osho

 प्यारी कुसुम, 

    प्रेम। 

        संसार है निर्वाण। ध्वनि मात्र है मंत्र। और, प्राणि मात्र परमात्मा । बस, सब कुछ स्वयं की दृष्टि पर निर्भर है। दृष्टि के अतिरिक्त सृष्टि और कुछ भी नहीं है। देखो-आंखों खोलो और देखो। अंधकार कहां है? आलोक ही है। मृत्यु कहां है? अमृतत्व ही है। कपिल को प्रेम। असंग को आशीष। +


रजनीश के प्रणाम
१७-११-१९७० प्रति : सुश्री कुसुम , द्वारा श्री कपिल मोहन चांघोक, ९० ए, इंडस्ट्रियल एरिया, क्वा लटी आइसक्रीम कंपनी, ओसवाल रोड, लुधियाना, पंजाव

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

जहां शिकायत नहीं है, वहीं प्रार्थना है - ओशो

Where-there-is-no-complaint-there-is-prayer-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        स्व को समर्पित करने के बाद न कोई कष्ट है, न कोई दुख है। क्योंकि, मूलतः स्व ही समस्त दुखों का आधार हैं। और फिर जिस क्षण से जाना जाता है कि प्रभू ही सब कुछ है, इसी क्षण से शिकायत का उपाय नहीं रह जाता है। और जहां शिकायत नहीं है, वहीं प्रार्थना है। वहीं अनूग्रह का भाव है। वहीं आस्तिकता है।

        और इस आस्तिकता में ही उसका प्रसाद बरसता है। बनो आस्तिक और जानो। लेकिन आस्तिक बनना सर्वाधिक कठिन है। जीवन को उसकी समग्रता में स्वीकार करने से बड़ी और कोई तपश्चर्या नहीं है। 


रजनीश के प्रणाम
१६-११-१९७० प्रति। : श्री सरदारी लाल सहगल, न्यू मिश्री बाजार, अमृतसर, पंजाब

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

जीवन को नृत्य बना - ओशो

Make-life-dance-Osho


प्यारी नीलम, प्रेम। 

        जीवन का प्रयोजन न खोज। वरन जी-पूरे हृदय से। जीवन को गंभीरता मत बना। नृत्य बना। सागर की लहरें जैसे नाचती हैं, ऐसे ही नाच । फूल जैसे खिलते हैं, ऐसे ही खिल। पक्षी जैसे गीत गाते हैं, ऐसे ही गा। निष्प्रयोजन-अकारण। और फिर सब प्रयोजन प्रकट हो जाता है। और फिर सब रहस्य अनावृत्त हो जाते हैं।

        प्रसिद्ध आस्ट्रिन चिकित्सक रोकिटान्सकी ने एक बार किसी विद्यार्थी से पूछा : जीवन का प्रयोजन क्या है। जीवन का अर्थ क्या है? वह विद्यार्थी एक क्षण लड़खड़ाया और फिर कुछ याद करता सा बोला : महोदय! कल तक मुझे याद था, लेकिन अभी मैं विलकुल ही याद नहीं कर पा रहा हूं। रोकिटान्सकी ने आकाश की ओर देखकर कहा : हे परमात्मा! एक ही व्यक्ति को तो केवल पता था और वह भी भूल गया है। परिवार में सव को प्रेम 


रजनीश के प्रणाम
१६-११-७०

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

पहले खोजो प्रभू का राज्य - ओशो

First-find-the-kingdom-of-God-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        प्रभु का काम ही मेरा काम है। उसके अतिरिक्त न मैं हूं, न कुछ मेरा है, और न कोई काम ही है। प्रभु में जियो-बस, फिर शेष सब अपने आप ही हो जाते है। जीसस ने कहा है : “थपतेज दम एममा म ज्ञपदहकवउ ठा फवक, मद :सस झसेम रू पसस ईम :ककमक नदजव द्दवन." (पहले खोजो प्रभु का राज्य; और फिर शेष सब अपने आप ही आ जाता है। यही मैं भी कहता हूं लेकिन, मनुष्य का मन पहले और सब कुछ खोजता है। फिर वही होता है, जो हो सकता है। और कुछ तो मिलता ही नहीं-विपरीत, पास जो होता है, वह भी खो जाता है। 


रजनीश के प्रणाम
१६-११-१९७० प्रति : श्री केदार सिंहल, श्री रामकृष्ण सेवा मिशन, ३१९, घंटाघर, नीमच, म. प्र.

