रविवार, 21 फ़रवरी 2021

वाणी रहित, मांग रहित स्वयं का समर्पण - ओशो

 

Voiceless-Demandless-Surrender-Osho

प्रिय, ललिता, प्रेम। 

        प्राण जिसे खोजते हैं, उसे पा ही लेते हैं। विचार ही सघन होकर वस्तु बन जाते हैं।सरिता जैसे सागर खोज लेती है, ऐसे ही प्यासे प्राणों को प्रभु का मंदिर भी मिल जा ता है। वस प्रवल प्यास चाहिए। बस अथक संकल्प चाहिए। बस अनंत प्रतीक्षा चाहिए। बस पूर्ण पुकार चाहिए। और यह सव-प्यास, संकल्प, प्रतीक्षा, पुकार-एक छोटे से शब्द में समा जाता है। वह शब्द है-प्रार्थना। किंतु, प्रार्थना की नहीं जाती है। वह कृत्य नहीं है। उसमें तो हुआ जाता है। वह भाव है। वह आत्मा है। वह मूक-वाणी रहित, मांग रहित स्वयं का समर्पण है। छोड़ दो स्वयं को अज्ञात के हाथों में। और जो हों उसे स्वीकारो। वह बनाए तो बनो। वह मिटाए तो मिटो। 


रजनीश के प्रणाम
१२-११-१९७० प्रति : कुमारी ललिता राठोर, चंद्रावतीगंज, फतेहाबाद म. प्र.