गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

प्रयोग करें, परिणाम की चिंता नहीं - ओशो

Use-not-worried-about-the-result-Osho


प्रिय आत्मन, प्रणाम। 

        पूरी मई वाहर रहने से स्वास्थ्य पर कुछ बुरा असर हुआ। इसलिए जून में आ योजित बंबई, कलकत्ता और जयपुर के सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिए हैं।समाधि योग पर आप प्रयोग कर रहे है यह जान कर प्रसन्नता हुई। परिणाम की नहीं, प्रयोग की चिंता करें; परिणाम तो एक दिन आ ही जाता है, वह अनुक्रम से नहीं, अनायास से आता है, ज्ञात भी नहीं पड़ता है, और उसका आगमन हो जाता है और एक क्षण में जीवन कुछ से कुछ हो जाता है। भगवान महावीर पर अभी नहीं लिखा रहा हूं। लिखने के प्रति मुझसे कोई प्रेरणा ही न हीं है। आपकी जबरदस्ती से कुछ हो सके तो बात दूसरी है। 

        शेष शूभ। 


रजनीश के प्रणाम
३ जून १९६३ प्रति : लाल सुंदरलाल, दिल्ली 


बुधवार, 30 दिसंबर 2020

नीति नहीं, योग-साधना - ओशो

Yoga-not-policy-Osho


प्रिय, आत्मन, प्रणाम। 

            मैं अभी अभी राज नगर (राजस्थान) लौटा हूं। वहां आचार्य श्री तुलसी के म र्यादा महोत्सव में आमंत्रित था । कोई कोई ४०० साधु-साध्वियों को ध्यान-योग के सा महिक प्रयोग से परिचित कराया है। अदभूत परिणाम हुए है। मेरा देखना है कि ध्यान समग्र धर्म साधना का केंद्रीय तत्व है और शेष, अहिंसा, अप रग्रह, ब्रह्मचर्य आदि उसके परिणाम हैं। ध्यान की पूर्णता-समाधि-उपलब्ध होने से वे अपने आप चले आते हैं। उनका विकास सहज ही हो जाता है। इस मूल साधना को भूल जाने से हमारा सब प्रयास बाह्य और सतही होकर रह जाता है। धर्म साधना को री नैतिक साधना नहीं है; वह मूलत: योग साधना है। केवल नीति नकारात्मक है औ र नकार पर कोई स्थायी भिति खड़ी नहीं है। योग विधायक है और इसलिए वह आध र है। मैं इस विधायक आधार को सव तक पहुंचा देना चाहता हूं। 


रजनीश के प्रणाम
१२ फरवरी १९६३ रात्रि। प्रति : लाला सुंदरलाल, दिल्ली ।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

योग-अनुसंधान - ओशो

Yoga-Research-Osho


प्रिय आत्मन, प्रणाम। 

        आपका पत्र पढ़ कर अत्यंत प्रसन्नता हुई। मैं अभी तो कुछ भी नहीं लिखा हूं।एक ध्यान केंद्र जरूर यहां बनाया है, जिसमें कुछ साथी प्रयोग कर रहे हैं। इन प्रयोग में से उपलब्ध नतीजों से परिपूर्ण रूप से सुनिश्चित हो जाने पर अवश्य ही कुछ लिखने की संभावना है। मैं अपने स्वयं के प्रयोगों पर निश्चित निष्कर्षों पर पहुंचा हूं। पर उ नकी अन्यों के लिए उपयोगिता को भी परख लेना चाहता हूं। मैं शास्त्रीय ढंग से कुछ भी लिखना नहीं चाहता-मेरी दृष्टि वैज्ञानिक है। मनोवैज्ञानिक और परा मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर योग के विषय में कुछ कहने का विचा र है। इस संबंध में बहुत ही भ्रांत धारणाएं देख रहा हूं। इस कार्य में मेरी दृष्टि में क ई संप्रदाय या पक्ष का अनुमोदन भी नहीं है। इस और कभी आवे तो बहुत सी चर्चा हो सकती है। 