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

प्राणों के गीत - ओशो

Songs-of-life-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        सुबह सूर्योदय के स्वागत में जैसे पक्षी गीत गाते हैं ऐसे ही ध्यानोदय के पूर्व भी मन प्राण में अनेक गीतों का जन्म होता है। वसंत में जैसे फूल खिलते हैं, ऐसे ही ध्यान के आगमन पर अनेक-अनेक सुगंधे आत्मा को घेर लेती हैं। और वर्षा में जैसे सब ओर हरियाली छा जाती हैं, ऐसे ही ध्यान की वर्षा में भी चेत ना नाना रंगों से भर उठती है। यह सब और बहुत कुछ भी होता है। लेकिन, यह अंत नहीं, बस आरंभ ही है। अंततः तो सब खो जाता है। रंग, गंध, आलोक, नाद-सभी विलीन हो जाते हैं। आकाश जैसा अंतआकाश (टददमत चंवम) उदित होता है। शून्य, निर्गुण, निराकार। उसकी करो प्रतीक्षा, उसकी करो अभीप्सा। लक्षण शुभ हैं, इसलिए एक क्षण भी व्यर्थ न खोओ और आगे बढ़ो, मैं तो साथ हूं ही


रजनीश के प्रणाम
१६-११-१९७० प्रति : श्री राजेंद्र आर. अंजारिया, बाम्बे ब्लाक्स, मणिनगर, अहमदावाद

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

वाणी रहित, मांग रहित स्वयं का समर्पण - ओशो

 

Voiceless-Demandless-Surrender-Osho

प्रिय, ललिता, प्रेम। 

        प्राण जिसे खोजते हैं, उसे पा ही लेते हैं। विचार ही सघन होकर वस्तु बन जाते हैं।सरिता जैसे सागर खोज लेती है, ऐसे ही प्यासे प्राणों को प्रभु का मंदिर भी मिल जा ता है। वस प्रवल प्यास चाहिए। बस अथक संकल्प चाहिए। बस अनंत प्रतीक्षा चाहिए। बस पूर्ण पुकार चाहिए। और यह सव-प्यास, संकल्प, प्रतीक्षा, पुकार-एक छोटे से शब्द में समा जाता है। वह शब्द है-प्रार्थना। किंतु, प्रार्थना की नहीं जाती है। वह कृत्य नहीं है। उसमें तो हुआ जाता है। वह भाव है। वह आत्मा है। वह मूक-वाणी रहित, मांग रहित स्वयं का समर्पण है। छोड़ दो स्वयं को अज्ञात के हाथों में। और जो हों उसे स्वीकारो। वह बनाए तो बनो। वह मिटाए तो मिटो। 


रजनीश के प्रणाम
१२-११-१९७० प्रति : कुमारी ललिता राठोर, चंद्रावतीगंज, फतेहाबाद म. प्र.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

खोजो मत-खाओ - ओशो

Find-Do-Eat-Osho


प्रिय सत्यानंद, प्रेम। 

        मेरे शुभाशीष। सत्य में जियो-क्योंकि सत्य को जानने का कोई उपाय नहीं है। सत्य ही हो जाओ-क्योंकि सत्य केवल सत्य होकर ही जाना जा सकता है। शब्द से सत्य नहीं मिलता है। न शास्त्र से। न चिंतन, अध्ययन या मनन से ही। सत्य है स्वयं में स्वयं की शून्यता में। निर्विचार में, निर्विषय चित्त में। चेतना ही है जहां केवल वहीं सत्य का उदघाटन है। सत्य तो है ही। उसे पाना नहीं है। वस, अनावृत ही करना है। और वह जिस स्वर्ण पात्र से ढंका है, वह हमारा ही अहंकार है। अहंकार है अंधकार। मिटो और आलोक हो जाओ। और जहां अहंकार का अंधकार नहीं है, वहीं उस शून्यलोक में सत्य है। वही सत्य है। वही आनंद है। वही अमृत है। उसे खोज मत-वरन उसके लिए खो जाओ और उसे पा लो 

रजनीश के प्रणाम
१२-११-१९७० प्रति : योग सत्यानंद, टीकमगढ़ (म. प्र.)

