मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

योग-अनुसंधान - ओशो

Yoga-Research-Osho


प्रिय आत्मन, प्रणाम। 

        आपका पत्र पढ़ कर अत्यंत प्रसन्नता हुई। मैं अभी तो कुछ भी नहीं लिखा हूं।एक ध्यान केंद्र जरूर यहां बनाया है, जिसमें कुछ साथी प्रयोग कर रहे हैं। इन प्रयोग में से उपलब्ध नतीजों से परिपूर्ण रूप से सुनिश्चित हो जाने पर अवश्य ही कुछ लिखने की संभावना है। मैं अपने स्वयं के प्रयोगों पर निश्चित निष्कर्षों पर पहुंचा हूं। पर उ नकी अन्यों के लिए उपयोगिता को भी परख लेना चाहता हूं। मैं शास्त्रीय ढंग से कुछ भी लिखना नहीं चाहता-मेरी दृष्टि वैज्ञानिक है। मनोवैज्ञानिक और परा मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर योग के विषय में कुछ कहने का विचा र है। इस संबंध में बहुत ही भ्रांत धारणाएं देख रहा हूं। इस कार्य में मेरी दृष्टि में क ई संप्रदाय या पक्ष का अनुमोदन भी नहीं है। इस और कभी आवे तो बहुत सी चर्चा हो सकती है। 

रजनीश के प्रणाम
१ अक्तूबर १९६२ प्रति : लाला सुंदरलाल, दिल्ली