रजनीश के प्रणाम
१ अक्तूबर १९६२ प्रति : लाला सुंदरलाल, दिल्ली

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

स्वयं डूब कर सत्य जाना जाता है - ओशो

Truth-is-known-by-drowning-itself-Osho


प्रिय आत्मन, 

        आपका पत्र मिल गया था। कुछ लिखने के लिए आपका कितना प्रेमपूर्ण आग्रह है! औ र मैं हूं कि अतल मौन में डूब गया हूं। बोलता हूं; काम करता हूं; पर भीतर है कि सतत एक शून्य घिरा हुआ है। वहां तो कोई गति भी नहीं है। इस भांति एक ही सा थ दो जिन जीता हुआ मालूम होता है। कैसा अभिनय है? पर शायद पूरा जीवन ही अभिनय है। और यह वोध एक अदभुत मुक्ति का द्वार खोल रहा है। वह जो क्रिया के बीच अक्रिया है-गति के बीच गति शून्य है-परिवर्तन के वीच नित्य है-वही है सत्य; वही है सत्ता। वास्तविक जीवन इस नित्य में ही है। उस के बाहर केवल स्वप्नों का प्रवाह है। सच ही, वाहर केवल स्वप्न हैं। उन्हें छोड़ने, न छोड़ने का प्रश्न नहीं-केवल उसके प्रति जागना ही पर्याप्त है। और जागते ही सब परिवर्तित हो जाता है। वह दीखता है जो देख रहा है। और केंद्र बदल जाता है। प्रकति से परुष पर पहंचना हो जाता है। यह पहुंच क्या दे जाती है? कहा नहीं जा सकता है। कभी कहा नहीं गया। कभी कहा भी नहीं जाएगा। स्वयं जाने विना जानने का और कोई मार्ग नहीं है। स्वयं पर कर मृत्यू जानी जाती है। स्वयं डूब कर सत्य जाना जाता है। प्रभु सत्य मग डुबाये यही कामन | है। 


रजनीश के प्रणाम
१३ अगस्त, १९६२ प्रभात प्रति : लाला श्री सुंदरलाल, बंगलों रोड, जवाहर नगर, दिल्ली-७

रविवार, 27 दिसंबर 2020

प्रतीक्षा - ओशो


Wait-Osho

प्यारी जया,

        प्रेम। तेरा पत्र मिला है। तेरे प्राणों की प्यास को, मैं भलीभांति जानता हूं। और वह क्षण भी दूर नहीं है, जव वह तृप्त हो सकेगी। तू बिलकुल सरोवर के किनारे ही खड़ी है। केवल आंख ही भर खोलनी है। और मैं देख रहा हूं कि पलकें खुलने के लिए तैयारी भी कर रही है। फिर मैं साथ हूं -सदा साथ हूं-इसलिए जरा भी चिंता मत कर। धैर्य रख और प्रतीक्षा कर। वीज अपने अनुकूल  समय पर ही टूटता है और अंकुरित होता है। वहां सबको मेरे प्रणाम कहना। शेष मिलने पर। 



रजनीश के प्रणाम
प्रभात १९-९-१९६८ प्रति : श्रीमती जयवंती शुकल, जूनागढ़, गुजरात

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

जीवन : जल पर खींची रेखा-सा - ओशो

Life-A-line-drawn-on-water-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        आपका पत्र मिला है। जन्म-समय की खोज-खवर करनी पड़ेगी। दिन शायद ११ दिसंबर है। लेकिन यह भी पक्का नहीं। लेकिन ज्योतिषी मित्र को कहें : क्यों परेशान होते हैं? भविष्य आ ही जाएगा, इसलिए उसकी ऐसी चिंता नहीं करनी चाहिए। फिर कुछ भी क्यों न हो-अंतत: सब बराबर है। धूल धूल में वापिस लौट जाती है। और जीवन जल पर खींची रेखाओं सा विलीन हो जाता है। वहां सबको मेरे प्रणाम कहें। 



रजनीश के प्रणाम
१२-१२-१९६८

ऊपर एक पत्र प्रस्तुत है आचार्य श्री का जो श्री अनूप बाबू, सुरेंद्रनगर को लिखा गया है। श्री अनूप वाबू ने आचार्य श्री से आचार्य श्री की जन्म तारीख और समय बताने का आग्रह किया था किसी ज्योतिषी मित्र के परामर्श से-उसी संदर्भ का है यह पत्र।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020

कूद पड़ो-शून्य में - ओशो

Jump-Into-Zero-Osho


प्रभात 

        मेरे प्रिय, प्रेम। 

                तुम्हारा पत्र पाकर आनंदित हूं। सत्य अज्ञात है और इसलिए उसे पाने के लिए ज्ञात को छोड़ना ही पड़ता है। ज्ञात (ज्ञदवूद) के तट से मुक्त होते ही अज्ञात। (न्नदादवूद) के सागर में प्रवेश हो जा ता है। साहस करो और कूद पड़ो। शून्य में-महाशून्य में। क्योंकि वहीं प्रभु का आवास है। सवको प्रेम। या कि एक को ही। आह! वही एक तो है। बस वही है। सब में भी वही है। सर्व में भी। और शून्य में भी। 


रजनीश के प्रणाम
प्रति : श्री ओमप्रकाश, अग्रवाल, जालंधर, पंजाब 
१८-६-१९६८

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

जिसे भी सत्य को पाना है, उसे सत्य के संबंध में सारे मत छोड़ने होंगे - ओशो

Whoever-has-to-get-the-truth,-he-has-to-give-up-all-the-opinions-regarding-the-truth-Osho