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

विचारों की चरम सीमा - ओशो

 

Extremes-of-thoughts-Osho

 मेरे प्रिय, प्रेम। 

        विचार ही मनुष्य की शक्ति है। और वही विश्वास ने उससे छीन ली है। मनुष्य इसीलिए दीन-हीन और निर्वीर्य हो गया है। खूव विचार करो। अथक विचार करो। और आश्चर्य तो यह है कि विचारों की चरम सीमा पर ही निर्विचार दशा उपलब्ध ह ती हैं। वह विचार की पूर्णता है। और इसलिए उस दशा में विचार भी व्यर्थ सिद्ध होता हैं। उस शून्य में ही सत्य होता है। 


रजनीश के प्रणाम
प्रति : श्री प्रेमशंकर पांडे, मनमाड़ (महाराष्ट्र)

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

प्रेम की आग - ओशो

Fire-of-love-osho


प्रिय जयति, प्रेम। 

        प्रभु सब भांति निखारता है। शुद्ध होने के लिए, स्वर्ण को ही नहीं, मनुष्य को भी अग्नि में से गुजरना पड़ता है। प्रेम की पीड़ा ही मनुष्य के लिए अग्नि है। और, सौभाग्य से ही प्रेम की आग मनुष्य के जीवन में उतरती है। जन्म-जन्म की अनंत प्रार्थनाओं का वह फल है। सघन हो गई प्यास ही अंततः प्रेम बनती है। लेकिन, बहुत कम हैं जो कि उसका स्वागत कर पाते हैं। क्योंकि, वहुत कम हैं जो कि प्रेम को पीड़ा के रूप में पहचान पाते हैं। प्रेम सिंहासन नहीं, सूली है। यद्यपि जो उस सूली पर हंसते हुए चढ़ते हैं, वे सिंहासन को उपलब्ध हो जाते हैं। सूली तो दिखाई पड़ती है, सिंहासन दिखाई नहीं पड़ता है। वह सदा सूली की ओट में छिपा होता है। एक क्षण को तो जीसस तक से भूल हो गई थी। उनके प्राणों तक से निकल गया था : हे परमात्मा! यह क्या दिखला रहा है? लेकिन, नहीं फिर उन्हें तत्काल ही स्मरण आ गया और उन्होंने कहा था : जो तेरी मर्जी! बस फिर तो सूली सिंहासन हो गई थी और मृत्यु नव-जन्म। क्रांति के इसी क्षण में-उपरोक्त दो वाक्यों के बीच-जीसस में क्राइस्ट का जन्म हो गया था। पीड़ा घिर गई है, अब जन्म निकट है। प्रसन्न हो, अनुगृहीत हो। मृत्यु को देख भय न कर-धन्यवाद दे। वह नव जन्म की सूचना है। पूराने को मिटना पड़ेगा-नये के होने के लिए। वीज को टूटना पड़ता है अंकुर के लिए। डा. को प्रेम। 


रजनीश के प्रणाम
१३-११-१९७० प्रति : श्रीमती जयवंती शुक्ल, जूनागढ़, गुजरात

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

मुक्ति का संगीत - ओशो

Music-of-Salvation-Osho


प्यारी जयति, प्रेम। 

        प्रभु के मंदिर में नाचते-गाते, आनंद मनाते ही प्रवेश होता है। उदास चित्त की वहां कोई गति नहीं है। इसलिए, उदासी से बच। चित्त को रंगों से भर। मयूर के पंखों जैसा चित्त चाहिए। और अकारण। जो कारण से आनंदित है, वह आनंदित ही नहीं है। नाच और गा। किसी के लिए नहीं। किसी प्रयोजन से नहीं। नाचने के लिए ही नाच। गाने के लिए ही गा। और तब सारा जीवन ही दिव्य हो जाता है। ऐसा जीवन ही प्रभू की प्रार्थना है। ऐसा होना ही मुक्ति है। डा. को प्रेम। डाक्टर का पत्र मिल गया है। 


रजनीश के प्रणाम
२५-१०-१९७० प्रति : श्री जयति शुक्ला, द्वारा डा. हेमंत पी. शुक्ला, अनवर स्ट्रीट, काठियावाड, जूना गढ़ (गुजरात)

