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प्रिय मित्रो आप का ओशो धारा कम्युनिटी में स्वागत है

        बात 1997 की है ,एक पुस्तक की शॉप पर मैं एक किताब उठा कर पढ़ने लगा, तभी भीतर से आवाज आयी ,यही है तुम्हारी मंजिल. वह पुस्तक प्यारे भगवान ओशो की थी, फिर मै उनका दीवाना हो गया, और बस सन्यास की धुन लग गयी, क्यूंकि बिना सन्यास के मैं कैसे उनसे जुड़ सकता हूँ. मैंने संन्यास जबलपुर में लिया नवंबर 25 1997.  फिर मैं अपनी समझ से ध्यान करने लगा और साधना की मेरी प्यास बढ़ती गयी, तथा एक न-समझी यह भी पैदा हो गयी, की ओशो तो सब सम्हाल लेंगे, इस कारण जीवित गुरु के महत्व को इग्नोर करता गया, पर गुरु-कृपा से "ओशो-वर्ल्ड" पत्रिका में "सद्गुरु-त्रिविर" के बारे में पता चला. मैं "ओशोधारा" पत्रिका का मेंबर बन गया, प्रथम पत्रिका आई मैंने पढ़ा,  मन में संघर्ष चालू हो गया, चेतन मन विरोध कर रहा था की, इसमें मत फ़सना, जब दूसरे अंक को मैंने पढ़ा तब मेरे अन्तर-मन से निर्णय आया कि हे चेतन मन मै समाधी प्रोग्राम्स को प्रैक्टिकल करूंगा उसके बाद तुम्हरी मानूँगा.और मैं मई 2002 से "ओशोधारा" से जुड़ गया मेरा अन्तर-मन से लिया गया वह निर्णय मेरे जीवन का सबसे बहुमूल्य निर्णय रहा, उसके बाद मैंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. प्यारे ओशो कहते है की "पहला कदम ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि वही हमारे जीवन की दिशा को तय करता है, यदि पहला कदम सही दिशा में उठ जाये तो वह हमें अपने केंद्र में,हमारे एसेंस्टियल,अनिवार्य भाग में ले जाता है,अगर गलत दिशा में पहला कदम उठ जाये तो वह हमें परिधि में, अर्थार्थ हमारे जीवन के गैर जरूरी हिस्से में ले जाता है. गुरु कृपा से "परम-पद"  प्रोग्राम कर लिया है (यह ओशोधारा का 27 लेवल का प्रोग्राम है.). गुरु-कृपा से अध्यात्म की साडी दौड़ समाप्त हुई और अब परम विश्राम आ गया .  आप सभी को प्रेम-निमंत्रण है ,की एक बार ओशोधारा का प्रोग्राम जरूर करे. ---

धन्यवाद. (10-04-2014)

ओशो जागरण