जिसे भी सत्य को पाना है, उसे सत्य के संबंध में सारे मत छोड़ने होंगे - ओशो 


        मेरे पड़ोस में, गांव में एक आदमी रहता था। वह जंगल से तोतों को पकड़ कर ला ता और उनको पिंजड़ों में बंद कर देता। कुछ दिन वे तड़फड़ते उड़ने की कोशिश क रते, फिर वे पिंजड़े कि आदी हो जाते। यहां तक वे पिंजड़ों के आदी हो जाते कि । अगर उनके पिंजड़े को खोल दिया जाए तो वे थोड़ी देर बाहर जाकर वापस अपने ि पजड़े में आ जाते हैं। बाहर असुरक्षा लगती ओर भीतर सुरक्षा मालूम होती। 

        करीब-करीब ऐसी ही हमारे मन की हालत हो गयी है। हमारा चित्त, परंपरा, संस्का र, दूसरों के दिए गए विचार और शब्दों में इस भांति बंध गया है कि उसके बाहर हमें डर लगता है, घबड़ाहट होती है। डर लगता है कि कहीं सुरक्षा न खो जाए। क ही जिस भूमि को हम अपने पैर के नीचे समझ रहे हैं वह हिल न जाए, इसलिए ह म डरते हैं, इसलिए हम बाहर निकलने से घबड़ाते हैं। और जो अपने घरों के बाहर __नहीं निकल सकेगा, वह परमात्मा को कभी नहीं पा सकेगा। उससे मिलना हो तो सब घेरे तोड़ ही देने होंगे। जिसे भी सत्य को पाना है, उसे सत्य के संबंध में सारे मत छोड़ देने होंगे। जिसे भी सत्य को पाना है, उसे पार विश्वास को छोड़कर विवे क को जाग्रत करना होगा। जिसका विवेक जाग्रत होगा, वही केवल सत्य को, वही केवल धर्म के मूलभूत सत्य को अनुभव कर पाता है। 

-ओशो 

तैरें नहीं, बहें - ओशो

 

Do-not-swim-float-Osho

मेरे प्रिय, प्रेम। 

        पत्र मिला है। मैं तो सदा साथ हूं। न चिंतित हों, न उदास। साधना को भी पर मात्मा के हाथों में छोड़ दें। जो उसकी मर्जी। स्वयं तो जो जावें-एक सूखे पत्ते  की भांति। फिर हवाएं चाहे जहां ले जावें। क्या यही शून्य का अर्थ नहीं है? तैरें, नहीं, बहें। क्या यही शून्य का अर्थ नहीं है? वहां सबको मेरे प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
१०-९-१९६८ प्रति : श्री ओम प्रकाश अग्रवाल, जालंधर, पंजाब

शक्ति स्वयं के भीतर है - ओशो

  

Power-is-within-oneself-Osho

प्रिय कृष्ण चैतन्य, 

    प्रेम। 

            तुम्हारा पत्र पाकर आनंदित हूं। शक्ति है तुम्हारे स्वयं के भीतर। लेकिन, उसका तुम्हें पता नहीं है। इसलिए, तुम्हारी ही शक्ति को तुम्हीं को पाने के लिए भी निमित्त की जरूरत पड़ती जिस दिन यह जानोगे उस दिन हंसोगे। लेकिन तब तक मैं निमित्त का काम करने को राजी हूं। मैं तो हंसने ही रहा हूं और उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूं; जब कि तुम भी इस व्र ह्म-अट्टहास (वेि उपव संनहीजमत) में सम्मिलित हो सकोगे। देखो : कृष्ण हंस रहे हैं, वुद्ध हंस रहे हैं। सूनो : पृथ्वी हंस रही है, आकाश हंस रहा है। लेकिन, आदमी रो रहा है। क्योंकि, उसे पता ही नहीं है कि वह क्या है। आह! कैसा मजा है? कैसा खेल है? सम्राट भीख मांग रहा है और मछली सागर में प्यासी है!

रजनीश के प्रणाम 

२७-१०-१९७० प्रति : स्वामी कृष्ण चैतन्य, संस्कार तीर्थ, आजोल गुजरात

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

जीवन की अखंडता - ओशो

Integrity-of-life-Osho


मेरे प्रिय, प्रेम। 

        आपका प्रेमपूर्ण पत्र पाकर अत्यंत अनुगृहीत हूं। लेकिन, जीवन को मैं अखंड मानता हूं। और उसे खंड खंड तोड़कर देखने में असमर्थ हूं। वह अखंड है ही। और चूंकि आज तक उसे खंड खंड करके देखा गया है, इसलिए वह विकृत हो गया है। न राजनीति है, न नीति है, न धर्म है। है जीवन। है परमात्मा। समग्र और अखंड। उसे उसके सब रूपों में ही पहचानना, खोजना और जीना है। इसलिए मैं जीवन के समय पहलुओं पर बोलना जारी रखेंगा। और अभी तो सिर्फ शुरुआत है। पत्रकारों को उत्तर देना तो सिर्फ भूमिका तैयार करनी है। लेकिन सब पहलुओं से उसकी यात्रा करनी है।