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

अटूट संकल्प - ओशो

Unbreakable-Resolution-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        ध्यान के जल स्रोत निकट ही हैं। लेकिन दमित काम की पर्ते चट्टानों का काम कर रही हैं। काम का दमन ही आपके जीवन को क्रोध से भी भर गया है। क्रोध का धूआं भी व्यक्तित्व के रोए रोए में है। उस दिन जब आप मेरे सामने ध्यान में गए तब यह सब स्पष्ट दिखाई पड़ा। लेकिन यह भी दिखाई पड़ा कि आपका संकल्प भी प्रवल है। अभीप्सा भी प्रवल है। श्रम भी प्रबल है। इसीलिए, निराशा का कोई भी कारण नहीं है। कठिनाइयां हैं, चट्टानें हैं, लेकिन वे टूट सकेंगी क्योंकि उन्हें तोड़ने वाला अभी टूट नहीं गया है। श्रम करें ध्यान के लिए समग्रता से। शीघ्र ही जल स्रोत उपलब्ध होंगे। लेकिन, दाव पर स्वयं को पूरा ही लगाना होगा। रत्ती भर कम से भी नहीं चलेगा। जरा सी कमी और सब चूक सकता है। समय कम है, इसलिए शक्ति सघन करनी होगी। अवसर खो न जाए इसलिए संकल्प पूर्ण करना होगा। ऐसा अवसर दुवारा किस जन्म में मिलेगा कहना कठिन है। इसलिए, इस जन्म में ही सब पूर्ण कर लेना है। द्वार व खुले तो फिर दूसरे जन्म में सब प्रारंभ से ही शुरू करना होता है। फिर भी मेरा साथ भी निश्चित नहीं है। पिछले जन्म में भी आपने श्रम किया था, 

        लेकिन वह अधूरा रह गया था। उसके पहले भी ऐसा ही हुआ था। विगत तीन जन्मों से आप एक ही वृत्त को पुनरुक्त कर रहे है। अब इस वृत्त को तोड़ ही डालें। बहुत देर तो वैसे ही गई है। अब और देर उचित नहीं है। वहां सबको मेरे प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
१०-६-७० प्रति : लाला सुंदरलाल, दिल्ली

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

सत्य है सदा सूली पर - ओशो

Truth-is-always-on-the-cross-Osho


प्यारी जयति, प्रेम। 

        तेरा पत्र मिला है। पगली! मेरे लिए कभी भी, भूलकर भी चिंतित मत होना। दो कारणों से: एक तो प्रभु के हाथों में जिस दिन से स्वयं को सौंपा है, उसी दिन से सब चिंताओं के पार हो गया हूं। असल में, स्वयं को ही सम्हाल ने के अतिरिक्त और कोई चिंता ही हनीं है। अहंकार ही चिंता है। उसके पार तो कैसी चिंता-किसको चिंता-किसकी चिंता? दूसरे मेरे जैसे व्यक्ति सूली चढ़ने को ही पैदा होते हैं। वही हमारा सिंहासन है। फूल नहीं-पत्थर बरसें तभी हमारा कार्य हो पाता है। लेकिन, प्रभु के मार्ग पर पत्थर भी फूल अंतत: पत्थर सिद्ध होते हैं। इसलिए, जब मुझ पर पत्थर बरसें तव खुश होना और प्रभु को धन्यवाद देना। सत्य का सदा ही, ऐसा ही स्वागत होता है। न माने मन तो पूछ सुकरात से? जीसस से? कवीर से? मीरा से? सवको प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
१०-६-७० प्रति : सुश्री जयवंती, जूनागढ़

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

समाधान की खोज - ओशो

Solution-Discovery-Osho


प्यारी रेखा, प्रेम। 

        तेरा पत्र मिला है। उसमें तूने इतने प्रश्न पूछे हैं, कि उत्तर के लिए मुझे महाभारत से भी बड़ी किताब िलखनी पड़ेगी। और फिर भी तुझे उत्तर नहीं मिलेंगे। क्योंकि, कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनके उत्तर दूसरे से मिल ही नहीं सकते हैं। उनके उत्तर तो स्वयं के जीवन से ही खोजने पड़ते हैं।

        और कुछ प्रश्न ऐसे हैं कि जिनके उत्तर हैं ही हनीं। क्योंकि वे प्रश्न ही गलत हैं। ऐसे प्रश्नों के उत्तर कभी नहीं मिलते हैं। हां-खोजते खोजते अंतत: प्रश्न जरूर गिर जाते हैं। और कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जो प्रश्न तो सही हैं, लेकिन उनके उत्तर नहीं हैं। उन्हें तो अंतस में गहरे उतरकर ही जाना जा सकता है। 

