शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

अपने पीछे चलो और अपने परमात्मा को पहचान लो - ओशो

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ओशो 

अपने पीछे चलो और अपने परमात्मा को पहचान लो - ओशो 

          कौन यह कहता है, जो क्राइस्ट को अनुभव हुआ है, वह आपको अनुभव नहीं होगा? जो यह कहता है, वह दुश्मन है। कौन यह कहता है, जो बुद्ध को अनुभव हुआ है, वह एक सड़क पर झाडू लगाने वाले को अनुभव नहीं होगा। जो यह कहता है, वह मनुष्य का दुश्मन है। हर मनुष्य के भीतर वही परम परमात्मा हुआ है, तो वह अ नुभव, जो क्राइस्ट को हुआ हो, बुद्ध को हुआ हो, रामकृष्ण को हुआ हो, वह हरेक को हो सकता है, हरेक को होना चाहिए। रुकावट है, इसलिए कि हम दूसरों को स्व कार किए हैं और अपने को जगा नहीं रहे हैं। दूसरों को हटा देख और अपने को जगाए। आपके भीतर जो बैठा है, उससे मूल्यवान और कोई भी नहीं है और आपके भीतर जो बैठा है, उससे पूज्य और कोई नहीं है, और आपके भीतर जो बैठा है, उससे श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है। लेकिन मुश्किल यह हो गयी है, हमें सिखा जाता है, अनुकरण करो, फालो करो किसी को। कोई कहता है, क्राइस्ट को फालो करो, कोई कह ता है महावीर को, कोई कहता है, बुद्ध से पीछे चलो। और मैं आपसे कहता हूं, जो भी किसी के पीछे चलेगा, वह अपने भीतर बैठे परमात्मा का अपमान कर रहा है।

          किसी के पीछे जाने का कारण क्या है ? किसी के पीछे जाने का कारण नहीं है। अपने पीछे चलो और अपने परमात्मा को पहचान लो, जो तुम्हारे भीतर है। और जब भी तुम किसी के चरणों में झुक रहे हो, किसी का पीछा कर रहे हो, तब तुम भीत र बैठे परम शक्ति परमात्मा का इतना बड़ा अपमान कर रहे हो, जिसका कोई हिसाब नहीं है।

-ओशो 


गुरुवार, 30 जुलाई 2020

मनुष्य खुद की ही बनायी हुई जंजीरों में जकडा हुआ है - ओशो

Man-is-held-in-chains-made-by-himself-Osho

मनुष्य खुद की ही बनायी हुई जंजीरों में जकडा हुआ है - ओशो 

          रोम में एक बहुत अदभुत लोहार हुआ। उसकी बड़ी क्रांति थी, सारे जगत में। दूर-दू र के बाजारों तक उसका सामान पहुंचा उसने बहुत धन अर्जित किया। लेकिन जबवह अपनी प्रतिष्ठा के चरम शिखर पर था और रोम के सौ बड़े प्रतिष्ठित नागरिकों में उसकी स्थिति बन गयी थी, तभी रोम पर हमला हुआ। दुश्मन ने रोम को रौंद डाला और सौ बड़े नागरिकों को गिरफ्तार कर लिया। उनके हाथ पैरों में बहुत मज बूत जंजीरें पहना दी गयीं और उन्हें फिंकवा दिया गया जंगलों में, ताकि जंगली जानवर उन्हें खा जाए। वे जंजीरें बहुत मजबूत, बहुत वजनी थी। उसके रहते एक कदम चलना भी मुश्किल था, असंभव था। वे निन्यानबे लोग तो रो रहे थे छार-छार। उनके हृदय आंसुओं से भरे थे। उनके सामने मृत्यु के सिवाय कुछ भी नहीं था, लेकिन वह लोहार बहुत कुशल कारीगर था। वह हंस रहा था, वह निश्चित था। उसे खयाल था, कोई फिकर नहीं, कैसी ही जंजीरें हों, मैं खोल लूंगा।

          अपने बच्चों को, अपनी पत्नी को विदा देते वक्त उसने कहा, घबड़ाओ मत, सूरज डूबने के पहले मैं घर वापस आ जाऊंगा। पत्नी ने भी सोचा, बात ठीक ही है। वह इतना कुशल कारी गर था। जब उन सब को जंगलों में फिंकवा दिया गया, वह लोहार भी एक जंगली खड्डे में डाल दिया गया। गिरते ही उसने पहला काम किया, अपनी जंजीरें उठा कर देखीं कि कहीं कोई कमजोर कड़ी हो, लेकिन जंजीरों को देखते ही वह छाती पीट पीटकर रोने लगा। उसकी हमेशा से आदत थी, जो भी बनाता था, कहीं हस्ताक्षर कर देता था। जंजीरों पर उसके ही हस्ताक्षर थे। वह उसकी ही बनायी हुई जंजीरें हैं। उसने कभी सोचा थी न था कि जो जंजीरें मैं बना रहा हूं, वे एक दिन मेरे ही पैरों में पड़ेंगी और मैं ही बंदी हो जाऊंगा। अब वह रोने लगा। रोने लगा इसलिए कि अगर यह जंजीरें किसी और की बनायी हुई होती तो तोड़ भी सकता था।  वह भली भांति जानता था, कमजोर चीजें बनाने की उसकी आदत नहीं, यही तो उसकी प्रा तष्ठा थी। जंजीरें उसकी बनायी हुई थीं। उन्हें तोड़ना मुश्किल था, वे कमजोर थी ही नहीं।

          उस कुशल कारीगर को जो मुसीबत अनुभव हुई होगी, हर आदमी को, जिस दिन व ह जागकर देखता है, ऐसी ही मुसीबत अनुभव होगी। तब वह पाता है, हर जंजीर । पर मेरे हस्ताक्षर हैं और हर जंजीर मैंने इतनी मजबूती से बनायी है, क्योंकि मैंने त ने इसे स्वतंत्रता सोचकर बनाया था, कभी सोचा भी न था कि यह जंजीर है। तो स्व तंत्रता को खूब मजबूती से बनाया था। मैंने इसे धर्म समझा था, खूब मजबूती से तै यार किया था। मैंने इसे मंदिर समझा था, मैंने कभी सोचा भी न था कि यह कारा गृह है। तो खूब मजबूत बनाया था। उस लोहार की जो हालत हो गयी, वह करीबकरीब हर आदमी को अनुभव होती है, जो जागकर अपनी जंजीरों की तरफ देखता है।

- ओशो 

बुधवार, 29 जुलाई 2020

जो जोड़ता है, वह आनंद को उपलब्ध होता है - ओशो

What-joins-is-available-to-Anand---Osho

जो जोड़ता है, वह आनंद को उपलब्ध होता है -  ओशो 

          बुद्ध एक पहाड़ के करीब से गुजरते थे। एक हत्यारे ने वहां प्रतिज्ञा कर रखी थी, ए क हजार लोगों को मारने की उसने नौ सौ निन्यानबे लोग मार डाले थे, लेकिन अब रास्ता चलना बंद हो गया था। लोगों को पता हो गया था और रास्ता चलना बंद हो गया था। अब उस रास्ते पर कोई भी हनीं निकलता था। बुद्ध उस रास्ते पर गए । गांव के लोगों ने, जो अंतिम गांव था। उन्होंने कहा मत जाओ क्योंकि हत्यारा वह । अंगुलीमाल है। वह आपका भी सिर काट डालेगा। वह रास्ता निर्जन है, वहां कोई भी नहीं जाता।

          बुद्ध ने कहा, अगर वहां कोई भी नहीं जाता तो वह बेचारा हत्यारा, अकेला बहुत दुख में और पीड़ा में होगा। मुझे जाना चाहिए। अगर मेरी गर्दन कट जाए तो भी उ से खुशी होगी, उसका एक हजार का व्रत पुरा हो जाएगा। दूसरी बात, जो आदमी एक हजार आदमियों को मार कर भी दुखी नहीं हुआ है। उसके प्राण पत्थर हो गए होगे। उसके पत्थर प्राण उसे कितनी पीड़ा नहीं देते होगे। बुद्ध ने कहा, मुझे उन सौ निन्यानबे लोगों के मर जाने की उतनी पीड़ा नहीं जितनी उस आदमी के हृद य की पीड़ा है, उसके हृदय पर कितना बड़ा पत्थर होगा। मुझे जाने दें।

          बुद्ध वहाँ गए। वहां एक छोटी सी घटना घटी। बुद्ध को आते देखकर, उनकी सीधी और शांत आकृति देख कर अंगुलीमाल को थोडी सी दया आयी। सोचा, भिक्षु है, भूल से आ गया। और तो कोई आता नहीं है। उसने दूर से चिल्लाकर कहा कि भिक्ष. वापस लौट जाओ। क्या तुम्हें पता नहीं, अंगुलीमाल का नाम नहीं सुना? और सभी हत्यारे चाहते हैं कि उनका नाम सुना जाए, उसी के लिए हत्या करते हैं। उसने चिल्लाकर कहा, अंगुलीमाल का नाम नहीं सुना । बुद्ध ने कहा, सुना  है, और उसी की खोज में मैं भी आया हूं। अंगुलीमाल थोड़ा हैरान हुआ। उसने कहा, क्या तुम्हें पता नहीं कि मैं तुम्हारी गर्दन काट दूंगा? नों सौ निन्यानवे लोगों को मैने मारा है।

          बुद्ध ने कहा, मैं भी मरूं, क्योंकि मृत्यु निश्चित है | आज नहीं कल मर जाऊंगा। लेकिन तुम्हें अगर थोड़ी खुशी मिल सके और तुम्हार व्रत पूरा हो जाए तो मृत्यु मेरी सार्थक हो जाएगी। अंगुलीमाल थोड़ा परेशान हुआ | इस तरह की बातें उसने जीवन में कभी नहीं सुनी थी। उसने दो तरह के लोग देखे थे-वे जो उसकी तलवार को देखकर भाग जाते हैं और ये जो उसकी तलवार को देखकर तलबार निकाल लेते थे। इस आदमी के पास न तो तलवार थी और न यह आदमी भाग रहा था, क्योंकि आ रहा था। यह बिलकु ल तीसरी तरह का आदमी था जो अंगुलीमाल ने नहीं देखा था।

          बुद्ध करीब आए, अंगुलीमाल से उन्होने कहा कि तुम इसके पहले कि मुझे मारो, क्या एक छोटा सा काम मेरा कर सकोगे? और एक करते हुए आदमी की याचना कौन इनकार करेगा ? अंगुलीमाल भी इनकार नहीं कर सका। बुद्ध ने कहा, यह जो सामने वृक्ष है, इस के थोड़े से पत्ते तोड़ कर मुझे दे दो। उसने अपनी तलवार से एक शाखा काटकर बुद्ध के हाथ में दे दी। बुद्ध ने कहा, तुमने मेरी बात मानी। क्या एक छोटी से बात और मान सकोगे? इस शाखा को वापस जोड़ दो। वह अंगुलीमाल हैरान हुआ। उसने कहा, यह तो असंभव है। वापस जोड़ देना असंभव है। बुद्ध हंसने लगे और उन्होंने कहा, फिर तोड़ना तो बच्चे भी कर सकते थे, पा गल भी कर सकते थे। इसमें कोई बहादुरी नहीं, इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं कि तुमने तोड़ी। जोड़ो तो कुछ बात है। तोड़ना तो कोई भी कर सकता है।

          और बुद्ध ने कहा , स्मरण रखना, जो तोड़ता है, वह निरंतर दुखी होता जाता है। और जितना ज्यादा दुखी होता है, उतना ज्यादा तोड़ता है और जितना ज्यादा तोड़ता है, उतना ज्यादा दुखी होता जाता है। अंगुलीमाल ने पूछा, सच, मैं तो बहुत दुखी हूं। क्या कोई रास्ता भी है कि मनुष्य आनंदित हो सके? बुद्ध ने कहा, जो जोड़ता है, वह आनंद को उपलब्ध होता है। अंगुलीमाल ने वह तलवार फेंक दी। उसने कहा कि मैं जोड़ने का विज्ञान सीखूंगा।

- ओशो 

सोमवार, 27 जुलाई 2020

स्वं का होना ही असली होना है - ओशो

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स्वं का होना ही असली होना है - ओशो 

         ऐसा एक दफा हुआ, ऐसी एक घटना घटी। चार्ली चेप्लिन को उसके जन्म दिन पर, एक विशेष जन्म दिन पर, पचासवी वर्ष गांठ पर, कुछ मित्रों ने चाहा कि एक अि भनय हो। सारी दुनिया से कुछ अभिनेता आए और चार्ली चेप्लिन का अभिनय करें और उनमें जो प्रथम आ जाए, ऐसे तीन लोगों को पुरस्कार इंग्लैंड की महारानी दे।

          सारे यूरोप में प्रतियोगिता हुई। सौ प्रतियोगी चुने गए। चार्ली चेप्लिन ने मन में सोचा कि, मैं भी किसी दूसरे गांव से जाकर, क्यों न सम्मिलित हो जाऊं। मुझे तो प्रथम पुरस्कार मिल ही जाना है। इसमें में कोई शक सुबह की बात नहीं। मैं खुद चार्ली चेप्लिन हूं। और जब बात खुलेगी तो लोग हंसेंगे, एक मजाक हो जाएगी। मजाक हुई जरूर, लेकिन दूसरे कारण से हुई। चार्ली चेप्लिन को द्वितीय पुरस्कार मिला।

          और जब बात खुली कि खुद चार्ली चेप्लिन भी उन सौ अभिनेताओं में सम्मिलत थे,  तो सारी दुनिया हंसी और हैरान हो गई कि यह कैसे हुआ? एक दूसरा आदमी बाजी ले गया ? चार्ली चेप्लिन होने की प्रतियोगिता में और चार्ली खुद नंबर दो रह गए?