        सब मार्गों से उसकी ओर ही चलना है। शायद इस सत्य को समझने में मित्रों को थोड़ी देर लगेगी। वैसे सत्य को समझने में थोड़े देर लगना अनिवार्य ही है। लेकिन जो सत्य के खोजी हैं वे भयभीत नहीं होंगे। सत्य की खोज में अभय तो पहली शर्त है। और यह भी ध्यान में रहे कि अध्यात्म जब तक समग्र जीवन का दर्शन नहीं बनता है तव तक वह नपुंसक ही सिद्ध होता, और उसकी आड़ में सिर्फ पलायनवादी ही शर ण पाते हैं। अध्यात्म को बनाना है शक्ति। अध्यात्म को बनाना है क्रांति । और तभी अध्यात्म को बचाया जा सकता है। वहां सबको मेरा प्रणाम कहें। 


रजनीश के प्रणाम
२७-३-६९ प्रति : सर्व श्री एम. टी. कामदार,
सुरेश वी. जोशी, नानुभाई और श्री कारेलिया, भावनगर (गुजरात)

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

प्यासी प्रतीक्षा-प्रेम की - ओशो

 

प्यासी प्रतीक्षा-प्रेम की - ओशो Thirsty-wait-love-osho

प्रिय सोहन, 

        पत्र मिला है। मैं तो जिस दिन से आया हूं, उसी दिन से प्रतीक्षा करता था। पर, प्रती क्षा भी कितनी मीठी होती है! जीवन स्वयं ही एक प्रतीक्षा है। बीज अंकुरित होने की प्रतीक्षा करते हैं और सरिताएं सागर होने की। मनुष्य किसकी प्रतीक्षा करता है? वह भी तो किसी वृक्ष के लिए वीज है और किसी सागर के लिए सरिता है! कोई भी जब स्वयं के भीतर झांकता है, तो पाता है कि किसी असीम और अनंत में पहुंचने की प्यास ही उसकी आत्मा है। और, जो इस आत्मा, को पहचानता है, उसके चरण परमात्मा की दिशा में उठने प्रारं भ हो जाते हैं; क्योंकि प्यास का वोध आ जावें और हम जल स्रोत की ओर न चलें, यह कैसे संभव है? यह कभी नहीं हुआ है और न ही कभी होगा। जहां प्यास है, वहां प्राप्ति की तलाश भी है। मैं इस प्यास के प्रति ही प्रत्येक को जगाना चाहता हूं, और प्रत्येक के जीवन को प्रती क्षा में बदलना चाहता हूं। प्रभू की प्रतीक्षा में परिणत हो गया जीवन ही सद जीवन है। जीवन के शेष सब उपयग उपव्यय हैं और अनर्थ हैं। माणिक वाबू को प्रेम। 

रजनीश के प्रणाम
२४-४-६५ (दोपहर) प्रति : सुश्री सोहन, पूना

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

ढाई आखर प्रेम का - ओशो

ढाई आखर प्रेम का - ओशो Two-and-a-half-love-Osho


प्रिय सोहन, 

        तू इतने प्यारे पत्र लिखेगी, यह कभी सोचा भी नहीं था! और ऊपर से लिखती है कि मैं अपढ़ हूं! प्रेम से बड़ा कोई ज्ञान नहीं है और जिनके पास प्रेम न हो, वे अभागे ही केवल अपढ़ हो सकते हैं। जीवन में असली वात बुद्धि नहीं, हृदय हैक्योंकि, आनंद और आलोक के फूल बुद्धि से नहीं, हृदय से ही उत्पन्न होते हैं। और, वह हृदय तेरे पास है और बहुत है। क्या मेरी गवाही से बड़ी गवाही भी तू खोज सकती है? यह तूने क्या लिखा है कि मुझसे कोई भूल हुई हो तो मैं लिखू? प्रेम ने आज तक जमीन पर कभी कोई भूल नहीं की है। सब भूलें अ-प्रेम में होती हैं। मेरे देखे तो जीवन में प्रेम का अभाव ही एकमात्र भूल है। वह जो मैंने लिखा था कि प्रभु मेरे प्रति ईर्ष्या पैदा करे, वह किसी भूल के कारण नह f; वरनजो अनंत आनंद मेरे हृदय में फलित हुआ है उसे पाने की प्यास तेरे भीतर भी गहरी से गहरी हो, इसलिए। मेवलडी रानी! उसमें तेरे चिंतित होने का कोई कारण नहीं था। माणिक बाबू को मेरा प्रेम। बच्चों को स्नेह । 


रजनीश के प्रणाम
२२ मार्च १९६५ (रात्रि) प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

रविवार, 20 दिसंबर 2020

प्रेम की मिठास - ओशो

 