रजनीश के प्रणाम
८-४-७० प्रति : कुमारी रेखा गिरधरदास, राजकोट, गुजरात

शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

सपने : बंद व खुली आंखों के - ओशो

Dreams-with-closed-and-open-eyes-Osho


प्यारी गुणा, प्रेम। 

        स्वप्न भी सत्य है। क्योंकि, जिसे हम सत्य कहते हैं, वह भी स्वप्न से ज्यादा कहां है? खुली और बंद आंख से ज्यादा अंतर भी क्या है।  इस बात को ठीक से समझ ले। क्योंकि तब दोनों के ही पार उठा जा सकता है। और दोनों के पार ही मार्ग है। क्योंकि, दोनों दर्शन हैं और दोनों के पार वह है जो कि द्रष्टा है। ईश्वर वावू को प्रेम। बच्चों को आशीष।

रजनीश के प्रणाम
८-४-७० प्रति : सुश्री गुणा शाह, बंबई

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

अंतर्वीणा - ओशो

Entanglement-Osho


मेरे प्रिय,

प्रेम।

        काश! वीणा बाहर होती तो संगीत भी सूना जा सकता था! लेकिन, वीणा भीतर है, इसलिए संगीत सुना नहीं जा सकता है। हां-संगीत हुआ जरूर जा सकता है। और, वह संगीत भी क्या जो सुनने पर ही समाप्त हो जाए? फिर, वीणा वादक, वीणा, संगीत और श्रोता भिन्न भी तो नहीं हैं। झांको भीतर पहुंचो भीतर। और देखो-यह कौन वहां तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। 


रजनीश के प्रणाम
८-४-७० प्रति : श्री जयंतीलाल पी. व्यास, उदयपुर

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

खोज-खोज-और खोज - ओशो

Search-search-and-search-osho


प्यारी कुसुम, प्रेम। 

        खोज-खोज-और खोज। इतना कि अंततः खोजते-खोजते स्वयं ही खो जावें।बस वही बिंदु उसके मिलन का है। इधर मैं मिटा, उधर वह हुआ। मैं के अतिरिक्त और कोई दीवार न कभी थी, न है। कपिल को प्रेम। असंग को आशीष। 


रजनीश के प्रणाम
८-४-७०

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

जागकर देखें-मैं है ही नहीं - ओशो

Wake-up-and-see-I-dont-exist-Osho


प्रिय मायाजी, प्रेम। 

        आपका पत्र पाकर आनंदित हूं। मैं को छोड़ना नहीं है। क्योंकि, जो है ही नहीं, उसको छोड़ियेगा कैसे? मैं को समझना है-खोजना है। वैसे ही जैसे कोई प्रकाश लेकर अंधकार को खोजे और अंधकार खो जाए। अंधकार मिटाया नहीं जा सकता है, क्योंकि वह है ही नहीं है। बस प्रकाश ही जलाया जा सकता है। हां-प्रकाश के आते ही पाया जाता है कि अंधकार नहीं है। ऐसे ही विचारों से भी न लड़ें। निर्विचार होने का प्रयास करना भी विचार ही है। विचारों के प्रति जागे-सचेत हों-साक्षी बनें। और फिर वे अनायास ही शांत हो जाते हैं। साक्षी भाव अंततः शून्य में उतार देता है। और जहां शून्य है, वहीं पूर्ण है। 


रजनीश के प्रणाम
८-४-७० प्रति : श्रीमती मायादेवी जैन, चंडीगढ़, पंजाब

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

अर्थ (उमंदपदह) की खोज - ओशो

Osho-Discovering-the-Meaning-Umandpadah


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        अर्थ (उमंदपदह) की खोज ही अनर्थ है। अर्थ की खोज ने ही अर्थहीनता (उमंदपदहसमेदमे) तक पहुंचा दिया है। अर्थ नहीं है, ऐसा जो जान लेता है वह परम अर्थ को उपलब्ध हो जाता है। क्योंकि फिर अर्थहीनता संभव ही नहीं है। और अनर्थ भी। फिर तो जो है अर्थ ही है। या, नहीं भी है, तब भी भेद नहीं है। असल में फिर तो जो-है, है। जो नहीं है, नहीं है और अन्यथा का प्रश्न ही नहीं उठत | है।और तुमने पूछा है कि प्रयोजन मुक्त होने की बात जरा खोलकर समझाऊं। समझोगे तो वह वात कभी भी खुल न पाएगी। क्योंकि समझने की संभावना प्रयोजन के साथ है! समझने में लगते ही क्यों हो? और देखो-वात खुलकर सामने खड़ी है न? सब खुला है और साफ है। लेकिन, मनुष्य समझने में लगा है। फिर, वह जो सामने है और साफ है, उसे देखे कौन ? समझने की चेष्टा में ही उलझाव है। जानने की चेष्टा में ही अज्ञान है। न समझो...न जानो। फिर वह छिपेगा ही कैसे जो कि-है (ज-सीपवी-टे)? सत्य सदा निर्वस्त्र है, सामने है, साफ है। 


रजनीश के प्रणाम
८-४-७० प्रति : श्री पुष्पराज शर्मा, शिमला

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

मृत्यु का वोध - ओशो

Vodh-of-death-Osho


प्रिय मथुरा वाबू, प्रेम। 

        आपका पत्र मिला है। यह जानकर आनंदित हूं कि मां की मृत्यु से आपको स्वयं की मृत्यु का खयाल आया है। मृत्यु के वोध में से ही अमृत की उपलब्धि की संभावना है। मृत्यु की चोप सदा गहरी है लेकिन मनुष्य का मन चालाक है और उसे भी टाला जा ता है। आप टालना मत। स्वयं को समझना मत। किसी भी भांति की सांत्वना आत्मघात है। मृत्यु के घाव को ठीक से बनने देना। जागना और उस घाव के साथ जीना। कठिन होगा यह जीना। लेकिन, कठिनाई के विना क्रांति भी तो नहीं है। मृत्यु है। सदा साथ है। 

        लेकिन, हम उसे विस्मरण किए रहते हैं। मृत्यू रोज है। प्रतिपल है। लेकिन, हम उसके प्रति बेहोश बने रहते हैं। और इस कारण ही हमें इस जीवन का भी कोई पता नहीं चलता है। मृत्यु से बचने में मनुष्य जीवन से भी चूक जाता है। क्योंकि वे दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। क्योंकि वह दोनों एक ही गाड़ी के दो चाक हैं। और जो उन दोनों को ही जान लेता है, उसके लिए वे दोनों एक ही हो जाते हैं। उस एकता का नाम ही अस्तित्व है। और उस अस्तित्व में होना ही मुक्ति है। 


रजनीश के प्रणाम
११-२-१९७० प्रति : श्री मथुरा प्रसाद मिश्र, पटना, बिहार

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

सत्य को जीतने की कला : सब भांति हार जाना - ओशो

The-Art-of-Winning-the-Truth-Losing-Everything-Like-it-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम।

        जल्दी न करें। कभी-कभी जल्दी ही देरी बन जाती है। प्यास के साथ प्रतीक्षा भी जोड़ें। जितनी गहरी प्रतीक्षा हो, उतनी ही शीघ्रता होती है। बीज बो दिया है, अब छाया में बैठे और देखें कि क्या होता है। वीज टूटेगा, अंकुर भी बनेगा, लेकिन जल्दी तो नहीं की जा सकती है। प्रत्येक बात के लिए समय भी तो चाहिए न? श्रम करें जरूर लेकिन फल परमात्मा पर छोड़ दें। जीवन में कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता है। और सत्य की ओर उठाया हुआ कदम तो कभी भी नहीं। लेकिन कभी-कभी अधैर्य ज रूर वाधा बन जाता है। प्यास के साथ वह आता भी है। लेकिन, प्यास को बचा लें और उसे विदा दे दें। प्यास और अधैर्य को एक समझने की भूल न करें। प्यास में खोज है लेकिन दौड़ नहीं है। 

        अधैर्य में दौड़ है लेकिन खोज नहीं है। प्यास में बाट है लेकिन मांग नहीं। अधैर्य में मांग है लेकिन बाट नहीं। प्यास में शांत रुदन है। अधैर्य मग अशांत छीना झपटी है। और सत्य के लिए आक्रमण नहीं किया जा सकता है। वह मिलता है, लड़ने से नहीं, हारने से। उसे जीतने की कला वस भांति हार जाना ही है। मधु को प्रेम। 


रजनीश के प्रणाम
११-४-७० प्रति : श्री वावूभाई शाह, संस्कार तीर्थ, आजोल, गुजरात

शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

दस जीवन सूत्र - ओशो

Ten-Life-Sutras-Osho


प्रिय रामचंद्र प्रेम! 