          तो हो सकता है, राम हार जाएं। महावीर के साधुओं से महावीर हार जाएं, बुद्ध के भिक्षुओं से बुद्ध हार जाएं, क्राइस्ट के पादरियों से क्राइस्ट हार जाएं। इसमें कोई हैरानी नहीं। लेकिन यह जानना चाहिए कि चाहे कोई कितना ही कुशल अभिनय करे, उसके जीवन में सुवास नहीं हो सकती, वह कागज का ही फूल होगा। वह असली फूल नहीं हो सकता। और इस चेष्टा से कि वह दूसरे का अंधानुकरण करे, वह एक बहुमूल्य अवसर खो देगा जो स्वयं की निजता को पाने का था। ऐसी ही हो जाएगी बात।

-ओशो 

रविवार, 26 जुलाई 2020

अगर सत्य मिलना होगा तो एक ही स्मरण में, एक ही प्रवेश में पर्दा टूट जायेगा - ओशो

If-the-truth-has-to-be-found-then-the-curtain-will-be-broken-in-one-memory-in-one-entry-Osho

अगर सत्य मिलना होगा तो एक ही स्मरण में, एक ही प्रवेश में पर्दा टूट जायेगा -  ओशो 

          एक साधु हुआ है, वह तो कोई फकीर नहीं था, कोई गैरिक वस्त्रों को उसने नहीं प हना था और उसने कभी अपने घर को नहीं छोड़ा। वह साठ वर्ष का हो गया, उस का पिता भी जिंदा था। उसके पिता की उम्र तब नब्बे वर्ष की थी। उसके पिता ने उसे बुलाकर कहा कि देखो। मैं तुम्हें साठ वर्ष से देख रहा हूं, तूने एक भी दिन भगवान का नाक नहीं लिया, तुम एक भी दिन मंदिर नहीं गए, तुमने एक भी दिन सदवचनों का पाठ नहीं किया। अब मैं बूढ़ा हो गया और मरने के करीब हूं, तो मैं तुमसे कहना चाहता हूं, तुम भी बूढ़े हो गए हो, कब तक प्रतीक्षा करोगे? नाम  लो प्रभु का, प्रभु के विचार को स्मरण करो, मंदिर जाओ, पूजा करो।

          उसके बूढ़े लड़के ने कहा, मैं भी आपको कोई चालीस वर्षों से मंदिर जाते देखता हूं, पाठ करते देखता हूं मेरा भी मन होता था कि रोक दूं, यह पाठ। मंदिर और यह मस्जिद जाना व्यर्थ हो गया है। आप रोज-रोज वही कर रहे हैं। अगर पहले दिन ही परिणाम नहीं हुआ __ तो दूसरे दिन कैसे परिणाम होगा, तीसरे दिन कैसे परिणाम होगा, चौथे दिन कैसे परिणाम होगा? जो बात पहले दिन परिणाम नहीं ला सकी है, वह चालीस वर्ष दोहराने से भी परिणाम नहीं लाएंगे, क्योंकि पहले दिन के बाद निरंतर परिणाम कम होता जाएगा, क्योंकि हम उसके आदी होते जाएंगे। उसके लड़के ने कहा, मैं भी कभी जाऊंगा, लेकिन एक ही बार। मैं भी स्मरण करूंगा लेकिन एक ही बार, क्योंकि दुबारा का कोई भी अर्थ नहीं होता है। जो होना है, वह एक बार में हो जाना चाहिए, नहीं होता है, तो नहीं होगा।

          कोई उस घटना के पांच वर्षों के बाद, पैंसठ वर्ष की उम्र में उस साधू ने  भगवान का  नाम लिया और नाम लेते ही उसकी श्वास भी समाप्त हो गयी और वह गिर भी गया, उसका निर्वाण भी हो गया। यह अकल्पनीय मालूम होता है कि कैसे होगा? लेकिन जब भी होता है, यही होता है। एक ही घटना में, एक ही स्मरण में, एक ही प्रवेश में पर्दा टूट जाता है और अगर एक ही में न टूटे तो समझना, वही चोट बार-बार करनी बिलकुल व्यर्थ है। तो मैं कुछ बातें, कुछ विचार, जिनके प्रति हम मर गए हैं, जिन्हें सुनते-सुनते हम जिन के आदमी हो गए हैं, जिनकी खोज विलीन हो गयी है, उनके संबंध में कुछ बातें। आपको कहूं, शायद कोई कोण आपको दिखायी पड़ जाए और कोई बात, कोई क्रांति आपके भीतर संभव हो सके।

- ओशो 


शनिवार, 25 जुलाई 2020

मंदिर वही है जो हमारे भीतर है, जो मंदिर भीतर नहीं हैं, वह झूठा है - ओशो

The-temple-is-the-one-that-is-within-us-the-temples-which-are-not-inside-it-is-false-Osho

मंदिर वही है जो हमारे भीतर है, जो मंदिर भीतर नहीं हैं, वह झूठा है - ओशो 

          किसी देश में एक साधु को कुछ लोगों ने जाकर कहा, कुछ शत्रु तुम्हारे पीछे पड़े हुए हैं और वे तुम्हें समाप्त करना चाहते हैं। उस साध ने कहा, अब कोई भी डर नह i है, जब वे मुझे समाप्त करने आएंगे तो मैं अपने किले में जाकर छिप जाऊंगा उस साधु ने कहा, जब वे मुझे समाप्त करने आएंगे तो मैं किले में जाकर छिप जाऊंगा । वह तो एक फकीर था, उसके पास एक झोपड़ा भी नहीं था। उसके शत्रुओं को य ह खबर पड़ी और उन्होंने यह सुना कि उसने कहा है कि जब मुझ पर कोई हमला होगा तो मैं अपने किले में छिप जाऊंगा, वे हैरान हुए।

          उन्होंने एक रात उसके झोपडे पर जाकर उसे पकड़ लिया और पूछा कि कहां है तुम्हारा किला? वह साधु हंसने लगा और हृदय पर हाथ रखा और कहा, यहां है मेरा किला। और जब तुम मुझ पर हमला करोगे तो मैं यहां छिप जाऊंगा। असल में मैं वहीं छिपा हआ है। और इसलिए मुझे किसी हमले का कोई डर नहीं है। लेकिन यहां है किला, उसका हमें कोई भी पता नहीं है।

          वे लोग भी, जो धर्म की बातें करते हैं, ग्रंथ पढ़ते हैं, गीता, कुरान, बाइबिल पढ़ते हैं, वे लोग भी जो भजन कीर्तन करते हैं, शिवालय और मंदिर मस्जिद में जाते हैं उनको भी यहां, जो हरेक मनुष्य के भीतर एक केंद्र है, उसका उन्हें भी कोई पता नहीं है। उनकी भी बातें, बातों में ज्यादा नहीं हैं, इसलिए उसका कोई परिणाम जीवन में दिखायी नहीं पड़ रहा है। सारी जमीन पर धार्मिक लोग हैं, लेकिन धर्म बिल कुल ही दिखायी नहीं पड़ता है। और सारी जमीन पर मंदिर हैं, मस्जिद हैं, गिरजाघर हैं, लेकिन उनका कोई भी परिणाम, कोई प्रभाव, कोई प्रकाश जीवन में नहीं है। इसके पीछे एक ही वजह है कि हम उस मंदिर से परिचित नहीं हैं जो हमारे भीतर है. और हम केवल उन्हीं मंदिरों से परिचित हैं जो हमारे भीतर नहीं है। स्मरण र हे, जो मंदिर भीतर नहीं हैं, वह मंदिर झूठा है। स्मरण रखें, वे मूर्तियां जो बाहर रथापित की गयी हैं और वे प्रार्थनाएं जो बाहर हो रही हैं, झूठी हैं। असली मंदिर औ र असली परमात्मा प्रत्येक मनुष्य के भीतर बैठा हुआ है।

-ओशो 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

जीवन वही हो जाता है, जिस भाव को लेकर हम जीवन में प्रविष्ट होते हैं - ओशो

Life-becomes-the-same-with-which-we-enter-life-Osho

जीवन वही हो जाता है, जिस भाव को लेकर हम जीवन में प्रविष्ट होते हैं - ओशो 


एक छोटी-सी कहानी से मैं अपनी बात शुरू करना चाहता हूं। एक महानगरी में एक नया मंदिर बन रहा था। हजारों श्रमिक उस मंदिर को बनाने में संलग्न थे, पत्थर तोड़े जा रहे थे, मूर्तियां गढ़ी जा रही थीं, दीवालें उठ रही थीं, एक परदेशी व्यक्ति उस मंदिर के पास से गुजर रहा था। पत्थर तोड़ रहे एक मजदूर से उसने पूछा, मेरे मित्र क्या कर रहे हो? उस मजदूर ने क्रोध से अपनी हथौड़ी नीचे पटक दी, आंखें ऊपर उठाइ। जैसे उन आंखों में आग की लपटें हों, ऐसे उस मजदूर ने उस अजनबी को देखा और कहा-अंधे हैं, दिखाई नहीं पड़ता है, पत्थर तोड़ रहा हूं। यह भी पूछने और बताने की जरूरत है और वापस उसने पत्थर तोड़ना शुरू कर दिया।

वह अजनबी तो बहुत हैरान हुआ। ऐसी तो कोई बात उसने नहीं पूछी थी कि इतने क्रोध से उत्तर मिले, वह आगे बढ़ा और उसने मशगूल दूसरे मजदूर से, वह मजदूर भी पत्थर तोड़ता था, उससे भी उसने यही पूछा कि मेरे मित्र क्या कर रहे हो, जैसे उस मजदूर ने सुना ही न हो, बहुत देर बाद उसने आंखें ऊपर उठाइ, सुस्त और उदास हारी हुई आंखें जिनमें कोई ज्योति न हो, जिनमें कोई भाव न हो और उसने कहा कि क्या कर रहा हूं, बच्चों के लिए, पत्नी के लिए रोजी-रोटी कमा रहा हूं। उतनी ही उदासी और सुस्ती से उसने फिर पत्थर तोड़ना शुरू कर दिया।

वह अजनबी आगे बढ़ा और उसने तीसरे मजदूर से पूछा वह मजदूर भी पत्थर तोड़ता था। लेकिन वह पत्थर भी तोड़ता था और साथ में गीत भी गुनगुनाता था। उसने उस मजदूर से पूछा मेरे मित्र क्या कर रहे हो? उस मजदूर ने आंखें ऊपर उठाइ। जैसे उन आंखों में फूल झड़ रहे हों खुशी से, आनंद से भरी हुई आंखों से उसने उस अजनबी को देखा और कहा—देखने नहीं भगवान का मंदिर बना रहा हूं। उसने फिर गीत गाना शुरू कर दिया और पत्थर तोड़ना शुरू कर दिया।

वे तीनों व्यक्ति ही पत्थर तोड़ रहे थे, वे तीनों व्यक्ति ही एक ही काम में संलग्न थे लेकिन एक क्रोध से तोड़ रहा था, एक उदासी से तोड़ रहा था, एक आनंद के भाव से। जो क्रोध से तोड़ रहा था उसके लिए पत्थर तोड़ना सिर्फ पत्थर तोड़ना था, और निश्चय ही पत्थर तोड़ना कोई आनंद की, कोई अहोभाग्य की, बात नहीं हो सकती और जो पत्थर तोड़ रहा था स्वभावतः सारे जगत के प्रति क्रोध से भर गया हो तो आश्चर्य नहीं, जिसे जीवन में पत्थर ही तोड़ना पड़ता है, वह जीवन के प्रति धन्यता का कृतज्ञता का, भाव कैसे प्रकट कर सकता है। दूसरा व्यक्ति भी पत्थर तोड़ रहा था। लेकिन उदास था, हारा हुआ था। जो जीवन को केवल आजीविका बना ले, जो जीवन को केवल रोजी-रोटी का अवसर बना ले, वह स्वभावतः ही उदास और हारा हुआ हो जाने को है।

जीवन आजीविका बन कर आनंद को उपलब्ध नहीं हो सकता, तब जीवन होगा एक बोझ, तब जीवन होगा एक हारा हुआ उपक्रम, जिसमें प्रतिपल मृत्यु निकट आती चली जाती है, जिसे किसी तरह ढोना है और पूरा कर लेना है, वह आनंद का एक गीत नहीं, उदासी की एक कथा है, वह आनंद का एक उत्सव नहीं, कर्तव्य का एक बोझ है, जिसे निपटा देना है। तीसरा व्यक्ति आनंद से तोड़ता था, पत्थर को वह भी तोड़ रहा था। वे पत्थर भी ठीक वैसे ही पत्थर थे जैसे दूसरे मजदूर तोड़ रहे थे। उसके पत्थर तोड़ने के क्रम में भी कोई भेद न था, लेकिन वह भगवान का मंदिर बना रहा था, जीवन वह अगर आनंद को उपलब्ध हो जाए तो आश्चर्य कैसा। जीवन वही हो जाता है, जिस भाव को लेकर हम जीवन में प्रविष्ट होते हैं, जीवन वही हो जाता है, जो हम उसे बनाने को आतुर, उत्सुक और प्यासे होते हैं। जीवन मिलता नहीं, निर्मित करना होता है। जीवन बना-बनाया उपलब्ध नहीं होता सर्जन करना होता है।

-  ओशो 

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

धर्म की कोई शिक्षा नहीं होती, धर्म की तो साधना होती है - ओशो

There-is-no-education-of-religion,-religion-has-to-be-practiced---Osho


धर्म की कोई शिक्षा नहीं होती, धर्म की तो साधना होती है - ओशो 

मैं एक गांव में गया। वहां एक अनाथालय भी देखने गया। वहां कोई पचास बच्चे थे । उस अनाथालय के संयोजक ने मुझसे कहा कि इनको हम धार्मिक शिक्षा भी देते हैं। मुझे यह समझ कर कि मैं साधु जैसा हूं उसने सोचा कि यह खुश होंगे कि धर्म की शिक्षा देता हूं। मैंने कहा कि उससे बुरा काम दूसरा नहीं है दुनिया में, क्योंकि धर्म की शिक्षा आप क्या देंगे? धर्म की कोई शिक्षा होती है? धर्म की तो साधना ह ती है, शिक्षा नहीं होती।

अभी मैं सुनता हूं कि एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक ने अमरीका में एक संस्था खोली, जहां वह प्रेम की शिक्षा देते हैं। यह तो बड़ी बेवकूफी की बात है, यह तो बड़ी मू र्खतापूर्ण बात है। और इस संस्था से जो लोग प्रेम कि शिक्षा लेकर निकलेंगे, इस ज गत में वे प्रेम कभी नहीं कर पायेंगे। इसे स्मरण रखें, कैसे प्रेम करेंगे? वे जब भी प्रे म करेंगे, तब यह शिक्षा बीच में आ जायेगी और वह अभिनय करने लगेंगे, प्रेम नह " कर सकेंगे। जब उनके हृदय में कुछ कहने को होगा, तब वह उन किताबों से पढ़ कर कहेंगे, जिनमें लिखा हुआ है कि प्रेम की बातें कैसी कहनी चाहिए और तब वै सा आदमी, जो प्रेम में शिक्षित हुआ है, वंचित हो जाएगा और यह जो आदमी ध र्म में शिक्षित होगा, वह धर्म से वंचित हो जाएगा। धर्म तो प्रेम से बड़ी गूढ़ और र हस्य की चीज है। प्रेम को तो कोई सीख भी ले, धर्म को कैसे सीख सकेगा? धर्म क कोई लर्निंग नहीं होती। वह कोई गणित थोड़े ही है, कोई फिजिक्स थोड़े ही है, कोई भूगोल थोड़े ही है कि आपने समझा दिया, लागों ने याद कर लिया और परी क्षा दे दी। धर्म की कोई परीक्षा नहीं हो सकती है? ? अगर धर्म की परीक्षा नहीं हो सकती है तो शिक्षा भी नहीं हो सकती है। जिस चीज की परीक्षा हो सके, उसकी ही परीक्षा हो सकती है।

तो मैंने उनसे कहा कि यह तो आप बड़ा बुरा काम कर रहे हैं। इन बच्चों के मन को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं, क्या शिक्षा देते होंगे? तो वे बोले-आप क्या कहते हैं , जब धर्म की शिक्षा नहीं होगी तो लोग बिलकुल बिगड़ जायेंगे। मैंने कहा-दुनिया में धर्म की इतनी शिक्षा है, लोग भले दिखाई पड़ रहे हैं। दुनिया में धर्म की इतनी शिक्षा है, जितनी बाइबिल दीखती है उतनी कोई किताब नहीं दीखती, जितनी गीत । पढी जाती है कोई किताब नहीं पढ़ी जाती, जितने रामायण के पाठ होते हैं, उत ने कौन-सी किताब के होते होंगे? कितने संन्यासी हैं, कितने साधु हैं। एक-एक धर्म के कितने प्रचारक हैं। कैथोलिक ईसाइयों के प्रचारकों की संख्या ग्यारह लाख है। और इसी तरह सारी दुनिया के धर्म-प्रचारकों की संख्या है। यह इतना प्रचार, इतनी शिक्षा. इसके बाद आदमी कोई बना हआ तो मालूम नहीं होता है। इससे बिगड़ी शक्ल और क्या होगी, जो आदमी की आज है।

तो मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि धर्म।शिक्षा से आदमी नहीं ठीक होगा। मैंने उन से कहा-यह तो गलत बात है। फिर भी मैं समझू आप क्या शिक्षा देते हैं? उन्होंने कहा-आप कोई भी प्रश्न पूछिए, यह बच्चे हर प्रश्न का उत्तर देंगे। मैंने कहा-यही दु र्भाग्य है। सारी दुनिया में किसी से पूछिए, ईश्वर है? कह देगा, है। यही खतरा है। जिनको कोई पता नहीं है, वे कहते हैं है और इसका परिणाम यह होगा कि वह ध रे-धीरे अपने इस उत्तर पर खुद विश्वास कर लेंगे कि ईश्वर है और तब उनकी ख रोज समाप्त हो जाएगी।

मैंने उन बच्चों से पूछा-आत्मा है? वे सारे बच्चे बोले-है। उनके संयोजक ने पूछा-आ त्मा कहां है? उन सब बच्चों ने हृदय पर हाथ रखा और कहा-यहां। मैंने एक छोटे बच्चे से पूछा-हृदय कहां है? उसने कहा-यह हमें सिखाया नहीं गया।यह हमें बताय [ नहीं गया। मैंने उन संयोजक से कहा-ये बच्चे जब बड़े हो जायेंगे तो यही बातें दोहराते रहेंगे। और जब भी प्रश्न उठेगा, आत्मा है तो यांत्रिक मैकेनिकल रूप से, उन के हाथ भीतर चले जाएंगे और वे कहेंगे, यहां। यह बिलकुल झूठा हाथ होगा, जो सीखने की वजह से चला जाएगा।

आपके जितने उत्तर हैं परमात्मा के संबंध में, धर्म में वह सब सीखे हुए हैं। विवेक-जागरण के लिए पहली शर्त है, जो सीखा हुआ हो सत्य के संबंध में, उसे क चरे की भांति बाहर फेंक देना है। : जो आपके मां-बाप ने, आपकी शिक्षा ने, आपक । परंपरा ने, आपके समाज ने जो भी सिखाया हो, उसे कचरे की तरह बाहर फेंक देना। धर्म इतनी ओछी बात नहीं है कि कोई सिखा सके। इसमें मैं आपके मां-बाप का, आपकी परंपरा का अपमान नहीं रहा हूं, इसमें मैं आपके मां-बाप का, आपकी परंपरा का अपमान नहीं कर रहा हूं, इसमें मैं धर्म की प्रतिष्ठा कर रहा हूं। स्मरण रखें, मैं यह नहीं कह रहा कि परंपरा बुरी बात है।

पहली बात है जिज्ञासा, स्वतंत्र जिज्ञासा और जो सिखाया गया है, उसे कचरे की भ ति फेंक देने की जरूरत। इसके लिए साहस चाहिए। अपने वस्त्र छोड़ कर नग्न हो जाने के लिए उतने साहस की जरूरत नहीं है, जितने साहस की जरूरत मन के उन वस्त्रों को छोड़ने के लिए है जो कि परंपरा आपको पहना देती है और उन ढांचों को तोडने के लिए है. जो समाज आपको दे देता है। हम सबके मन बंधे हुए हैं एक ढांचे में। और उस ढांचे में जो बंधा है, वह सत्य की उड़ान नहीं भर सकेगा। इस के पहले कि कोई सत्य की तरफ अग्रसर हो, उसे सारे ढांचे तोड़कर मिटा देने होंगे । मनुष्य ने जितने भी विचार परमात्मा के संबंध में सिखाया हैं. उन्हें छोड़ देना होगा।

 - ओशो 

मौन हमारा स्वभाव है - ओशो

Silence-is-our-nature-Osho

मौन हमारा स्वभाव है - ओशो 

अनिषदों के समय में एक युवक सत्य की तलाश मग गया। उसने अपने गुरु के चरणों में सिर रखा और कहा, सत्य को पाना चाहते हो या सत्य के संबंध में कुछ पा ना चाहते हो? उसके गुरु ने कहा, सत्य को जानना चाहते हो या सत्य के संबंध में कुछ जानना चाहते हो। अगर सत्य के संबंध में कुछ जानना है तो फिर मेरे पास रुक जाओ, अगर सत्य को जानना है तो फिर मामला कठिन है।

उस युवक ने कहा, मैं सत्य को जानने आया, संबंध में जानने को नहीं आया। संबंध में ही जानन होत तो मेरे पिता खुद बड़े पंडित थे। सभी शास्त्र वे जानते थे। लेकिन जब मैंने उनसे कहा कि मैं सत्य को जानना चाहता हूं तो उन्होंने कहा, मैं असमर्थ हूं, तू कहीं और खोज। मैं सत्य के संबंध में जानता हूं। मैं शास्त्रविद हूं, मुझे सत्य का कोई पता न हीं। मैं सत्य को ही जानने आया हूं।

उसके गुरु ने कहा, तब ऐसा करो, इस आश्रम में जितने गाय बैल है, वे चार सी के करीब हज, इन सबको ले जाओ, दूर ऐसे जंगल में ले जाना, जहां कोई आदमी न हो, और जब यह गाय बैल हजार हो जाए, इनके बच्चे होंगे, और यह हजार हो जाएंगे, तब तुम लौट आना। और तब एक शर्त याद रखो, जो भी बात करनी हो, इन्हीं गाय बैलों से कर लेना, जो भी बात करनी हो इन्हीं से कर लेना। किसी आ दमी से मत बोलना जो भी तुम्हारे दिल में आए, इन्हें से कह लेना। इतने दूर चले जाना कि कोई आदमी न हो, और जब यह हजार हो जाए तो वापस लौट आना।

वह युवक, उन चार सौ गाय बैलों को खदेड़कर जंगल में गया। दूर से दूर गया, ज हां कोई भी नहीं था। वहां वे जानवर और वह अकेला रह गया। उनसे ही बातें कर नी पड़ती है। जो भी कहना होता है, उन्हीं से कहना होता है। उनसे क्या कहता? उनसे क्या बात करता? उनकी आंखों में तो कोई विचार न थे। गाय की आंख कभ देखी है? जब आपकी भी आंख वैसी हो जाए तो समझना कि कहीं पहुंच गए। उ स आंख में कोई विचार नहीं है, खाली और शून्य| उन आँखों में देखता, उन्हीं के प सि रहता और उन्हीं को चराता, पानी पिलाता और अकेला उन्हीं के बीच सा जाता वर्ष आए और गए।

कुछ दिन तक पुरानी घर की स्मृतियां चलती रही। लेक्ति नया भोजन न मिले तो पुरानी स्मृतियां मर जाती हैं। हम रोज नई स्मृतियों को भोजन दे देते हैं, इसलिए रिप्लेस होती चली जाती है। पुरानी मरती हैं, नयी भीतर पहुंच जाती है। अब नए का तो कोई कारण नहीं था। गाय बैल थे, उनके बीच रहना था, कोई नयी स्मृति का कारण न था। नई स्मृतियां पैदा न हुई, पुरानी को भोजन न । मला, वह क्रमश: मरती गयी, वह गाय बैल के पास रहते-रहते खुद गाय बैल हो गया। वह तो संख्या ही भूल गया।