प्रेम की मिठास  - ओशो Sweetness-of-love-Osho

प्रिय सोहन, स्नेह। 

        मैं वाहर से लौटा तो तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा थी। पत्र और अंगूर साथ ही मिले।पत्र जो कि वैसे ही इतना मीठा था, और भी मीठा हो गया! मैं आनंद में हूं। तुम्हारा प्रेम उस आनंद को और बढ़ा देता है। सबका प्रेम उस आनंदको अनंतगुणा कर रहा है। एक ही शरीर कितना आनंद है, पर जिसे सब शरीर अप ने ही लग रहे हों, उसके साथ सिवाय ईर्ष्या करने के और क्या उपाय है? ईश्वर करे तुम्हें मुझसे ईर्ष्या हो-सबको हो, मेरी तो कामना सदा यही है। माणिक बाबू ने भी बहुत प्रीतिकर शब्द लिखे हैं। उन्हें मेरा प्रेम कहना। बच्चों को भी बहुत बहुत प्रेम। 

रजनीश के प्रणाम
१६ मार्च १९६५ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना 

शनिवार, 19 दिसंबर 2020

प्रेम संगीत है, सौंदर्य है अतः धर्म है - ओशो

प्रेम संगीत है, सौंदर्य है अतः धर्म है - ओशो Love-is-music-beauty-is-so-is-religion-Osho


प्रिय सोहन वाई, स्नेह। 

        तुम्हारा पत्र मिला है। उन शब्दों से मुझे बहुत खुशी होती है छोटे छोटे फूल जैसे अनंत सौंदर्य को प्रकट कर देते हैं, वैसे ही हृदय की पूर्णता और गहराई से निकले हुए शब्द भी अनंत और विराट को प्रतिध्वनित करते हैं। प्रेम शब्दों में प्राण डाल देता है और उन्हें जीवन दे देता है। फिर क्या कहा जा रहा है, वह नहीं, वरन क्या कहना चाहा था, वह अभिव्यक्त हो जाता है। प्रत्येक के भीतर कवि है और प्रत्येक के भीतर काव्य है, पर हम गहराइयों में जाते हैं, वे एक अलौकिक प्रेम को अपने भीतर जागता हुआ अ नुभव करते हैं। और वह प्रेम उनके समग्र जीवन को सौंदर्य, शांति, संगति और काव्य से भर देता है।

        उनका जीवन ही संगीत हो जाता है। और उसी संगीत की भूमिका में सत्य का अवतरण होता है। सत्य के अवतरण के लिए संगीत आधार है। जीवन को संगीत बनाना आवश्यक है। उसके माध्यम से ही कोई सत्य के निकट पहुंचता है। तुम्हें भी संगीत बनना है। सारे जीवन को-छोटे-छोटे कामों को भी संगीत बनाओ। प्रेम से यह होता है। जो है, उसे प्रेम करो। सारे जगत के प्रति प्रेम अनुभव करो। अपनी श्वास-श्वास में समस्त के प्रति प्रेम की भावना से ही स्वयं में संगीत उत्पन्न हो ता है। क्या यह कभी देखा है? उसे देखो-प्रेम से अपने को भर लो और देखो। वही अधर्म है-वही केवल पाप है जो स्वयं में संगीत को तोड़ देता है। और वही धर्म है-वही केवल धर्म है जो स्वयं को संगीत से भरता है। प्रेम धर्म है क्योंकि प्रेम संगीत है और सौंदर्य है। प्रेम परमात्मा है क्योंकि वही उसे पाने की पात्रता है। वहां सब को मेरा प्रेम कहें। और अपने निकट भी मेरे प्रेम के प्रकाश को अनुभव करें। 

रजनीश के प्रणाम
५ दिसंबर १९६४

केवल स्वर्ग ही नहीं, नर्क भी मेरे ही हैं - ओशो

 

Not-only-heaven-hell-is-also-mine-Osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

        मैं समस्त से एक हूं। सौंदर्य से भी। और कुरूपता में भी। क्योंकि, जो भी है, वह मेरे विना नहीं है। पूष्पों में ही नहीं, पापों में भी मेरी भागीदारी है। और केवल स्वर्ग ही नहीं, नर्क भी मेरे ही हैं। वृद्ध , जीसस और लाओत्सेआह! उनका वसीयतदार होना कितना आसान है। लेकिन, चंगेज, तैमूर और हिटलर? वे भी तो मेरे ही भीतर है। नहीं, नहीं-आधी नहीं, पूरी मनुष्यता ही मैं हूं। मनूष्यों का सब कुछ मेरा है। फूल भी, कांटे भी। आलोक भी, अंधकार भी। अमृत मेरा है, तो फिर विष कौन पीएगा? “अमृत के साथ विष भी मेरा है", ऐसा जो अनुभव करता है, उसे ही मैं धार्मिक कहता हूं। क्योंकि ऐसे अनुभव की पीड़ा ही, पृथ्वी के जीवन में क्रांति ला सकती है। 