    मेरी दस आज्ञाएं (मं विउउंदकउमदजे) पूछी हैं। बड़ी कठिन बात है। क्योंकि, मैं तो किसी भी भांति की आज्ञाओं के विरोध में हूं। फिर भी, एक खेल रहेगा इसलिए लिखता हूं : 


१ किसी की आज्ञा कभी मत माना जब तक कि वह स्वयं की ही आज्ञा न हो।
२ जीवन के अतिरिक्त और कोई परमात्मा नहीं है।
३ सत्य स्वयं है, इसलिए उसे और कहीं मत खोजना।
४ प्रेम प्रार्थना है।
५ शून्य होना सत्य का द्वार है। शून्यता ही साधना है, साध्य है, सिद्धि है।
६ जीवन है अभी और यही।
७ जियो और जागे हुए।
८ तैरो मत-बहो।
९ मरो प्रतिपल ताकि प्रतिपल नए हो सको। 
१० खोजो मत। जो है-है। रुको और देखो। 

रजनीश के प्रणाम 
८-४-१९७० प्रति : डा. रामचंद्र प्रसाद, पटना विश्वविद्यालय, पटना 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

विरह, प्यास, पुकार और आंसू - ओशो

virah-pyaas-pukaar-aur-aansoo-osho


मेरे प्रिय, 

प्रेम। 

        विरह शूभ है। प्यास शूभ है। पूकार शूभ है। क्योंकि आसुओं के मार्ग से ही तो उसका आगमन होता है। रोओ, लेकिन इतना कि रोना ही वचे और तुम न वचो। रोने वाला मिट जाए और वस रोना ही वच रहे तो मंजिल स्वयं ही द्वार पर आ जात है। इसलिए ही रोका नहीं था और जाने दिया था। जानता था कि पछताओगे। लेकिन पछताने का मूल्य है। जानता था कि रोओगे। लेकिन रोने का उपयोग है। आंसूओं से ज्यादा गहरी प्रार्थना और क्या है ? रवि को प्रेम। ओम को प्रेम। कंचन और मधू को प्रेम। 


रजनीश के प्रणाम
प्रति : श्री सरदारीलाल सहगल, अमृतसर, पंजाब

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

सोचना नहीं। देखना-बस देखना - ओशो

Do-not-think-See-just-see-Osho


मेरे प्रिय। 

प्रेम। 

        स्वयं से लड़ें न। जैसे हैं हैं। बदलने की चेष्टा न करें। जीवन में तैरें नहीं-बहें; जैसे सरिता में सूखा पत्ता। साधना से बचें। साधना मात्र से। बस यही साधना है? जाना कहां है। होना क्या है? पाना किसे हैं? जो है-वह अभी है, यहीं है। कृपया रुकें और देखें। कि प्रकृति को पशु प्रकृति कहते हैं ? क्या है निम्न? जो है-है। न कुछ नीचा है, न कुछ ऊंचा है। क्या है पाशविक? क्या है दिव्य? इसलिए न निंदा करें, न प्रशंसा। न स्वयं को कोसें और न स्वयं की पीठ थपथपाएं। सब भेद विचार के हैं। सत्य में भेद नहीं है। वहां प्रभु और पशु एक है। स्वर्ग और नर्क एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। संसार और मोक्ष एक ही अज्ञात को कहने के दो ढंग है। और मेरी बातों को सोचना मत। सोचा कि चूके। देखना-बस देखना। 


रजनीश के प्रणाम
प्रति : स्वामी मोहन चैतन्य, मोगा, पंजाब

बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

सर्व स्वीकार है द्वार प्रभु का - ओशो

 

God-accepts-the-door-Osho

मेरे प्रिय, प्रेम। 

        आपका पत्र मिला है। मन को शांत करने के उपद्रव में न पड़ें।वह उपद्रव ही अशांति है। मन जैसा है-है। उसे वैसा ही स्वीकार करें। उस स्वीकृति से ही शांति फलित होती है। अस्वीकार है अशांति। स्वीकार है शांति। और जो सर्व स्वीकार को उपलब्ध हो जाता है, वह प्रभु को उपलब्ध हो जाता है। अन्यथा मार्ग ही नहीं है। इसे ठीक से समझ लें। क्योंकि, वह समझ (न्नदकमतेजंदकपदह) ही स्वीकृति लाती है। स्वीकृति हमारा संकल्प (रूपसस) नहीं है। संकल्प मात्र अस्वीकृति है। जो मैं करता हूं उसमें स्वीकार छिपा ही है। क्योंकि संकल्प है अहंकार। और अहंकार अस्वीकार के भोजन के विना नहीं जी सकता है। इसलिए, स्वीकार किया नहीं जाता है। जीवन की समझ स्वीकार ले आती है। देखें-जीवन को देखें। जो है-है। जैसा है, वैसा है। वस्तुएं ऐसी ही हैं (पदहे तम नबी) अन्यथा न चाहें; क्योंकि चाहें तो भी अन्यथा नहीं हो सकता है। चाह बड़ी नपुंसक है। आह! और जहां चाह नहीं है, क्या वहां अशांति है? लीना को प्रेम। टूकन को आशीष। 


रजनीश के प्रणाम
१६-२-१९७० प्रति : डा. एम. आर. गौतम , बनारस

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

प्रेम के दो रूप : काम और करुणा - ओशो

Two-forms-of-love-work-and-compassion-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        आपका पत्र मिल गया है। प्रेम और दया में बहुत भेद है। प्रेम में दया है। लेकिन दया में प्रेम नहीं है। इसलिए जो हो उसे हमें वैसा ही जानना चाहिए। प्रेम तो प्रेम। दया तो दया। एक को दूसरा समझना या समझाना व्यर्थ की चिंताओं को जन्म देता है। प्रेम साधारणत: असंभव हो गया है। क्योंकि मनुष्य जैसा है, वैसा ही वह प्रेम में नहीं हो सकता है। प्रेम में होने के लिए मन का पूर्णतया शून्य हो जाना आवश्यक है।

        और हम मन से ही प्रेम कर रहे हैं। इसलिए हमारा प्रेम निम्नतम हो तो काम (एमग) होता है और श्रेष्ठतम हो तो करुण | (विउ,पवद) लेकिन प्रेम काम और करुणा दोनों की प्रतिक्रमण है। इसलिए जो है उसे समझें। और जो होने चाहिए, उसके लिए प्रयास न करें। जो है, उसकी स्वीकृति और समझ से, जो होना चाहिए, उसका जन्म होता है। लीना को प्रेम टूकन को आशीष। 


रजनीश के प्रणाम
१५-२-१९७० प्रति : डा. एम. आर. गौतम, अध्यक्ष : संगीत विभाग हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस (उ . प्र.)

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

जीवन है असुरक्षा-अव्यवस्था - ओशो

Life-is-insecurity-disorder-Osho


प्यारी जयति. प्रेम। 

        तेरा पत्र पाकर आनंदित हूं। इतनी ही पीड़ा झेलनी पड़ती है-यह तो प्रसव पीड़ा है न, स्वयं को जन्म देने की प्रस व पीड़ा। और पीछे लौटना संभव नहीं है। जहां लौटा जा सके, वह अतीत बचता ही कहां है? समय उन सीढ़ियों को सदा ही गिरा देता है जिससे चढ़कर कि हम वर्तमान तक आते हैं। लौटना नहीं, बस आगे जाना ही संभव है। आगे और आगे। और अंतहीन है वह यात्रा। मंजिल नहीं है, मुकाम नहीं है। बस पड़ाव हैं क्षण भरी के। तंबू हैं कि लग भी नहीं पाते उखड़ना शुरू हो जाता है।

        और अव्यवस्था से भयभीत क्यों? व्यवस्थाएं मात्र झूठी हैं। जीवन है अव्यवस्था-असुरक्षा। और जिसे सुरक्षित होना है, उसे मरने के पहले ही मर जाना होता है। लेकिन, मरने की जल्दी क्या है। वह कार्य तो मृत्यु स्वयं ही कर देगी। तब क्या ठीक नहीं है कि हम जी लें। और आश्चर्य तो यह है कि जीना जान लेता है, मृत्यु उसका घर भूल जाती है। क्योंकि, यही आवश्यक है। माली बीज बोकर क्या चूपचाप प्रतीक्षा नहीं करता है? लेकिन जब भी मेरी जरूरत होगी तब तू पाएगी कि मैं सदा पास में ही हूं। डा, को प्रेम। वहां सबको प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
१७-२-७० प्रति : सुश्री जयवंती, जूनागढ़