गुरु ने कहा था, हजार जब हो जाए तो इनको लि वा ले आना, लेकिन वह तो भूल ही गया। बड़ी मीठी कहानी है, उन गायों ने कहा, हम हजार हो गए। वापस लौट चलो। यह तो काल्पनिक ही होगा, लेकिन इसका मतलब केवल इतना था कि उसे पता नहीं था कब गाय बैल हजार हो गए। और ज व गायों ने कहा हम हजार हो गए लौट चलो, गुरु ने दूर से देखा, वह हजर गाय बैल का झुंड आता था। उसने अपने शिष्यों को कहा, देखो, एक हजार एक-एक ह जार एक गाय बैल आ रहे हैं। शिष्य बोले एक हजार एक? और बीच में वह जो यु वा है? उसने कहा, उसकी आँखों में देखा। अब वह आदमी नहीं रहा। अब वह आदमी नहीं है। और जब वह करीब आया तो गुरु ने उसे गले लगा लिया और गुरु ने कहा, कहो मिल गया? वह युवक चुप रहा। उसने कहा, केवल आपके चरण छूने अ
या हूं। उसने गुरु के चरण छुए और वापस लौट गया।

उस मौन में, उसने जान लिया जो जानने जैसा था। अब तक, जो सदगुरु है वह मी न देता है और जो असद गुरु है, वह शब्द देता है। जो सदगुरु है, वह आपके ग्रंथ छीन लेता है, जो असद गुरु है वह आपको ग्रंथ दे देता है, जो सदगुरु है, वह आप के विचार अलग कर लेता है, जो असदगुरु है, वह आपके भीतर विचार डाल देता है। यही होता रहा है। और अगर सत्य को जानना हो, सत्य के संबंध में नहीं, तो मीन हो जाएं, चुप हो जाएं और चुप्पी को साधे, मौन को साधे। हमने स्मरणपूर्वक नहीं साधा। इसलिए नहीं साध पाए हैं। साधेगे, निश्चित ही साधा जा सकता है। क्य है? क्योकि विचार को साधना ही कठिन है, मौन तो हमारा स्वभाव है। अगर हमने थोड़ा सा भी प्रयास किया तो स्वभाव के झरने फूट पड़ेंगे, जड़ता टूट जाएगी, बह ज एगी और चैतन्य का प्रवाह हो जाएगा।

- ओशो 


बुधवार, 22 जुलाई 2020

धर्म से बड़ा विज्ञान इस जगत में दूसरा नहीं है - ओशो

Science-is-no-different-in-this-world-than-religion---Osho


धर्म से बड़ा विज्ञान इस जगत में दूसरा नहीं है - ओशो 


श्रद्धा धर्म के लिए आधार नहीं रह जानी चाहिए। ज्ञान, विवेक, शोध को धर्म का अंग हो जाना चाहिए। अगर यह हो सका तो धर्म से बड़ा विज्ञान इस जगत में दूसरा नहीं है। और जिन लोगों ने धर्म को खोजा और जाना है. उनसे बडे वैज्ञानिक नहीं ह ए। यह उनकी अप्रतिम खोज है। मनुष्य के जीवन में उस खोज से बहुमूल्य कुछ भी नहीं है। उन सत्यों की थोड़ी-सी भी झलक मिल जाए तो जीवन अपूर्व आनंद और अमृत से भर जाता है।

तो मैं आपसे कहूंगा, विवेक-जागरण श्रद्धा नहीं है। स्वीकार कर लेना नहीं, शोध क र लेना। किसी दूसरे को अंगीकार कर लेना नहीं स्वयं अपनी साधना और आपने पैर ों पर खड़ा होना और जानना, चाहे अनेक जन्म लग जायें। दूसरे के हाथ से लिया सत्य, अगर एक क्षण में मिलता हो तो भी किसी कीमत का नहीं है। और अगर अ नेक जन्मों के श्रम और साधना से, अपना सत्य मिलता हो तो उसका मूल्य है। और जिनके भीतर थोड़ी भी मनुष्य की गरिमा है, जिनको थोड़ा भी गौरव है कि हम मनुष्य हैं, वे किसी के दिये हुए झूठे सत्यों को स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन हम सब झूठे सत्यों को स्वीकार किये बैठे हैं। और हमने अच्छे-अच्छे शब्द ई जाद कर लिये हैं, जिनके माध्यम से हम अपनी श्रद्धा को जाहिर करते हैं। यह बहु त बड़ी प्रवंचना है, यह बहुत बड़ा डिसेप्शन है। यह समाप्त होना जरूरी है। मैं आप से कहूंगा, आपके भीतर बहुत बार श्रद्धा होती होगी कि मान लें तो कमजोर मन है। कौन खुद खोजे। जितने आलसी हैं, जितने तामसी हैं, वे सब श्रद्धालु हो जायेंगे।

लेकिन कौन खुद को खोजे, खुद कि कौन चेष्टा करे? कृष्ण कहते हैं तो ठीक ही होगा और महावीर कहते हैं तो ठीक ही होगा, क्राइस्ट कहते हैं तो ठीक ही होगा। उन्होंने सारी खोज कर ली, हमें तो सिर्फ स्वीकार कर लेना है। यह वैसा ही पागलपन है जैसा कोई आदमी दूसरों को प्रेम करते देख कर यह समझे कि मुझे प्रेम करने से क्या प्रयोजन! दूसरे लोग प्रेम कर रहे हैं, मुझे तो सिर्फ सम झ लेना है, ठीक है! लेकिन दूसरे को प्रेम करते देख कर क्या आप समझ पायेंगे कि प्रेम क्या है? इस जगत में सारे लोग प्रेम करते हों, मैं देखता रहूं तो भी मैं नहीं समझ पाऊंगा, जब तक कि वह आंदोलन मेरे हृदय में न हो। जब तक कि वे किर णे मुझे आंदोलित न कर जायें, जब तक कि वे हवाएं, मुझे न छू जायें, तब तक मैं प्रेम को नहीं जान सकूँगा। सारी दुनिया प्रेम करती हो तो वह किसी मतलब का न हीं। सारी दुनिया बुद्ध, कृष्ण और क्राइस्ट से भरी पड़ी हो और मुझे सत्य का स्वयं अनु भव न होता हो तो मुझे कुछ पता न चलेगा। कोई रास्ता नहीं है। सारी दुनिया में आंख वाले हों और मैं अंधा हूं तो क्या होगा? उन सबकी मिली हुई आंखें भी, मेरी दो आंखों के बराबर मूल्य नहीं रखती हैं। दस दुनिया में दो अरब लोग हैं, तीन अ रब लोग हैं, छह अरब आंखें हैं। एक अंधे आदमी की दो आंखों का जो मूल्य है, व ह छह अरब आंखों का नहीं है। मैं आपसे यह कहना चाहूंगा, अपने भीतर श्रद्धा की जगह, विवेक को जगाये रख ने का उपाय करना चाहिए

 - ओशो 

जिसे हम जीवन समझ रहे हैं, वह जीवन नहीं है - ओशो

What-we-understand-as-life-is-not-life-Osho

जिसे हम जीवन समझ रहे हैं, वह जीवन नहीं है - ओशो 


एक सूफी फकीर था इब्राहिम। एक गांव के बाहर रहता था। गांव के भीतर जाने वाले लोग उससे पूछते कि बस्ती का रास्ता कहां है? तो वह कहता था कि भूल कर भी बाएं मत जाना। बाएं की तरफ मरघट है और दाएं जाना। दाएं की तरफ बस्ती है। जो यात्री उसकी बात मान कर दाएं चले जाते-मील दो-मील चल कर मरघट पहुंच जाते तो बहुत क्रोध में लौटते और कहते इब्राहिम से कि तुम पागल हो गए हो। तुमने हमें कहा दाएं जाना, वहां बस्ती है, बाएं मत जाना, वहां, मरघट है। बाएं गए, वहां तो मरघट मिला, व्यर्थ हमें परेशान किया। इब्राहिम कहता कि मैं अपने अनुभव से कहता हूं कि जिसे तुम बस्ती करते हो वह मरघट है, क्योंकि वहां हर आदमी सिवाय मरने के और कुछ भी करने को नहीं, और जिसे तुम मरघट करते हो उसे मैंने बस्ती जाना, क्योंकि वहां जो एक बार बस गया उसे कभी उजड़ते नहीं देखा, जो वहां बस जाता है कभी छोड़कर नहीं जाता है।

तो जिसे हम जीवन समझ रहे हैं, वह जीवन नहीं है। अगर यह स्मरण न आए तो जीवन की कला का क, ख, ग, भी नहीं सीखा जा सकता है। अगर यह ही जीवन है तो बात समाप्त हो गई। फिर सीखने को कुछ नहीं बचता। लेकिन यह जीवन नहीं है और पहचान इस बात से हो सकती है कि इस प्रतिपल जी नहीं रहे हैं, केवल मृत्यु से बचने की सुरक्षा और आयोजन कर रहे हैं। भोजन जुटा रहे हैं, मकान बना रहे हैं, यश पद प्रतिष्ठा, धन, संपत्ति इकट्ठी कर रहे हैं। कोई पूछे कि ये सब अंततः इसका मूल्य क्या है? अंततः इसका मूल्य है कि मैं मर न जाऊंगा। मैं असुरक्षित न छूट जाऊं। कल भी जी सकू, परसों भी जी सकू इसलिए इंतजाम कर रहा हूं। लेकिन इस सारी व्यवस्था के बाद आदमी आखिर मृत्यु में पहुंच जाता है।

- ओशो 

मंगलवार, 21 जुलाई 2020

सत्य को कहा नहीं जा सकता - ओशो

Truth-cannot-be-said---Osho


सत्य को कहा नहीं जा सकता - ओशो 

रामकृष्ण के पास एक दफा एक व्यक्ति आया। रामकृष्ण से उसने कहा कि मुझे सत्य के संबंध में कुछ बतायें। रामकृष्ण से उसने कहा कि मुझे परमात्मा के संबंध में कुछ कहें। रामकृष्ण ने कहा-मुझे तुम्हारे पास आंखें तो दिखायी नहीं देतीं, तुम सम झोगे कैसे? वह बोला-आंखें मेरे पास हैं। रामकृष्ण ने कहा-अगर उन्हीं आंखों से परमात्म और सत्य जाना होता तो परमात्मा और सत्य को जानने की जरूरत ही न रह जाती, सभी लोग उसे जानते। और भी आंख है। और भी आंखें हैं। वह बोला-फि र भी कुछ तो समझायें।

रामकृष्ण ने एक कहानी कही। वह कहानी बड़ी मीठी है, बड़ी अद्भुत है। बड़ी प्राचीन कथा है, हजारों-हजारों ऋषियों ने उस कहानी को कहा है और आने वाले जमाने में भी हजारों-हजारों ऋषि उस कहानी को कहेंगे। उसमें बड़ी पवित्रता समाविष्ट हो गयी है। बड़ी छोटी-सी कहानी, बड़ी सरल-सी ग्रामीण कहानी है। राम कृष्ण ने कहा-एक गांव में अंधा था और उस अंधे को दूध से बहुत प्रेम था। उसके मित्र जब भी आते, उसके लिए दूध ले आते। उसने दफा अपने मित्रों से पूछा-इस दू ध को मैं इतना प्रेम करता हूं, इतना प्रेम करता हूं कि मैं जानना चाहता हूं कि दू ध कैसा है? क्या है? मित्रों नग कहा-मुश्किल है, कैसे बतायें? फिर भी उस अंधे ने कहा-कुछ तो समझायें, किसी तरह समझायें? उसके एक मित्र ने कहा-दूध बगुले के पंख जैसा सफेद होता है। अंधा बोला-मुझसे मजाक न करे। बगुले को मैं जानता नहीं, उसके पंख की सफेदी को नहीं जानता। मैं कैसे समझूगा कि दूध है! उस मित्र ने कहा-बगुला जो होता है, उसकी गर्दन घास काटने के हंसिए की तरह टेढ़ी होती है। अंधा बोला-आप पहेलियां बुझा रहे हैं।  मैंने कभी देखा नहीं हंसिया। मुझे पता नहीं, वह कैसा टेढ़ा होता है ? तीसरे मित्र ने क हा-इतनी दूर क्यों जाते हो? उसने अपना हाथ मोड़ कर उस अंधे से कहा-इस हाथ पर हाथ फेरो, इससे पता चल जायेगा कि हंसिया कैसा होता है? उसने उसके तिरछे हाथ पर हाथ फेरा-घूमा हुआ, मुड़ा हुआ हाथ, औंधा हाथ। वह अंधा नाचने लगा। वह बोला-मैं समझ गया, दूध मुड़े हुए हाथ की तरह होता है।

और रामकृष्ण ने कहा-सत्य के संबंध में जो नहीं जानते हैं, उनको बतायी हुई सारी बातें ऐसी ही हो जाती हैं। इसलिए आपसे सत्य के संबंध में न कुछ कहा गया है और न कभी कुछ कहा जा सकेगा। आपसे यह नहीं कहा जा सकता है कि सत्य क्य | है? आपसे इतना कहा जा सकता है कि सत्य को कैसे जाना जा सकता है। सत्य को नहीं बताया जा सकता, लेकिन सत्य की विधी का विचार किया जा सकता है । उस विधी में श्रद्धा का कोई हिस्सा नहीं है, खोज और अन्वेषण, जिज्ञासा और अ भीप्सा-उसमें किसी चीज को मान लेने की कोई जरूरत नहीं है। जब से दुनिया के धार्मिक ने यह शुरुआत की कि भगवान को मान लो, स्वीकार क र लो, अंगीकार कर लो, तब से जो भी विवेकशील हैं, वे सब भगवान के विरोध में खड़े हो गये हैं, क्योंकि स्वीकार करना, अज्ञान में किसी चीज को मान लेना, जि सका थोड़ा भी विचार जाग्रत हो और विवेक प्रबुद्ध हो, उसके लिए कभी भी संभव नहीं होगा। अपने हाथों से धार्मिकों ने धर्म को विवेक-विरोधी बना कर खड़ा कर ि दया है।

तो मैं आज की सुबह आपसे यह कहना चाहूंगा कि धर्म का विवेक से कोई विरोध नहीं है। धर्म भी परिपूर्ण रूप से विवेक को प्रतिष्ठा देता है और विवेक धर्म का खंडन नहीं है। विवेक के माध्यम से ही धर्म की परिपूर्ण उपलब्धि होती है। ले कन अपने भीतर विवेक को जगाना होता है, श्रद्धा को नहीं। विवेक और श्रद्धा मनुष्य के भीतर दो दिशाएं हैं। श्रद्धा का अर्थ है कि मैं मान लूं, जो कहा जाए। दुनिया के जितने प्रचारवाद हैं, सब यही चाहते हैं कि वे जो कहें, आप मान लें। दुनिया के जितने प्रोपेगैण्डिस्ट हैं, चाहे वे राजनीतिक हों, चाहे धार्मि क हों, वे चाहते हैं, जो भी वे कहें, आप मान लें। उनकी कही हुई बात में आप क ो कोई इंकार न हो। उन सबकी चेष्टाएं यह हैं कि आपका विवेक बिलकुल सो जाए और आपके भीतर एक अंधी स्वीकृति पैदा हो जाए।

इसका परिणाम यह हुआ है कि जो बहुत कमजोर हैं और जिनके भीतर विवेक की कोई संभावना नहीं है या जिनका विवेक बहुत क्षत था, क्षीण हो गया था या जो स हस नहीं कर सकते थे किसी कारण से अपने विवेक को जगाने का, वे सारे लोग धर्म के पक्ष में खड़े रह गये। और जिनके भीतर थोड़ा भी साहस था, वे सब धर्म के विरोध में चले गये। उन विरोधी लोगों ने विज्ञान को खड़ा किया और इन कमजोर लोगों ने धर्म को संभाले रखा। आज दोनों सामने खड़े हैं और धर्म रोज क्षीण होता जाता है, विज्ञान राज विकसित होता जाता है। इसे कोई देखता नहीं कि यह क्या हो रहा है। हम समझ रहे हैं | क विज्ञान नुकसान नहीं पहुंचा रहा है। धर्म के दरवाजे विवेकशील के लिए जब तक बंद रहेंगे, तब तक विवेकशील विज्ञान के पक्ष में खड़ा रहेगा। धर्म के द्वार विवेक शील के लिए खुल जाने चाहिए और विवेकहीन के लिए बंद हो जाने चाहिए।

 - ओशो 

मृत्यु की दिशा - ओशो



मृत्यु की दिशा - ओशो 

एक छोटी-सी कहानी मुझे स्मरण आती है। बल्ख में बल्ख के बादशाह ने एक रात एक सपना देखा रात उसने सपने में देखा कि कोई अंधेरी छाया, कोई काली छाया उसके कंधे पर हाथ रखे है। नींद में भी वह घबड़ा गया। उसने पूछा कि तुम कौन हो? उस काली छाया ने कहा कि मैं तुम्हारी मौत और आज सांझ तुम्हें लेने आती हूं। तुम ठीक जगह ठीक समय पर मुझे मिल जाना। सूरज डूबते ही डूबते मैं आने को हूं, ठीक जगह पर मुझे मिल जाना। यही खबर देने आई हूं। कि कहीं ऐसा न हो कि जहां मैं तुम्हें लेने आऊं, तुम वहां न मिलो।  उस सम्राट का मन था कि पूछ ले कि वह कौन-सी जगह है कि जहां मैं मिलूं, इसलिए कि वहां से बच जाऊं, बल्कि इसलिए कि वहां से बच जाऊं।

लेकिन नींद टूट गई। घबराहट में और वह पूछ नहीं पाया मौत से कि मैं किस जग मिलूं। इसलिए नहीं कि मैं जाऊं, बल्कि इसलिए ताकि वहां से बच सकूँ, उस जगह का पता चल जाए। लेकिन नींद टूट गई थी और मौत नहीं थी सामने। वह बहुत घबराया। आधी रात थी। उसने नगर में जो भी ज्ञानी थे, ज्योतिषी थे, पंडित थे, शास्त्रों को जानने वाले जीवन और मृत्यु के संबंध में बातें करते थे, उन सारे लोगों को आधी रात ही बुला लिया और उनसे कहा कि यह स्वप्न आया है, उसका क्या अर्थ है? क्या मैं आज सांझ मरने को हूं। अगर मरने को हूं, तो बचने का क्या इंतजाम है। कैसे बच सकता हूं। मौत से बचना जरूरी है। और ज्यादा देर नहीं है, थोड़ी ही देर में सुबह हो जाएगी और सूरज यात्रा शुरू कर देगा और फिर थोड़ी ही देर बाद सांझ हो जाएगी।

वे पंडित अपने शास्त्र ले आये। उन्होंने अपने शास्त्र खोले और वे विवेचन और व्याख्या में लग गए। लेकिन एक पंडित का विवेचन और व्याख्या दूसरे से मेल नहीं खाता, कभी-भी नहीं खाया पंडितों के विवेचन और व्याख्या है मैल, उसमें कोई संबंध कभी भी नहीं रहा। उन्होंने विवाद किया है। लेकिन आज तक वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे। सुबह होने लगी और विवाद इतना बढ़ गया कि वह सम्राट बोला—जब मैं जागा था, नींद से, तब मुझे सपना कुछ स्पष्ट भी था। तुम्हारी बातें सुनकर और भी अस्पष्ट हो गया है। मैं और भी भ्रम में पड़ गया हूं। जल्दी करो। उन पंडितों ने कहा जल्दी तो हम कर रहे हैं, लेकिन विवाद बढ़ता चलता गया।

सूरज उठने लगा तो सम्राट के प्राण कंपने लगे। सांझ-सांझ करीब आने लगी। उसके एक बूढ़े नौकर ने कहा कि इनकी बातों का निष्कर्ष शायद ही कभी निकले। सांझ जल्दी हो जाएगी और अच्छा यह हो कि उनको विवाद करने दें। आपने पास जो तेज घोड़ा है, उसको लेकर जितनी दूर इस महल से निकल सकें, निकल जाएं। चूंकि जिस रात महल में यह सपना आया है, संभव है कि मौत इसी महल में आती हो, तो हट जाएं इस महल से दूर। यह बात ठीक भी मालूम पड़ी। उस सम्राट ने अपने घोड़े पर सवारी की और वह भागा। जाते साथ समय उसे ख्याल भी न रहा उस पत्नी का, जिससे उसने अनेक बार कहा था कि तेरे बिना एक क्षण मैं जी भी नहीं सकता। उन मित्रों का कोई स्मरण न रहा, जिन्हें उनसे कहा था कि तुम ही मेरे जीवन हो, तुम ही मेरी खुशी हो, तुम ही मेरी-गीत हो, मौत सामने आती है, तो सारी बातें भूल जाती हैं।

वह भागा और दिन भर भागता रहा। उस दिन न तो उसे प्यास लगी और न भूख। मौत सामने थी – कैसे भूख थी, कैसी प्यास
और एक क्षण भी रुकना खतरनाक था। कौन जाने कितने निकट हो मौत महल के। इसलिए जितनी दूर निकल जाऊं उतना अच्छा। वह सांझ तक भागता रहा। बहुत तेज घोड़ा था उसके पास सैकड़ों मील दूर वह सांझ तक निकल गया, तो निश्चित हुआ। सूरज ढलता था। उसने एक बगीचे में अपना घोड़ा बांधा।

वह घोड़ा बांध भी नहीं पाया था कि पीछे कंधे पर किसी का हाथ उसे मालूम पड़ा। लौटकर देखा तो घबड़ाया—वही काली छाया थी? उसने पूछा तुम, तुम कौन हो? मृत्यु ने कहा रात आई थी—फिर भी पहचाने नहीं! धन्यवाद तुम्हारे घोड़े को अगर इतना तेज घोड़ा तुम्हारे पास न होता तो आज बड़ी मुश्किल थी। इस जगह पहुंच जाना बहुत जरूरी था। मैं यहां प्रतीक्षा करती थी। और बहुत भयभीत थी कि पता नहीं तुम ठीक समय पर पहुंच पाओ कि न पहुंच पाओ, लेकिन धन्यवाद तुम्हारे घोड़े को, बहुत तेज घोड़ा है और ठीक समय पर ठीक जगह ले आया।

आदमी जीवन भर भागता है, उपाय करता है, व्यवस्था करता है, सुरक्षा करता है और आखिर में सारी व्यवस्था, सारी सुरक्षा मौत में जाकर खड़ा कर देती है। सोचता था जो मैं उपाय कर रहा हूं, उससे मौत से बचूंगा, मिटने से बचूंगा, न होने से बच जाऊंगा। लेकिन वे सारे उपाय, उसके सारे आयोजन उसे न होने में ही ले जाते हैं। हमने मौत की तरफ कदम उठाए, इसलिए चाहे हम तेज घोड़े पर चलते हों, चाहे सुस्त घोड़े पर चलते हों, चाहे गरीब का घोड़ा हो, चाहे अमीर का घोड़ा हो, सभी घोड़े ठीक जगह पर ठीक समय पर, पहुंचा देते हैं। हम शायद जो दिशा लें, वह दिशा ही मृत्यु की है।

- ओशो 

सोमवार, 20 जुलाई 2020

भीतर चेतना है, अंतर्गृह है, जीवन स्पंदन है - ओशो

There-is-consciousness-inside-inner-being-life-is-vibrating-Osho

भीतर चेतना है, अंतर्गृह है, जीवन स्पंदन है - ओशो 

एक जर्मन विचारक हेरिडेल पूरब की यात्रा को आया हुआ था। वह पूरब के मुल्कों में उन लोगों की तलाश में था, जिन्हें जीवन उपलब्ध हो गया हो। वर्षों भटकता रहा, लेकिन उसे वह आदमी दिखाई नहीं पड़ा, जिसे जीवन उपलब्ध हो गया हो। उसे संन्यासी मिले, उसे साधु मिले, लेकिन वे भी उसे मृत्यु की तरफ ही जाते हुए मालूम हुए। वे भी नहीं दिखाई पड़े। जिन्हें वह किरण, वह सूत्र मिल गया है, जो जीवन की तरफ ले जाने वाला है। फिर वह थक गया और वापस लौटने को था उन दिनों जापान में था और जिस दिन लौटना था—किसी ने कहा एक संन्यासी को मैं और जानता हूं। जाने के पहले उससे और मिल लें। इतने दिनों की खोज के बाद वह निराश हो गया था। फिर उसने सोचा कि क्यों एक मौका और है। एक मौका और खोजने का है। कई बार ऐसा होता है कि आदमी यात्रा के अंतिम चरण से वापस लौट आता है, कई बार ऐसा होता है कि एक हाथ और खोदा जाता और कुएं में पानी आ जाता। कौन जानता है यह आदमी, वही आदमी हो, जिसकी उसे खोज हो।

वह उस साधु के पास गया। उसे निमंत्रित किया भोजन के लिए उस जापान के छोटे नगर में एक बड़े होटल में उस साधु को आमंत्रित कुछ और मित्रों को बुलाया। वे सात मंजिल मकान में लकड़ी के मकान में बैठकर बातें करते थे। भोजन करते थे। उस साधु से कुछ पूछा था। वह उत्तर देता था, फिर अचानक भूकंप आ गया। सारे मकान कंप गए। पास के मकान गिर गए, हाहाकार मच गया। फिर कौन वहां बैठता, भोजन के लिए, कौन वहां साधु को सुनने को रुकता। सारे लोग भागे। सात मंजिल मकान था, लकड़ी का हवा में कंप रहा था, पत्ते की तरह, जो किसी भी क्षण गिरता और प्राण जाते। लोग भागे, लेकिन कोई पच्चीस-तीस लोग थे संकरी सीढ़ियां थीं और भीड़ हो गई और लोग रुक गए। हेरिडेल भी भागा। लेकिन भीड़ थी, रास्ता नहीं था, सीढ़ियों पर उसे खयाल आया-मैं मेजबान हूं(होस्ट) हूं और मैं भागा जा रहा हूं। मेहमान का क्या हुआ—अतिथि कहां है, लौटकर उसने देखा जिस साधु को बुला लाए थे, वह अपनी जगह बैठा है, वह भागा नहीं है। उसके चेहरे पर भागने का कोई खयाल भी नहीं है। उसकी आंख जरूर बंद है और वह ऐसा भी नहीं मालूम होता जैसे कोई आदमी हो। इतना शांत मालूम होता है जैसे कोई मूर्ति हो।

हेरिडेल के मन में हुआ कि मैं भाग जाऊं मेहमान का खतरे में छोड़कर यह तो शिष्टता न होगी, रुक जाना चाहिए। फिर यह भी खयाल आया कि जो उसका होगा वही मेरा भी होगा। किसी तरह अपने को रोक कर वह भी साधु की कुर्सी पर बैठ गया। हाथ-पैर कंपते हैं, उसके प्राण डरे हुए हैं। खतरा है, मौत का। लेकिन दस पांच क्षण और—और भूकंप चला गया। उस साधु ने आंख खोली और भूकंप के जाने से बात टूट गई थी, जहां से, वहीं से बात शुरू कर दी। हेरिडेल तो हैरान हुआ जैसे कि भूकंप आया ही न हो। उसने उस साधु से कहा- हम भूल गए थे कि क्या बात होती थी भूकंप आने के पहले। इतनी बड़ी घटना घट गई, इतना बड़ा विनाश हो गया है, हम इतने घबड़ा गए हैं कि मुझे याद भी नहीं कि हमने क्या पूछा था। आप छोड़ें उस बात को अब अब तो मुझे दूसरी ही बात पूछनी है। भूकंप आया, आप भागे नहीं? भूकंप का क्या हुआ?

उस साधु ने कहा, भागा तो मैं भी, भागे तुम भी, लेकिन तुम बाहर की तरफ भागे और मैं भीतर की तरफ भागा। और मैं तुमसे कहता हूं कि तुम्हारा भागना बिलकुल व्यर्थ था, क्योंकि तुम भाग रहे थे वहां भी भूकंप था। भूकंप से ही भूकंप में भागने का क्या अर्थ है? क्या प्रयोजन, क्या अभिप्राय है? शायद तुम पागलपन में भाग रहे थे, क्योंकि भूकंप से भूकंप में भागने से कौन-सा अर्थ है? शायद तुम्हें कुछ सूझ नहीं पड़ता था। इसलिए भाग रहे थे। मैं उस जगह भागा जहां कोई मुकाम कभी नहीं पहुंचता है। मैं भीतर की तरफ भागा, मैं उस जगह भागा जहां मृत्यु की कोई छाया कभी नहीं पहुंचती। मैं जीवन की तरफ भागा। अगर हम जीवन में निरंतर बाहर की तरफ भाग रहे हैं तो स्मरण रहे कि जीवन की कला को कभी-भी नहीं सीखा जा सकता। बाहर मृत्यु है, बाहर भूकंप है, भीतर जरूर चेतना है, अंतर्गृह है, वहां जीवन स्पंदन है। यहां जहां से जीवन का बीज फूटता और अंकुरित होता है, वहां लौटें तो ही जीवन को जाना और जीया जा सकता है।

 - ओशो 

रविवार, 19 जुलाई 2020

भगवान, आदमी के अज्ञान और अहंकार की घोषणा है - ओशो


भगवान, आदमी के अज्ञान और अहंकार की घोषणा  है - ओशो 

महावीर बुद्ध को, कृष्ण को, क्राइस्ट को कितना ही ज्ञान मिला हो, एक रत्ती भर भी, अपना ज्ञान वह आपको देने में समर्थ नहीं हैं। इस जगत में ज्ञान दिया-लिया नहीं जा सक ता और सब चीजें ली-दी जा सकती हैं। और स्मरण रखें जो नहीं लिया जा सकता, नहीं दिया जा सकता, वही मूल्यवान है। जो लिया जा सकता है, दिया जा सकता है उसका कोई मूल्य नहीं है। मैं तो ऐसा ही मानता हूं कि वही चीज संसार का हिस्सा है, जिसको हम ले-दे सकते हैं और वह चीज सत्य का हिस्सा हो जाती है जिसका लेना -देना संभव नहीं है। कोई इस आशा में न रहे कि वह अपनी श्रद्धाओं से सत्य की या परमात्मा की खोज कर लेगा। साधारणतया यही हमें सिखाया जाता है और इस के दुष्परिणाम हुए हैं। इसके परिणाम हुए हैं कि दुनिया में इतने लोग धार्मिक हैं, ले किन धर्म कहां है? इतने मंदिर हैं, इतनी मस्जिदें हैं, लेकिन मंदिर-मस्जिद हैं कहां?

कल रात मैं बात करता था-एक संन्यासी के पास मेरा एक मित्र मिलने गया था। उस संन्यासी ने कहा-मंदिर जाते हो? मेरे उस मित्र ने कहा-मंदिर है कहां? हम तो जरूर जाएं, कोई मंदिर बता दे! वह संन्यासी तो हैरान हुआ। वह संन्यासी तो मंदि र में ठहरा हुआ था। उस संन्यासी ने कहा-यह जो देख रहे हो, यह क्या है? उस यु वक ने कहा-यह तो मकान है, यहां मंदिर कहां है? यह तो मकान है। और उस यु वक ने कहा- सारी जमीन पर. जिनको लोग मंदिर और मस्जिद कहते हैं. वे मकान हैं, मंदिर कहां हैं? और जिनको आप मूर्तियां कह रहे हैं, जिनको आप भगवान क । मूर्तियां कह रहे हैं-कैसी आत्मप्रवंचना है, कैसा धोखा है! मिट्टी और पत्थर को, अपनी कल्पना से हम भगवान बना लेते हैं, जैसे कि हम भगवान के स्रष्टा हैं।

सुना था मैंने कि भगवान मनुष्यों का स्रष्टा है, देखा यही कि आदमी, मनुष्य ही भ गवान के स्रष्टा हैं और हर एक आदमी अपनी-अपनी शक्ल में भगवान को बनाये हु ए बैठा है। भगवान ने दुनिया को सभी बनाया या नहीं, यह तो संदेह की बात है, लेकिन आदमी ने भगवान की खूब शक्लें बनायी हैं, यह स्पष्ट ही है। और जो भगव न आदमी का बनाया हुआ हो, उसे भगवान कहना, आदमी के अज्ञान और अहंकार की घोषणा के सिवाय और कुछ भी नहीं है। जो आदमी का बनाया हुआ हो, उसे भगवान कहना, आदमी के अज्ञान और अहंकार की घोषणा के सिवाय और क्या है?

- ओशो 

मन की सारी क्रिया बाहर की यात्रा है, मन की अक्रिया भीतर की यात्रा है - ओशो

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मन की सारी क्रिया बाहर की यात्रा है, मन की अक्रिया भीतर की यात्रा है - ओशो 


सिकंदर हिंदुस्तान की तरफ आता था, रास्ते में वह एक फकीर डायोजनीज से मिलने गया। डायोजनीज़ लेटा था धूप में । सर्दी के दिन थे और धूप का आनंद ले रहा था नग्न। सिकंदर ने उसे लेटे देखकर कहा इतने खुश मालूम होते हो डायोजनीज़ और तुम्हारे पास जहां तक मैं देखता हूं, मैं तुमसे कह सकता हूं- तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। हालांकि तुम्हारे पास बहुत-कुछ दिखाई पड़ता है। मेरे पास जीवन है और तुम्हारे पास केवल मृत्यु से सुरक्षा की व्यवस्था की जो कुछ भी सुरक्षित नहीं कर पाएगा, क्योंकि जीवन का उसे कोई पता ही नहीं, जिसे सुरक्षित करना है, जैसे कोई अंधेरे से बचने का उपाय करे, और दिये का उसे पता न हो, क्या करेगा वह आदमी? अंधेरे से बचने के लिए। अंधेरे से बचने के लिए जो किया जा सकता है, सिवाय इसके लिए कि हम कल्पना कर लें कि अंधेरा ही प्रकाश है।

इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं किया जा सकता और यही हमने किया है कि हम मृत्यु को ही जीवन कहने लगे हैं, जबकि हमें जीवन का कोई पता नहीं और मृत्यु से बचना अंधेरे से बचने को कोई भी उपाय नहीं होगा, सिवाय इसके कि प्रकाश आपके पास हो। प्रकाश है तो अंधेरा नहीं है। प्रकाश नहीं है तो अंधेरा है। प्रकाश का अभाव ही अंधेरा है। जीवन का हमें कोई पता नहीं, इसीलिए मृत्यु है। जीवन का हमें पता हो तो फिर मृत्यु नहीं, मृत्यु जीवन के अनुभव का अभाव है। मृत्यु की कोई सत्ता नहीं, अंधेरे की कोई सत्ता नहीं । सिकंदर ने कहा, तुम्हारी बात तो ठीक मालूम होती है। लेकिन अभी तो मैं विश्व की विजय को निकला हूं।

डायोजनीस हंसने लगा, जो अपने को भी नहीं जीता पाया, वह विश्व की विजय को निकल पड़ता है, जो अपने को भी नहीं जीत पाया, वह जगत को जीतने निकल पड़ा है। विक्षिप्त हो गए हैं आप। शायद सचाई यह है कि इस बात का हमें पता न चले कि मैं अपने के नहीं जीत पाया, इसलिए हम जगत को जीतने में संलग्न हो जाते हैं। जगत को जीतने में तो इस बात को भूले रहते हैं कि मैं अपने को भी नहीं जीत पाया हूं,
वैसा तो दुनिया में कोई भी आदमी नहीं हंस सकता था। वैसा तो वही हंस सकता है, जो जीवन को अनुभव करता हो, मृत्यु से घिरा हुआ आदमी हंस कैसे सकता है उसका हंसना ही भुलावा है, धोखा है, वंचना है। वैतरणी पर वह गूंजती हुई हंसी की आवाज उसने लौट कर पीछे देखा, वह नंगा फकीर डायोजनीज़ आ रहा है। हंस क्यों रहा है सिकंदर बहुत हतप्रभ हुआ और उसे खयाल आया कि डायोजनीज़ ने कहा था कि यह यात्रा अधूरी रह जाएगी। और तुम समाप्त हो जाओगे, अपने को जीत लो, दुनिया को जीतने की यात्रा कभी पूरी नहीं होती है, और आज यह बात सच हो गई और वह शायद इसलिए हंस रहा है

लेकिन सिकंदर ने हिम्मत जुटाई, वह सम्राट था, एक फकीर के सामने हार जाएगा, उसने भी हंसने की कोशिश की। लेकिन हंसी बड़ी फीकी थी। हिम्मत बढ़ाने के लिए उसने जोर से चिल्लाकर डायोजनीज़ को कहा, बड़ा खुश हूं तुमसे मिलकर। शायद ही वैतरणी पर ऐसी घटना कभी घटी हो। एक बादशाह और एक भिखारी का मिलना हो रहा है, शायद ही कभी ऐसा हुआ हो वैतरणी पर इतना बड़ा बादशाह और तुम जैसा नंगा भिखारी। यह अपने में हिम्मत जुटाने के लिए उसने कहा था। लेकिन डायोजनीस और-और जोर से हंसने लगा। उसने कहा, तुम ठीक कहते हो—कहने में कि कौन बादशाह है, कौन भिखारी है। बादशाह पीछे है और भिखारी आगे है। सिकंदर आगे था, डायोजनीज़ कहने लगा, तुम ठीक कहते हो। एक बादशाह का एक भिखारी से मिलना, लेकिन जरा भूल करते हो, कौन बादशाह है, कौन भिखारी। मैं सब कुछ जीत कर लौट रहा हूं। क्योंकि मैंने जीवन को जाना है और तुम सब कुछ हार कर लौट रहे हो, क्योंकि तुमने जीवन के अतिरिक्त जो भी जीता जाता है, वह मृत्यु में विलीन हो जाता है और समाप्त हो जाता है।

जीवन की विजय ही अकेली विजय है और जीवन की दिशा अंतरस्थ की, भीतर की दिशा है। और एक बार भीतर उदघाटन हो जाए जीवन का तो फिर सब तरफ उसके पर्दे उठ जाते हैं। सब दिखाई पड़ता है, वह सब जगह मौजूद है— फूल में भी, पत्थर में भी, चांद में भी, तारे में भी, मिट्टी में भी, कण-कण में वह जीवन है। फिर उसका नृत्य दिखाई पड़ना शुरू हो जाएगा, लेकिन पहले अपने में खोज लेना जरूरी है। एक दूसरी बात आपसे कहना चाहता हूं—जीवन की दिशा क्या है ? जीवन की दिशा अंतरस्थ की दिशा है और हमारा मन चौबीस घंटे बाहर और बाहर है, शायद ही कभी हम भीतर हैं। सच तो यह है कि जब तक मन काम करता है, हम बाहर ही होते हैं। जब मन कान नहीं करता तभी हम भीतर होते हैं। जब मन क्रिया में संलग्न होता है तब तक हम बाहर होते हैं, जब तक मन सोचता है तब तक हम बाहर होते हैं, जब तक मन कुछ भी करता है, तब तक हम बाहर होते हैं। मन की सारी क्रिया बाहर की यात्रा है, मन की अक्रिया भीतर की यात्रा है।

- ओशो 

शनिवार, 18 जुलाई 2020

सत्य के मार्ग पर स्वयं के सिवाय कोई और साथी नहीं है - ओशो

There-is-no-other-partner-on-the-path-of-truth-except-yourself---Osho


सत्य के मार्ग पर स्वयं के सिवाय कोई और साथी नहीं है - ओशो 


आप भगवान से डरते हैं आप नास्तिक होंगे, आस्तिक नहीं हो सकते। कुछ लोग कहते हैं, जो भगवान से डरे वह आस्तिक हैं-गॉड-फियरिंग, जो ईश्वर से डरता हो, वह आस्तिक है। यह बिलकुल झूठी बात है। ईश्वर से डरने वाला कभी आस्तिक नहीं हो सकता, क्योंकि डरने से कभी प्रेम पैदा पहीं होता। और जिससे ह म भय खाते हैं, उसको बहुत प्राणों के प्राण में घृणा करते हैं। यह तो संभव ही नह ीं है। भय के साथ भीतर घृणा छिपी होती है। जो लोग भगवान से भयभीत हैं, वे भगवान के शत्रु हैं और उनके मन में भगवान के प्रति घृणा होगी तो मैं आपसे कहूं, ईश्वर से भय मत खाना। ईश्वर से भय खाने का कोई भी कार ण नहीं है। इस सारे जगत में अकेला ईश्वर ही है, जिससे भय खाने का कोई कार ण नहीं। और सारी चीजें भय खाने की हो सकती हैं।

लेकिन हुआ उलटा है। और मैं बड़े-बड़े धार्मिकों को यह कहते सुनता हूं कि ईश्वर का भय खाओ। और ईश्वर का भय खाने से पुण्य पैदा होगा। और ईश्वर का भय खाने से सच्चरित्रता पैदा होग । ये निहायत झूठी बातें हैं। भय से कहीं सदाचार पैदा हुआ है? जैसे हमने रास्ते पर पुलिस वाले खड़े कर रखे हैं, वैसे ही हमने परलोक में भगवान को खड़ा कर रख है। वह एक बड़े पुलिया वाले कि हैसियत से है, एक बड़े कांस्टेबल की हैसियत से है। भगवान को जिन्होंने कांस्टेबल बना दिया है, उन लोगों ने धर्म को बहुत नुकसान पहुंचाया है।

 भगवान के प्रति भय से कोई विकसित नहीं होता। भगवान के प्रति तो अभय चाहिए और अभय का अर्थ क्या होगा? अभय का अर्थ होगा, जो लोग श्रद्धा करते हैं, वे लोग भय के कारण श्रद्धा करते हैं । इसलिए श्रद्धा को मैं धर्म की आधारभूत शर्त नहीं मानता। आपने सुना होगा कि जिसका धार्मिक होना है, उसे श्रद्धालु होना चाहिए। गांधीजी से एक बहुत बड़े व्यकि त ने जाकर पछा कि मैं परमात्मा को जानना चाहता है तो क्या करूं? तो गांधीजी ने कहा, विश्वास करो। अगर वह मुझसे पूछता तो मैं उससे यह नहीं कहता कि ि वश्वास करो। गांधीजी कि बात ठीक नहीं है और उस आदमी ने गांधी से कहा, वि श्वास करूं? जिस बात को जानता नहीं, विश्वास कैसे करूं? जिस बात से मैं परिरी चत नहीं, उसे मानूं कैसे? गांधी ने कहा, बिना माने तो परमात्मा को जाना नहीं ज | सकता। और मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि जो मान लेते हैं, वे कभी नहीं जान सकेंगे।

मैं आपसे यह कहता हूं कि जो परमात्मा को मान लेते हैं, वे कभी नहीं जान सकेंगे। यह आपका दुर्भाग्य होगा कि आप परमात्मा को मानते हों, क्योंकि मानन को अर्थ यह हुआ कि आपने जिज्ञासा और खोज के द्वार बंद कर दिये। मानने का अर्थ यह हुआ कि अब आपकी कोई तलाश नहीं है, अब आपकी कोई खोज नहीं हैं, अब आपकी कोई इन्क्वायरी नहीं है। अब आप कछ खोज नहीं रहे हैं. आप तो मा न कर बैठ गये, आप तो कर गये। श्रद्धा मृत्यु है। और संदेह जीवन है। संदेह खोज है। तो मैं आप से श्रद्धालु होने को नहीं, मैं आप से संदेहवान होने को कहता हूं। लेकिन संदेह करने का यह मतलब मत समझ लेना कि मैं आपको ईश्वर को न मानने को कह रहा हूं, क्योंकि न मान ना भी मानने का एक रूप है। आस्तिक भी श्रद्धालु होता है, नास्तिक भी श्रद्धालु हो ता है। आस्तिक की श्रद्धा है कि ईश्वर है, नास्तिक की श्रद्धा है कि ईश्वर नहीं है।

वे दोनों अज्ञानी हैं। इन दोनों की श्रद्धाएं हैं, इन दोनों की खोज नहीं है। संदेह ती सरी अवस्था है, आस्तिक और नास्तिक दोनों ही नहीं। संदेह तो स्वतंत्र चित्त की अ वस्था है। वैसा व्यक्ति निर्भय होकर पूछता है, क्या है? और न वह परंपरा को मान ता है, न वह रूढ़ि को मानता है, न वह शास्त्र को मानता है। वह किसी दूसरे के दीये को अंगीकार नहीं करता। वह यही कहता है कि खोजूंगा अपने दीया। वही सा थी हो सकेगा। दूसरों के दीये कितनी देर तक, कितनी सीमा तक साथ दे सकते हैं और जीवन के इस रास्ते पर सच तो यह है कि अपने सिवाय, स्वयं के सिवाय कोई और साथी नहीं है।

- ओशो 


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

जो बीत गया, उसमें चिपटे रहने से जागना संभव नहीं - ओशो

It-is-not-possible-to-stay-awake-by-sticking-to-what-has-passed---Osho
ओशो


चित्त निरंतर बह रहा है नदी की तरह - ओशो 

          बुद्ध के ऊपर एक आदमी ने आकर थूक दिया। थूककर वह चला भी गया, फिर बाद में पछताया और दुखी हुआ, क्योंकि बुद्ध ने तो उस थूक को सिर्फ पोंछ लिया था, और उस आदमी से कहा था, कुछ और कहना है?

          किसी भिक्ष ने पूछा, आप कहते हैं, कुछ और कहना है? और उस आदमी ने थूका है। बुद्ध ने कहा, कोई बात इ तनी प्रगाढ़ रूप से कहना चाहता होगा जिसे शब्द कहने में समर्थ नहीं हो सके, इस लए थूककर उसने जाहिर किया है। गुस्सा तेज है, उसने गुस्से को जाहिर किया है। इसलिए में पूछता हूं कुछ और कहना है? यह तो समझ गया।

          लेकिन वह आदमी कुछ कह नहीं सका, वापस चला गया, पछताया, दूसरे दिन क्षमा मांगने आया। उस ने बुद्ध के पैर छुए और उसने कहा, मुझे माफ कर दें। मुझसे कल भूल हो गई थी। बुद्ध ने कहा, वह भूल उतनी बड़ी नहीं थी जितनी बड़ी भूल यह है कि तुम अब तक उसे याद रखे हो। बुद्ध ने कहा वह भूल उतनी बड़ी नहीं थी। तूने थूका, मैंने पोंछ दिया, बात समाप्त हो गयी मामला ही क्या है, दिक्कत कहां है, कठिनाई क्या है उसमें, लेकिन यह कि तुम अभी तक उसे याद रखे हो चौबीस घंटे बीत गए, यह तो बहुत बड़ी भूल है। यह तो वह बहुत बड़ी भूल है। मैं तुम्हें वही आदमी नहीं मनिता हूं, जो थूक गया था, यह दूसरा आदमी है जो मेरे सामने आया है, क्योकि यह तो कह रहा है कि मुझसे भूल हो गयी है, मुझे क्षमा कर दो यह वह आदमी न ही है जो थूक गया था, बिलकुल दूसरा आदमी है। मैं किसको क्षमा करूं, जो थूक गया था वहे तो अब कही है नहीं और जो क्षमा मांग रहा है उसने मुझ पर थूका न हीं था।

          बुद्ध ने कहा, जिसने मुझ पर थूका था, वह अब है नहीं, कही भी इस दुनिया में। खोजने पर भी नहीं मिलेगा, और जो क्षमा मांग रहा है, उसने मुझ पर थूका नहीं। मैं किसको क्षमा करूं और तुम किससे क्षमा मांग रहे हो? जिस पर थूक गए थे, वह तो बह गया।

          जैसे नदी बही जा रही है, हम सोचते हैं वही गंगा है, जिस पर हम कल भी आए थे। गंगा बह गयी। बहुत पानी बह गया, जब आप कल आए थे। अब यह बिलकुल दूसरा पानी है, जिसको आप कल की गंगा समझ रहे हैं। और जसे गंगा बह जाती है, वैसे आपको चित्त भी बह रहा है। वह प्रति क्षण बह्य जा रहा है, कुछ भी ठहराव नहीं है उस चित्त में। बुद्ध ने कहा, तुम किससे क्षमा मांगते हो? व ह आदमी तो गया, में कैसे क्षमा करूं| तो बुद्ध ने कहा, इतना ही स्मरण रखो जो हो गया, उसे जाने दो, बह जाने दो, जो है, उसमें जागो।।

         हम, जो बीत गया है उसमें इतने चिपटे रहते हैं कि जो उसमें नहीं जाग पाते। हम सारे लोग मूर्दा लाशों को लिए रहते हैं, इसलिए जिंदा आदमी नहीं हो पाते। अतीत को मर जाने दें तो आपको जीवन मिलेगा। और जो आदमी जितने अतीत को मर जाने देगा और रोज नया हो जाएगा, रोज ताजा हो जाएगा, वह ऐसे जागेगा जैसे पहली बार दुनिया में पैदा हुआ है। उस आदमी के भीतर जड़ता इकट्ठी नहीं होगी।

- ओशो 


साधू- सन्यासियों की शांति झूठी है - ओशो

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साधू- सन्यासियों की शांति झूठी है - ओशो 

          एक विदेशी यात्री पूरब के मुल्कों में यात्रा को आया और उसने सोचा कि मैं देखू अ और समझू कि योग क्या है। उसने भारत के और तिब्बत के और जापान के, पूर्वी मुल्कों में जाकर आश्रम देखे। फिर वह बर्मा गया और वहां लोगों ने तारीफ की कि एक आश्रम यहां भी है, उसे भी देखो। उसने जो आश्रम भारत में देखे थे, वे पहाड़ों पर थे, रग्य झीलों के किनारे थे, सुंदर उपवन थे, वहां थे। भारत में जो संन्यासी देखे थे. वे घर छोड़े हए लोग थे, नए-नए वस्त्रों के लोग थे। उसने सोचा, वैसा ही कोई रम्य स्थल होगा।

        वह तीन सप्ताह का निर्णय करके बर्मा के उस आश्रम के लि ए गया। लेकिन जब जिस गाड़ी से वह गया और जब उसे पहुंचाया गया आश्रम के सामने, तो वह दंग रह गया। वह तो एक बाजार था, जहां आश्रम था और रंगून का सबसे रद्दी बाजार था और वहां तो बड़ी भीड़ भाड़ थी बड़ा शोर गल था। और वहीं वह छोटी सी तख्ती लगी थी और एक गंदे रास्ते के अंदर जाकर एक आश्रम था। आश्रम बड़ा था, पांच सौ भिक्षु वहां थे। लेकिन कोई सौ डेढ़ सौ कुत्ते वहां धूम रहे थे और लड़ रहे थे और बड़ा परेशान हुआ कि यह कैसा आश्रम है। और सांझ का वक्त था और सैकड़ों हजारों कौवे इकट्ठे हो रहे थे, झाड़ों पर। इतना शोरगुल वहां मचा था, उसने सोचा, यह आश्रम है या बाजार है। यहां रहने से क्या फायदा होगा।