रजनीश के प्रणाम 
२०-१२-६९ प्रति : सुश्री लक्ष्मी, बंबई

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

प्रेम-एक से सर्व की ओर - ओशो

प्रेम-एक से सर्व की ओर - ओशो From-love-to-everyone-Osho


प्यारी सोहन, 

        मैं कल यहां आ गया। आते ही सोचता रहा, पर अव लिख पा रहा हूं। देर के लिए क्षमा करना। एक दिन की देर भी कोई थोड़ी देर तो नहीं है। वापसी यात्रा के लिए क्या कहूं? वहुत आनंदपूर्ण हुई। पूरे समय सोया रहा और तू सा थ बनी रही। यूं तुझे पीछे छोड़ आया था-पर नहीं, तू साथ ही थी। और, ऐसा साथ ही साथ है, जो कि छोड़ा नहीं जा सकता है। शरीर की निकटता निकट होकर भी नि कट नहीं है। उस तल पर कभी कोई मिलन नहीं होता-वहां बीच में अलंध्य खाई है। पर एक और निकटता भी है जो कि शरीर की नहीं है। उस निकटता का नाम ही प्रेम है। उसे पाकर फिर खोया नहीं जा सकता है और तब दृश्य जगत में अनंत दूरी होने पर भी अदृश्य में कोई दूरी नहीं होती है। यह अ-दूरी यदि एक से भी सध जावें तो फिर सबसे सध जाती है। एक तो द्वार ही है। साध्य तो सर्व है। प्रेम का प्रारंभ एक है; अंत सर्व है। वही प्रेम जो सर्व  संबोधित हो जाता है और जिसकी निकटता के बाहर कुछ भी शेष नहीं बचता है-उसे ही मैं धर्म कहता हूं। जो प्रेम कहीं भी रुक जाता है, वही अधर्म बन जाता है। माणिक वावू को प्रेम। 


रजनीश के प्रणाम
१७ अप्रैल १९६५ प्रति : सुश्री सोहन, पूना

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

प्रेम की पूर्णता में अहं-विसर्जित - ओशो

प्रेम की पूर्णता में अहं-विसर्जित - ओशो Ego-immersed-in-the-fullness-of-love-Osho


प्रिय सोहन प्रेम। 

        बहुत प्रेम । प्रवास से लौटा, तो पत्रों के ढेर में तेरे पत्र को खोजा। तेरे अपने हाथ से लिखे उस पत्र को पाकर कितना आनंद हुआ-कैसे कहूं? तूने लिखा है : अव तो अनुपस्थिति में उपस्थिति प्रतीत हो रही है। प्रेम ही वस्तुतः उ पस्थिति है। प्रेम हो तो समय और स्थान की दूरियां मिट जाती हैं और प्रेम न हो तो समय और स्थान में निकट होकर भी बीच में अलंध्य और अनंत फालसा होता है। अ प्रेम एकमात्र दूरी है, और प्रेम एकमात्र निकटता है। जो समस्त के प्रेम को उपलब्ध ह ते हैं, वे सब को अपने भीतर ही पाने लगते हैं। विश्व तव वाहर नहीं, भीतर मालूम होता है और चांद-तारे अंतस के आकाश में दिखाई पड़ने लगते हैं। प्रेम की उस पूर्ण ता में अहं लुप्त हो जाता है। प्रभु उस पूर्णता की और ले चले यही सदा मेरी कामना माणिक बाबू को प्रेम। अनिल और बच्चों को स्नेह । 


रजनीश के प्रणाम
३ मार्च १९६५ (रात्रि) प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना ।

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

प्रेम के आंसू - ओशो

प्रेम के आंसू - ओशो Tears-of-love-osho


प्रिय सोहन, स्नेह। 

         अभी अभी यहां पहुंचा हूं। गाड़ी ५ घंटे विलंब से पहुंची है। तुमने चाहा था कि पहुंचते ही पत्र लिखू इसलिए सब से पहले वही कर रहा हूं। रास्ते भर तुम्हारा स्मरण बना रहा, और तुम्हारी आंखों से ढलते आंसू दिखाई पड़ते र हे। आनंद और प्रेम के आंसुओं से पवित्र इस धरा पर और कुछ नहीं है। ऐसे आंसू ि कतने अपार्थिव होते हैं, और कितने पारदर्शी? वे निश्चय ही शरीर के हिस्से होते हैं, पर उनसे जो प्रकट होता है, वह शरीर का नहीं होता है। मैं तुम्हारे  इन आंसूओं के लिए क्या हूँ? माणिक बाबू को मेरा हार्दिक प्रेम कहना। अनिल और बच्चों को स्नेह । 


रजनीश के प्रणाम
१७-२-१९६५ (संध्या) प्रति : सुश्री सोहन बाफना, पूना

मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

शून्य ही द्वार है, मार्ग है, मंजिल है - ओशो

        

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 मेरे प्रिय, प्रेम। 

        सहारे मात्र वाधाएं हैं। सब सहारे छोड़ें, क्योंकि तभी उसका सहारा मिल सकता है। वह तो केवल वेसहारों को सहारा है। और उसके अतिरिक्त गुरु और कोई भी नहीं है। शेष सब गुरु उसके मार्ग में अवरोध हैं। गुरु को पाना हो तो गुरुओं से बचे। और शून्य होने से न डरे। क्योंकि वहीं द्वार है। वही मार्ग है। वही मंजिल है। शून्य होने का साहस ही पूर्ण होने की क्षमता है। जो भरे हैं, वे खाली रह जाते हैं।

        और जो खाली हैं, वे मर जाते हैं। ऐसा ही उसका गणित है। और कुछ करने की न सोचें। करने से वह नहीं मिलता है। न जप से, न पत से। क्योंकि वह तो मिला ही हुआ है। रुकें और देखें। करना ही दौड़ना है। न करना ही रुकना है। आह! काश! वह दूर होता तो दौड़कर मिल जाता। लेकिन, वह तो निकट से भी निकट है। काश! उसे खोया हो तो खोज भी लेते। लेकिन, उसे खोया ही कब है? 