          लेकिन आ गया था और जब रात भर रुकना ही पड़ेगा, सुबह के पहले वापस लौट ने के लिए कोई गाड़ी भी नहीं थी। तो उसने जाकर प्रधान से मिलना चाहा। प्रधान से कहा, मैं तो हैरान हो गया। मैं तो सोचता था, आश्रम किसी पहाड़ के किनारे य । किसी झील के पास किसी सुंदर जगह में होगा। वह तो गंदा बाजार है और यहां इतने कते किस लिए हैं और यह कौवे इतने किस लिए इकट्ठे कर लिए हैं। उस साधू ने कहा, यह कुत्ते जो हैं, यह हमारे पाले हए हैं और कौवे जो हैं. हमारे आमंत्रित हैं। इन्हें हम रोज चावल देते हैं, इसलिए जाते हैं, और कुत्ते तो हमने पाले हुए हैं। यह शोरगुल व्यवस्थित है। यह बाजार हमने चुना है, जानकर। जमीन बहुत थी हमारे मुल्क में सुंदर, लेकिन बाजार हमने जानकर चुना है। क्योंकि हमारी म न्यता यह है कि जो इस भीड़ भाड़ में, इस उपद्रव में शांत हो सकता है, उसकी शांति ही सच्ची है। और जो पहाड़ के पास जाकर बैठकर शांत हो जाता है उस शांति में, उसके पास कोई शांति नहीं है। वह सारी शांति पहाड़ की है, और पहाड़ से नीचे उतरते अशांति शुरू हो जाएगी।
          इसलिए संन्यासी पहाड़ से बस्ती में आने से डरते है। इसलिए संन्यासी अकेलेपन से भीड़ में आने से डरता है। इसलिए संन्यासी लोगों से डरने लगता है कि उनके पास गया कि मेरी सब शांति नष्ट हो जाएगी। अगर आप किसी संन्यासी से कहें, दुकान पर बैठो, वह घबड़ाएगा, वह कहेग, मेरी सब शांति नष्ट हो जाएगी। अगर आप किसी संन्यासी से कहें, नौकरी करो, वह क हेगा, मैं घबड़ाऊंगा, मेरा परमात्मा छूट जाएगा। जो परमात्मा नौकरी करने से छूट जाता हो और जो परमात्मा दूकान पर बैठ जाने से अलग हट जाता हो, ऐसे परमात्मा की कोई कीमत नहीं है। ऐसे परमात्मा का कोई मूल्य नहीं है।

          जीवन की सहजता में, और सामान्यता में जो उपलब्ध हो, वही सत्य है। जीवन की सत्य स्थितियों में जो उपलब्ध हो, उन स्थितियों का परिणाम होता है, आपके चित्त का परिवर्तन न ही होता है। इसलिए आप जितने संन्यासियों को देखते है, उनको वापस ले आइये और सामान्य जिंदगी में डाल दीजिए और फिर पहचानिए कि उनके भीतर क्या है तो आप जाएंगे कि यह आदमी आपसे गए बीते और बदतर लोग हैं। यह आपसे नीचे सा बत होंगे। जिंदगी में यह नहीं टिक सकते। वहां कसौटी है, वहां परीक्षा है। यह एक कोने में बैठे हुए हैं। इनकी सारी शांति आरोपित और पलायन की शांति है इसलि ए इनके भीतर भय और डर बना रहता है। इनके भीतर घबड़ाहट बनी रहती है। इ नके भीतर हमेशा डर बना रहता है कि अगर मैं गया तो सब गड़बड़ हो जाएगा।

 - ओशो 

दुनिया को संन्यासियों की कोई जरूरत नहीं है, दुनिया को संन्यास की जरूरत है - ओशो

The-world-does-not-need-saints-the-world-needs-sannyas---Osho

दुनिया को संन्यासियों की कोई जरूरत नहीं है, दुनिया को संन्यास की जरूरत है - ओशो 

          जो आदमी गृहस्थी में दुखीऔर पीड़ित और परेशान था वह संन्यासी होकर कभी आनंदित नहीं हो सकता. व योकि वह आदमी तो वही का वही है। कपड़े बदलने से क्या होगा? जो आदमी दुकान पर परेशान और पीड़ित है, वह मंदिर में जाकर आनंद को उपलब्ध नहीं हो सकता, क्योंकि वह आदमी तो वही का वही है। दुकान थोड़ी परेशान कर रही है। मकान थोड़ी परेशान कर रहा है मंदिर थोड़ी आनंद देगा। वह आदमी जैसा है. अपने साथ ही ले जाएगा।

          यह बड़े आश्चर्य की बात है, अपने से भागना संभव नहीं होता। कोई अपने से नहीं भाग सकता। आप सारी दुनिया को छोड़कर भाग जाए लेकिन अप तो अपने साथ होंगे और आप जैसे आदमी हैं, ठीक वैसी दुनिया जहां आप होंगे फिर आप पैदा कर लेंगे। इसलिए जब गृहस्थ भागकर संन्यासी हो जाते हैं तो वे नयी गृहस्थियां बसाने लगते हैं, शिष्यों की, शिष्याओं की नयी दुनिया बसनी शुरू हो जाती हैं। जब वे घर को छोड़कर भाग जाते हैं तो आश्रम बसने लगते हैं। इधर का रंग छोड़ते हैं तो वहां का नया राग पैदा कर लेते हैं। इधर एक तरफ से जो छोड़कर गए हैं नयी शक्लों में फिर का फिर वही खड़ा हो जाता है। और वह बिलकल स्व भाविक है। इसमें कोई अस्वाभाविकता नहीं कि आदमी वे, वे ही के वे हैं जो कि घर थे, जो कि दुकान में थे। इसलिए जब कोई आदमी दुकान को छोड़कर संन्यासी होता है तो वह धर्म की नयी दुकान शुरू कर देता है। और दुनिया में जो धर्म की दुकाने शुरू हुई हैं, वह उन दु कानदारों के कारण हुई हैं जो कि दुकानदार थे और संन्यासी हो सके। उनकी बुद्धि, उनके सोचने के ढंग, उनके गणित और हिसाब वही के वे हैं। उनकी वृत्ति, उनकी पकड़, उनकी एप्रोच वही की वही है। वे, वे ही के आदमी हैं, और इसलिए जितने  ज्यादा दुकानदार संन्यासी होते जाते हैं उतना ज्यादा संन्यास दुकानदारी में परिणत होता जाता है।

          दुनिया में संन्यासियों की जरूरत नहीं है, दुनिया में संन्यास की जरूरत है, संन्यासियों की कोई जरूरत नहीं। मैं आपसे कहूँ, दुनिया में संन्यास की जरूरत है. संन्यासियों की कोई जरूरत नहीं है। दुनिया में संन्यास जितना ज्यादा होगा, दुनिया उतनी बेहतर होगी और दुनिया में संन्यासी जितना ज्यादा होंगे दुनिया उतनी मुश्किल में पड़ती जाएगी। यह कल्पना करिए, सारे लोग संन्यासी हो गए हैं. इस दुनिया का क्या होगा? इसलिए स्थिति कैसे बदतर हो जाएगी। लेकिन यह कल्पना करिए कि दुनिया में संन्यास बढ़ता जाता है, यह दुनिया बहुत बेहतर हो जाएगी।

-ओशो 

अपने दीपक स्वं बनो - ओशो

अपने दीपक स्वं बनो - ओशो


अपने दीपक स्वं बनो - ओशो 

एक अंधेरी रात में एक युवक ने एक साधु से पूछा कि क्या आप मुझे सहारा न देंगे अपने गन्तव्य पर पहुंचने में? गुरु ने एक दीया जलाया और उसे साथ लेकर चला। और जब वे आश्रम का द्वार पार कर चुके तो साधु ने कहा-अब मैं अलग हो जाता हूं। कोई किसी का साथ नहीं कर सकता है और अच्छा है कि तम साथ के आदी हो जाओ. मैं इसके पहले विदा हो जाऊं। इतना कह कर उस घनी रात में, अंधेरी रात में, उ सने उसके हाथ के दीये को भी फूंक कर बुझा दिया।

वह युवक बोला-यह क्या पाग लपन हुआ? अभी तो आश्रम के हम बहार भी नहीं निकल पाये, साथ भी छोड़ दिया और दीया भी बुझा दिया। उस साधु ने कहा-दूसरों के जलाये हु ए दीये का कोई मूल्य नहीं है। अपना ही दीया हो तो अंधेरे में काम देता है, किसी दूसरे के दीये काम नहीं देते। खुद के भीतर से प्रकाश निकले तो ही रास्ता प्रकाशि त होता है और कैसी तरह रास्ता प्रकाशित नहीं होता।

तो मैं निरंतर सोचता हूं, लोग सोचते होंगे कि मैं आपके हाथ में कोई दीया दे दूंगा , जिससे आपका रास्ता प्रकाशित हो जायेगा तो आप गलती में हैं। आपके हाथ में दीया होगा तो मैं उसे बड़ी निर्ममता से फूंक कर बुझा सकता हूं। मेरी मंशा और मे रा इरादा यही है कि आपके हाथ में, अगर कोई दूसरे का दिया हुआ प्रकाश हो तो मैं उसे फूंक दं, उसे बुझा दं। आप अंधेरे में अकेले छट जाएं. कोई आपका संगी-स थी हो तो उसे भी छीन लूं। और तभी, जब आपके पास दूसरों का जलाया हुआ प्र काश न रह जाए और दूसरों का साथ न रह जाए, तब आप जिस रास्ते पर चलते हैं, उस रास्ते पर परमात्मा आपके साथ हो जात है और आपकी आत्मा के दीये के जलने की संभावना हो जाती है। सारी जमीन पर ऐसा हुआ है, सत्य की तो बहुत खोज है. परमात्मा की बहत चर्चा है। लेकिन-लेकिन ये सारे कमजोर लोग कर रहे हैं, ये साथ छोड़ने को राजी नहीं है, न दीया बुझाने को राजी हैं। अंधेरे में जो अ केले चलने का साहस करता है, बिना प्रकाश के, उसके भीतर साहस का प्रकाश पैद | होना शुरू हो जाता है और जो सहारा खोजता है, वह निरंतर कमजोर होता चल | जाता है।

भगवान को आप सहारा ने समझें। और जो लोग भगवान को सहारा समझते होंगे वे गलती में हैं, उन्हें भगवान का सहारा उपलब्ध नहीं हो सकेगा। कमजोरों के लिए जगत में कुछ भी उपलब्ध नहीं होता। और जो शक्तिहीन हैं और जिनमें साहस की कमी है, धर्म उनका रास्ता नहीं है। दीखता उलटा है। दिखाता यह है कि जितने कमजोर हैं, जितने साहस हीन हैं, वे सभी धार्मिक होते हुए दिखा यी पड़ते हैं। कमजोरों को, साहस हीनों को, जिनकी मृत्यु करीब आ रही हो, उनक ो घबराहट में, भय में धर्म ही मार्ग मालूम होता है। इसलिए धर्म के आस-पास कम जोर और साहस हीन लोग इकट्ठे हो जाते हैं, जबकि बात उलटी है। धर्म तो उनके लिए है, जिनके भीतर साहस हो, जिनके भीतर शक्ति हो, जिनके भीतर अदभ्य हम्मत हो और जो खुद अंधेरे में अकेले, बिना प्रकाश के चलने का दुस्साहस करते हों। यह मैं प्राथमिक रूप से आपसे कहूं-दुनिया में यही वजह है कि जब से कमजोरों ने धर्म को चुना है तब से धर्म कमजोर हो गया है। और अब तो सारी दुनिया में कम जोर लाग ही धार्मिक हैं। जिनमें थोड़ी-सी भी हिम्मत है, वे धार्मिक नहीं हैं। जिनमें थोड़ा-सा साहस है, वे नास्तिक हैं और जिनमें साहस की कमी है, वे सब आस्तिक हैं। भगवान की तरफ सारे कमजोर लोग इकट्ठे हो गये हैं, इसलिए दुनिया में से ध र्म नष्ट होता चला जाता है।

इन कमजोरों को भगवान तो बचा ही नहीं सकता, ये कमजोर भगवान को कैसे बचायेंगे? कमजोरों की कोई सुरक्षा नहीं है और कमजोर लोग कि सी की रक्षा कैसे करेंगे? सारी दुनिया में मनुष्य के इतिहास के इन दिनों में, इन क्षणों में, जो धर्म का अचा नक हास हुआ और पतन हुआ है, उसका बुनियादी कारण यही है। तो मैं आपसे क हूं, अगर आप में साहस हो तो ही धर्म के रास्ते पर चलने का मार्ग खुलता है। न हो तो दुनिया में बहुत रास्ते हैं। धर्म आप में भी नहीं हो सकता। जो आदमी भय के कारण भयभीत होकर धर्म की तरफ आता हो, वह गलत आ रहा है। लेकिन सारे धर्म-पुरोहित तो आपको भय देते हैं-नरक के भय, स्वर्ग का प्रलोभन, प प-पुण्य का भय और प्रलोभन और घबराहट पैदा करते हैं। वे घबराहट के द्वारा आ प में धर्म का प्रेम पैदा करना चाहते हैं। और यह आपको पता है, भय से कभी प्रेम पैदा नहीं होता? और जो प्रेम भय से पैदा होता है, वह एकदम झठा होता है, उ सका कोई मूल्य नहीं होता।

 - ओशो