रजनीश के प्रणाम 
१३-५-१९७० प्रति : श्री रमाकांत उपाध्याय, काठमांडू, नेपाल

प्रेम की सुवास - ओशो

प्रेम का मंदिर-निर्दोष, सरल - ओशो Love-of-love-Osho


प्यारी सोहन, 

          सुबह ही तेरा पत्र मिला। तू जिन प्रेम फूलों की माला गूंथती है, उनकी सुगंध मुझ त क आ जाती है। और तू जो प्रीति बेल वो रही है, उसका अंकुरण मैं अपने ही हृदय में  अनुभव करता हूं। तेरे प्रेम और आनंद से पैदा हुए आंसू मेरी आंखों की शक्ति औ र चमक बन जाते हैं। और यह कितना आनंदपूर्ण है! १९ जन को कल्याण पर तेरी प्रतीक्षा करूंगा। 


रजनीश के प्रणाम
१४-६-१९६५ (दोपहर) प्रति : सुश्री सोहन बाफना, 
पूना

सोमवार, 14 दिसंबर 2020

सत्य प्रत्येक के भीतर है - ओशो

 

Truth-lies-within-each-Osho

ग्वालियर (म. प्र.) 

प्रिय आत्मन, स्नेह। 

        तुम्हारे पत्र को राह में पढ़ा, उसने मेरे हृदय को छू लिया है। जीवन सत्य को जानने की तुम्हारी आकांक्षा प्रवल हो तो जो अभी प्यास है वही एक दिन प्राप्ति वन जाती है। केवल एक जलती हुई अभीप्सा चाहिए। और कुछ भी आवश्यक नहीं है। ना दयां जैसे सागर को खोज लेती हैं वैसे ही मनुष्य भी चाहना करे तो सत्य को पा लेत है। कोई पर्वत, कोई चोटियां बाधा नहीं बनती है वरन उनकी चुनौती सुप्त पुरुषार्थ को जगा देती है। सत्य प्रत्येक के भीतर है। नदियों को तो सागर खोजना पड़ता है। हमारा सागर तो ह मारे भीतर है। और फिर भी जो उसके प्यासे और उससे वंचित रह जाएं, उन पर ि सवाय आश्चर्य के और क्या करना होगा? वस्तुतः उन्होंने ठीक से चाहा ही न होगा।

        ईसा का वचन है : मांगों और वह मिलेगा। पर कोई मांगे ही नहीं तो कसर किसका है? प्रभु को पाने से सस्ता और कुछ भी नहीं है। केवल उसे मांगना ही होता है। यद्यपि म ग जैसे-जैसे प्रवल होती है मांगने वाला वैसे ही वैसे विसर्जित होता जाता है। एक सी मा आती है, वाष्पीकरण का एक बिंदू आता है, जहां मांगने वाला पूरी तरह मिट जा ता है और केवल मांग हो शेष रह जाती है। यही बिंदु प्राप्ति का बिंदु भी है। जहां मैं नहीं है वही सत्य है। यह अनुभूति ही प्रभु अनुभूति है। अहं का अभाव ही ब्रह्म का सदभाव है। वहां सबको मेरे प्रणाम कहना। 


रजनीश के प्रणाम
२-१२-१९६३ प्रति : श्री रोहित कुमार मित्तल, खंडवा (म. प्र.)

प्रेम का मंदिर-निर्दोष, सरल - ओशो

प्रेम का मंदिर-निर्दोष, सरल - ओशो Temple-of-love-innocent-simple-Osho


सोहन, प्रिय, 

          तेरा पत्र मिला है। और, चित्र भी। उसे देखता हूं-तू कितनी सरल और निर्दोष हो रही है? पूजा और प्रेम का वैसा पवित्र भाव उसमें प्रकट हुआ है ? हृदय प्रेम से पवित्र हो जाता है और मंदिर बन जाता है। इसे तेरे चित्र में प्रत्यक्ष ही देख रहा हूं। प्रभु इस निर्दोष सरलता को निरंतर बढ़ाता चले यही मेरी प्रार्थना है।। २००० वर्ष पहले क्राइस्ट से किसीने पूछा था : “प्रभू के राज्य में प्रवेश के अधिकारी कौन होंगे" उन्होंने एक बालक की और इशारा करके कहा था : “जिनके हृदय वाल कों की भांति सरल हैं।" और, आज तेरे चित्र को देखते-देखते मुझे यह घटना अनायास ही याद हो गई है। माणिक बाबू को प्रेम। बच्चों को आशीष । 

रजनीश के प्रणाम
९-६-१९६५ (दोपहर) प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

प्रयोग करें, परिणाम की चिंता नहीं - ओशो

Use-not-worried-about-the-result-Osho


प्रिय आत्मन, प्रणाम, 

        पूरी मई वाहर रहने से स्वास्थ्य पर कुछ बुरा असर हुआ। इसलिए जून में आ योजित वंबई, कलकत्ता और जयपुर के सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिए हैं। समाधि योग पर आप प्रयोग कर रहे हैं यह जान कर प्रसन्नता हुई। परिणाम की नहीं, प्रयोग की ही चिंता करें; परिणाम तो एक दिन आ ही जाता है, वह अनुक्रम से नहीं , अनायास से आता  है, ज्ञात भी नहीं पड़ता है, और उनका आगमन हो जाता है औ र एक क्षण में जीवन कुछ से कुछ हो जाता है। भगवान महावीर पर अभी नहीं लिख रहा हूं। लिखने के प्रति मुझमें कोई प्रेरणा  ही न हीं है। आपकी जबरदस्ती से कुछ हो सके तो बात दूसरी है। शेष शुभ। 


रजनीश के प्रणाम
३ जून १९६३ प्रति : लाला सुंदरलाल, दिल्ली

रविवार, 13 दिसंबर 2020

प्रेम के फूल- ओशो

Love Flowers - Osho


प्रेम के फूल 

        प्रिय सोहन, प्रेम। तेरा पत्र मिला। कविता से तो हृदय फूल गया। सुना था प्रेम से काव्य का जन्म होता है, तेरे पत्र में उसे साकार देख लिया।। प्रेम हो तो धीरे-धीरे पूरा जीवन ही काव्य हो जाता है। जीवन सौंदर्य के फूल प्रेम की धूप में ही खिलते हैं। यह भी तूने खूब पूछा है कि मेरे हृदय में तेरे लिए प्रेम क्यों हैं? क्या प्रेम के लिए भी कोई कारण होते हैं ? और यदि किसी कारण से प्रेम हो तो क्या हम उसे प्रेम कहेंगे? पागल, प्रेम तो सदा ही अकारण होता है। यही उसका रहस्य और उसकी पवित्रता है। अकारण होने के कारण ही प्रेम दिव्य है और प्रभु के लोक का है। फिर, मैं तो उसी भांति प्रेम से भरा हूं, जैसे दीपक में प्रकाश होता है। पर उस प्रकाश के अनुभव के लिए आंखें चाहिए। तेरे पास आंख थीं तो तूने उस प्रकाश को पहचाना।  इसमें मेरी नहीं, तेरी ही विशेषता है। वहां सब को मेरे प्रणाम कहना। माणिक वावू और बच्चों को प्रेम । 

रजनीश के प्रणाम 

१२-३-१९६५ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

स्वयं को बेशर्त दे देना प्रेम है- ओशो

स्वयं को बेशर्त दे देना प्रेम है- ओशो


प्रिय बहिन. प्रेम। 

          तुम्हारा पत्र मिला है। आनंद में जानकर आनंदित होता हूं। मेरे जीवन का आनंद यही है। सब आनंद से भरें, श्वास-श्वास में यही प्रार्थना अनुभव करता हूं। इसे ही मैंने धर्म जाना है। वह धर्म मृत है, जो मंदिरों और पूजागृहों में समाप्त हो जाता है। उस धर्म की कोई सार्थकता नहीं है, जिसका आदर निष्प्राण शब्दों और सिद्धांतों के ऊ पर नहीं उठ पाता है।  वास्तविक और जीवित धर्म वही है, जो समस्त से जोड़ता और समस्त तक पहुंचता है विश्व के प्राणों में जो एक कर दे, वही धर्म है। और, वे भावनाएं प्रार्थना हैं, जो उस अदभुत संगम और मिलन की और ले चलती हैं और, वे समस्त प्राथनाएं एक ही शब्द में प्रकट हो जाती हैं। वह शब्द प्रेम है। प्रेम क्या चाहता है? जो आनंद मुझे मिला है, प्रेम उसे सब को बांटना चाहता है। प्रेम स्वयं को बांटना चाहता है। 

         स्वयं को बेशर्त दे देना प्रेम है। बूंद जैसे स्वयं को सागर में विलीन कर देती है, वैसे ही समस्त के सागर में अपनी स त्ता को समर्पित कर देना प्रेम है। और. वही प्रार्थना है। ऐसे ही प्रेम से आंदोलित हो रहा हूं। उसके संस्पर्श ने जीवन अमृत और आलोक बना दिया है। अब एक ही कामना है कि जो मुझे हुआ है, वह सब को हो सके। वहां सबको मेरा प्रेम संदेश कहें। ११ फरवरी तो कल्याण मिल रही हो न? 

रजनीश के प्रणाम
३ फरवरी, १९६५ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना