सोमवार, 31 मई 2021

परमात्मा है-अभी और यहीं - ओशो

  

God-is-now-and-here-Osho

प्यारी जयति, 

    प्रेम। 

                परमात्मा दूर है; क्योंकि निकट में हमें देखना नहीं आता है। अन्यथा, उससे निकट और कोई भी नहीं है। वह निकटतम ही नहीं वरन निकटता का ही दूसरा नाम है। और वह दूसरा नाम भी उनके लिए ही खोजना पड़ा है, जो कि निकट में देख ही नह सकते हैं। शब्द, नाम, सिद्धांत, शास्त्र, धर्म, दर्शन-सब उन्हीं के लिए खोजने पड़े हैं जो कि केवल देर ही देख सकते हैं। और, इसलिए उनका परमात्मा से कोई भी संबंध नहीं है। उनका संबंध केवल निकट के प्रति जो अंधे हैं बस उनसे ही है।

             इसलिए, मैं कहता हूं : दूर को छोड़ो-आकाश के स्वर्गों को छोड़ो। भविष्य के मोक्षों को छोड़ी और देखो निकट को-काल में भी, अवकाश में भी-अभी और यहीं-देखो। काल के क्षण में देखा। अवकाश के कण में देखो। काल के क्षण (पउम-ऊवउमदज) में काल मिट जाता है। अवकाश के कण (एचवम एजवउ) में क्षेत्र मिट जाता है। अभी और यहीं (भमतम दक छवू) में क्षेत्र मिट जाता है। अभी और यहीं (भमतमदक छवू) में न समय है, न क्षेत्र है। फिर जो शेष रह जाता है, वही है सत्य-वही है प्रभु-वही है। फिर जो शेष रह जाता है, वही है सत्य-वही है प्रभु-वही है। वही तुम भी हो। “तत्वमसि श्वेतकेत" 

रजनीश के प्रणाम 

२६-११७१९७० पुनश्च : डा. को प्रेम। दोनों के पत्र मिल गए हैं। चित्र भी मिल गए। प्रति : सुश्री जयति शुक्ल, द्वारा-डा. हेमत शुक्ल, काठियावाड, जूनागढ़, गुजरात


शनिवार, 29 मई 2021

समर्पण-एक अनसोची छलांग - ओशो

  

Dedication-An-Unspeakable-Leap-Osho

प्रिय सावित्री, 

    प्रेम। 

            सुरक्षा है ही नहीं कहीं-सिवाय मृत्यु के। जीवन असुरक्षा का ही दूसरा नाम है। इस सत्य की पहचान से सुरक्षा की आकांक्षा स्वतः ही विलीन हो जाती है। असुरक्षा की स्वीकृति ही असुरक्षा से मुक्ति है। मन में दुविधा रहेगी ही। क्योंकि, वह मन का स्वभाव है। उसे मिटाने की फिकर छोड़। क्योंकि, वह भी दुविधा ही है। दविधा को रहने दे-अपनी जगह। और तू ध्यान में चल। तू मन नहीं है। इसलिए, मन से क्या वाधा है ? अंधेरे को रहने दे-अपने जगह। तू तो दिया जला। समर्पण क्या सोच-सोच कर करेगी? पागल! समर्पण अनसोची छलांग है। छलांग लगा या न लगा। लेकिन कृपा कर सोच विचार मत कर। 

रजनीश के प्रणाम 

२६-११-१९७० प्रति : डा. सावित्री सी. पटेल, मोहनलाल, डी. प्रसूति गृह, प्रो. किल्ला पारडी, जिलाबुलसारा, गुजरात

गुरुवार, 27 मई 2021

द्वैत का अतिक्रमण-साक्षी भाव से - ओशो

 

Encroachment-of-dualism-witnessing-Osho

प्रिय योग प्रेम। 

    प्रेम। 

            अस्तित्व है धूप-छांव। आशा-निराशा। सुख-दुख । जन्म-मृत्यु । अर्थात अस्तित्व है द्वैत । विरोधी ध्रुवों का तनाव। विरोधी स्वरों का संगीत। लेकिन, उसे ऐसा जानना, पहचानना, अनुभव करना-उसके पार हो जाना है। यह अतिक्रमण (तंदेवमदकमदबम) ही साधना है। इस अतिक्रमण को पा लेना सिद्धि है। इस अतिक्रमण का साधना-सूत्र है : साक्षी-भाव। कर्ता को विदा करो। और, साक्षी में जियो। नाटक को देखो-नाटक में ड्रबो मत।

            और देखने वाले द्रष्टा में डूबो। फिर दृश्य में ही रह जाते हैं सुख-दुख, जन्म-मृत्यु। फिर वे छूते नहीं है-छू नहीं सकते हैं। उनके तादात्म्य (टकमदजपजल) में ही बस सारी भूल है, सारा अज्ञान है। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : मा योग प्रेम, विश्वनीड, संस्कार तीर्थ, आजोल, गुजरात

मंगलवार, 25 मई 2021

समय न खोओ - ओशो

 

Do-not-lose-time-Osho

प्रिय कृष्ण चैतन्य, 

    प्रेम। 

            शक्ति को कब तक सोई रहने देना है? स्वयं के विराट से कब तक अपरिचित रहने की ठानी है? दुविधा में समय न खोओ। संशय में अवसर न गंवाओ। समय फिर लौट कर नहीं आता है। और, खोए अवसरों के लिए कभी-कभी जन्म-जन्म प्रतीक्षा करनी होती है। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : स्वामी कृष्ण चैतन्य, विश्वनीड, संस्कार तीर्थ, आजोल, गुजरात

रविवार, 23 मई 2021

विचारों के पतझड़ - ओशो

 

Autumn-of-thoughts-osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

            विचारों के प्रवाह में बहना भर नहीं। बस जागे रहना। जानना स्वयं को पृथक और अन्य। दूर और मात्र द्रष्टा जैसे राह पर चलते लोगों की भीड़ को देखते हैं, ऐसे ही विचारों को भीड़ को देखना । जैसे पतझड़ में सूखे पत्तों को चारों ओर उड़ते देखते हैं, वैसे ही विचारों के पत्तों को उड़ते देखना। न उनके कर्ता बनना। न उन उनके भोक्ता। फिर शेष सब अपने आप हो जाएगा। उस शेष को ही मैं ध्यान (मेडिटेशन) कहता हूं। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : श्री लाभशंकर पांडया, पांडया ब्रदर्स, आप्टीशियन, गांधी रोड, अहमदाबाद, गुज रात

शुक्रवार, 21 मई 2021

नास्तिकता में और गहरे उतरें - ओशो

  

Delve-deeper-into-atheism-osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

            नास्तिकता आस्तिकता की पहली सीढ़ी है। और अनिवार्य। जिसने नास्तिकता की अग्नि नहीं जानी है, वह आस्तिकता का आलोक भी नहीं जान सकता है। और, जिसके प्राणों में नहीं कहने की सामर्थ्य नहीं है, उसकी हां सदा ही निर्वीर्य होती है। इसलिए, मैं आपके नास्तिकता होने से आनंदित हूं। ऐसा आनंद केवल उसे ही हो सकता है, जिसने आस्तिकता को जाना है। वस, इतना ही कहूंगा कि नास्तिकता में और गहरे उतरें।

            ऊपर-ऊपर से काम नहीं चलेगा। सोचें ही नहीं-नास्तिकता को जिए भी। वैसा जीना ही अंतत: आस्तिकता पर ले जाता है। नास्तिकता निष्कर्ष नहीं है। सिर्फ संदेह है। संदेह शूभ है पर अंत नहीं है। वस्तुतः तो संदेह श्रद्धा की खोज है। चले-बढ़े-यात्रा करें। संदेह से ही सत्य की यात्रा शुरू होती है।

            और, संदेह साधना है। क्योंकि, अंततः संदेह ही निसंदिग्ध सत्य का अनावरण करता है। संदेह के बीज में श्रद्धा का वृक्ष छिपा है। संदेह को जो बात है श्रम से, वह निश्चय ही श्रद्धा की फसल काटता हैं। और धर्मों से उचित ही है कि सावधान रहें; क्योंकि उनके अतिरिक्त धर्म के मार्ग में और कोई बाधा नहीं है। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : श्री भवानीसिंह, ग्राम व पोस्ट-त्राहेल, वाया-अहलीलाल, जि. कांगरा, हिमाचल प्रदेश

बुधवार, 19 मई 2021

जो घर बारै आपना - ओशो

  

Which-house-is-yours-Osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

            प्रेम स्वप्न में भी भेद नहीं करता है। और वह प्रेम जो कि प्रार्थना भी है, उसमें तो भेद भाव का उपाय ही नहीं है। मैं तो अब हूं ही कहां? मैं बस एक काम चलाऊं शब्द ही रह गया है। और, इसलिए वहुत जगह उसे अकारण ही वाधा भी पड़ने लगी है। मैं की बदली हट जाने पर जो पीछे वचा है, वह प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। प्रेम-अकारण। प्रेम-बेशर्त बस कोई लेने को तैयार भर हो-तो मैं तो बाजार में ही खड़ा हूं। “कबिरा खड़ा वजार में, लिए लूकाठभ हाथ। जो घर वारै आपना चले हमारे साथ।" 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : श्री चंद्रकांत एन. पटेल, आसोपालव, बैंक आफ बड़ौदा के सामने, रावपूरा, वड़ मैदा, गुजरात

सोमवार, 17 मई 2021

समर्पण और साक्षी - ओशो

 

Dedication-and-witness-Osho

मेरे प्रिय, प्रेम। 

            प्रभु पल-पल परीक्षा लेता है। हंसो-और परीक्षा दो। वह परीक्षा योग्य मानता है, यह भी सौभाग्य है। और जल्दी न करो। क्योंकि, कुछ मंजिल जल्दी करने से दूर हो जाती हैं। कम से कम प्रभु का मंदिर तो निश्चय ही ऐसी मंजिल है। वहां धैर्य चलना ही ज्यादा से ज्यादा तीव्रता से चलना है। मन डोलेगा-बार-बार डोलेगा। वही उसका अस्तित्व है। जिस दिन डोला, उसी दिन उसकी मृत्यू है। लेकिन, कभी-कभी यह सोता भी है। उसे ही-निद्रा को ही मन की मृत्यु न समझ लेना। कभी-कभी वह थकता भी है। लेकिन, उस थकान को उसकी मृत्यु न समझ लेना। विश्राम और निद्रा से तो वह सिर्फ स्वयं को पुन: पुन: ताजा भर करता है। पर उसकी फिकर ही छोड़ो। उसकी फिकर ही उसे शक्ति देती है। उसे भी प्रभू समर्पित कर दो। प्रभू से कहो : “वूरा भला जैसा है, अब तुम ही सम्हालो।" और फिर बस साक्षी बने रहो। बस देखते रहो नाटक। मन के नाटक को तटस्थ भाव से देखते-देखते ही उस चेतना में प्रवेश हो जाता है जो कि मन नहीं हैं। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : स्वामी प्रज्ञानंद सरस्वती, साधना-सदन, कनखल, हरिद्वार

शनिवार, 15 मई 2021

ध्यान है भीतर झांकना - ओशो

  

Meditation-is-peeping-inside-Osho



प्रिय योग यशा, 

    प्रेम। 

            वीज को स्वयं की संभावनाओं का कोई भी पता नहीं होता है, ऐसा ही मनुष्य भी है। उसे भी पता नहीं है कि वह क्या है क्या हो सकता है? लेकिन, वीज शायद स्वयं के भीतर झांक भी नहीं सकता। पर मनूष्य तो झांक सकता है। यह झांकना ही ध्यान है। स्वयं के पूर्ण सत्य को अभी और यही। (भमतम :दक छवू) जानना ही ध्यान है। ध्यान में उतर-गहरे और गहरे। गहराई के दर्पण में संभावनाओं का पूर्ण प्रतिफलन उपलब्ध हो जाता है। और जो हो सकता है, वह होना शुरू हो जाता है। जो संभव है, उसकी प्रतीति ही उसे वास्तविक बनाने लगती है। वीज जैसे ही संभावनाओं के स्वप्नों से आंदोलित होता है, वैसे ही अंकुरित होने लगता शक्ति, समय और संकल्प सभी ध्यान को समर्पित कर दे। क्योंकि, ध्यान ही वह द्वारहीन द्वार जो कि स्वयं को ही स्वयं से परिचित कराता है। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : मा योग यशा, विश्वनीड, संस्कार तीर्थ, आजोल, गुजरात।

गुरुवार, 13 मई 2021

जो मिले अभिनय उसे पूरा कर - ओशो

  

Get-the-acting-done-Osho

प्रिय योग प्रिया, प्रेम। 

            संन्यास में संसार अभिनय है। संसार को अभिनय जानना ही संन्यास है। फिर न कोई छोटा है, न वड़ा-न कोई राम है, न रावण । फिर तो जो भी है सब रामलीला है! जो मिले अभिनय उसे परा कर। वह अभिनय तू नहीं है। और जब तक भविष्य से हमारा तादात्म्य है, तव तक आत्मज्ञान असंभव है। और जिस दिन यह तादात्म्य टूटता है उसी दिन से अज्ञान असंभव हो जाता है। अभिनय कर और जान कि तू वह नहीं है। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : मा योग प्रिया, विश्वनीड, संस्कार तीर्थ, आजोल, गुजरात

मंगलवार, 11 मई 2021

प्रभु के लिए पागल हो - ओशो

Crazy-for-god-osho


प्रिय आनंद मधु, 

    प्रेम। 

            समय पक गया है। अवसर रोज निकट आता जाता है। अनंत आत्माए विकल हैं। उनके लिए मार्ग बनाना है। इसलिए, शीघ्रता करो। श्रम करो। स्वयं को विस्मरण करो प्रभु के लिए पागल होकर काम में लग जाओ। पागल होने से कम में नहीं चलेगा। आह! लेकिन, प्रभु के लिए पागल होने से बड़ी कोई प्रज्ञा भी तो नहीं है। 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : मा आनंद मधु, विश्वनीड़, संस्कार तीर्थ, आजोल, गुजरात



रविवार, 9 मई 2021

अंसुअन-जल सीचि-सींचि प्रेम-वेलि बोई - ओशो

  

Ansoon-Jal-Sichi-Sinchi-Prem-Veli-Boi-Osho

प्रिय सोहन, 

    स्नेह। 

            इतनी ही रात्रि को दो दिन पूर्व तुझे चितौड़ में पीछे छोड़ आया हूं। प्रेम और आनंद से भरी तेरी आंखें स्मरण आ रही हैं। उनमें भर आए पवित्र आंसुओं में सारी प्रार्थना और पूजा का रहस्य छिपा हुआ है। प्रभू, जिन्हें धन्य करता है, उसके हृदय को प्रेम के आंसुओं से भर देता है। और, उन लोगों के दुर्भाग्य को क्या कहें, जिनके हृदय में प्रेम के आंसुओं की जगह घृणा को काटें हैं? प्रेम में वहे आंसू परमात्म के चरणों में चढ़ें फूल बन जाते हैं और जिन आंखों से वे व हते हैं, उन आंखों को दिव्य दृष्टि दे जाते हैं। 

            प्रेम से भरी आंखें ही केवल प्रभु को देख पाने में सफल हो पाती है; : क्योंकि प्रेम ही केवल ऐसी ऊर्जा है जो कि प्रकृति की जड़ता को पार कर पाती है और उस तट पहुं चाती है जहां कि परम-चैतन्य का आवास है। मैं सोचता हूं कि मेरे इस पत्र के पहुंचते माणिक वावू अवश्य ही तुझे लेकर काशीधा म पहुंच गए होंगे? राह कैसी वीती-पता नहीं। पर आशा करता हूं कि वह हंसते औ र गीत गाते ही बीती होगी। यहां अरविंद ने अनिल एंड कंपनी को ट्रेन पर बहुत खोजा, पर वह उनका कोई संधा न नहीं पा सका। वहां सबको मेरे विनम्र प्रणाम कहना! तेरे वायदा किए पत्रों की प्रतीक्षा है। माणिक व वूि को प्रेम। 



रजनीश के प्रणाम
९-६-६५ प्रति : सूश्री सोहन, पूना

शुक्रवार, 7 मई 2021

परमात्मा है असीम प्रेम - ओशो

  

God-is-infinite-love-Osho

चिदात्मन, 

    स्नेह। 

            साधना शिविर से लौटकर वाहर चला गा था। रात्रि ही लौटा हूं। इस बीच निरं तर आपका स्मरण बना रहा है। आपकी आंखों में परमात्मा को पाने की जिस प्यास को देखा हूं, और आपके हृदय की धड़कनों में सत्योपलब्धि के लिए जो व्याकुलता अ नूभव की है, उसे भूलना संभव भी नहीं था। ऐसी प्यास सौभाग्य है, क्योंकि उसकी पीड़ा से गुजरकर ही कोई प्राप्ति तक पहुंचता है। स्मरण रहे कि प्यास ही प्रकाश और प्रेम के जन्म की प्रथम शर्त है।

            और, परमात्मा प्रकाश और प्रेम के जोड़ के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। प्रेम ही परिशुद्ध और पूर्ण प्रदीप्त होकर परमात्मा हो जाता है। प्रेम पर जब कोई सीमा नहीं होती है, तभी उस निर्धूम स्थिति में प्रेम की अग्नि परमात्मा बन जाती है। आपमें इस विकास की संभावना देखी है, और मेरी अंतरात्मा बहुत आनंद से भर गई है। बीज तो उपस्थित है, अब उसे वृक्ष बनाना है। और शायद वह समय भी निकट आ ग या है। परमात्मा अनुभूति की कोई भी संभावना के विना वास्तविक नहीं बनती है, इसलिए अब उस तरफ सतत और संकल्पपूर्ण ध्यान देना है। मैं बहुत आशा बांध रहा हूं। क्या आप उन्हें पूरा करेंगी? श्री माणिकलाल जी और मेरे सब प्रियजनों को वहां मेरे प्रणाम कहना। मैं पत्र की प्रतीक्षा में हूं। कोरे कागज की भी बात हुई थी, वह तो याद होगी न? शे ष शुभ। मैं बहुत आनंद में हूं। 



रजनीश के प्रणाम
२६-१०-१९६४ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

बुधवार, 5 मई 2021

प्रेम की संपदा - ओशो

  

Estate-of-love-Osho

प्रिय सोहनवाई, 

    स्नेह। 

            आपका अत्यंत प्रीतिपूर्ण पत्र मिला है। आपने लिखा है कि मेरे शब्द आपके कानों में गूंज रहे हैं। उनकी गूंज आपकी अंतरात मा को उस लोक में ले जाए जहां शून्य है और सव निःशब्द है। यही मेरी कामना है। शब्द से शून्य पर चलना है : वही पहुंचकर स्वयं से मिलन होता है। मैं आनंद में हूं। मेरे प्रेम को स्वीकार करें। उसके अतिरिक्त मेरे पास कुछ भी नहीं है। वही मेरी संपदा है और आश्चर्य तो यह है कि वह एक ऐसी संपदा है कि उसे जित ना बांटो वह उतनी ही बढ़ती जाती है। वस्तुतः संपदा वही है, जो बांटने से बढ़े, जो घट जावें वह कोई संपदा नहीं है। श्री माणिकलाल जी को और सबको मेरा प्रेम कहें। पत्र दें। आप ही नहीं, पत्र की मैं भी प्रतीक्षा करता हूं। 



रजनीश के प्रणाम
२-११-१९६४ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

सोमवार, 3 मई 2021

गागर में प्रेम का सागर - ओशो

  

Sea-of-love-in-Gagar-Osho

प्रिय सोहन, 

    प्रेम। 

            कल आते ही तेरा पत्र खोजा था। फिर रविवार था तो भी राह देखता रहा! आ ज संध्या पत्र मिला है। कितने थोड़े से शब्दों में तू कितना लिख देती है? हृदय भरा हो तो वह शब्दों में भी वह जाता है। इसके लिए बहुत शब्दों का होना जरूरी नहीं है। प्रेम का सागर गागर में भी बन जाता है और प्रेम के शास्त्र के लिए ढाई अक्षर का ज्ञान भी काफी है! क्या तुझे पता है कि तेरे इन पत्रों को मैं कितनी बार पढ़ जाता हूं। माणिक वावू को प्रेम। 



रजनीश के प्रणाम
७-६-१९६५ (रात्रि) प्रति : सुश्री सोहन, पूना

शनिवार, 1 मई 2021

प्रेम शून्य हृदय की दरिद्रता - ओशो

Love-zero-heartache-Osho


प्यारी सोहन, 

    प्रेम। 

            तेरा पत्र मिला है। दूब में उसी जगह बैठा था, जब मिला। उस समय क्या सोच रहा था, वह तो तभी बताऊंगा जब तू मिलेगी? स्मृतियां कितनी सुवास छोड़ जाती जीवन प्रेम से परिपूर्ण हो तो कितना आनंद हो जाता है। जगत में केवल वे ही दरिद्र हैं जिनके हृदय में प्रेम नहीं है।

        और, उनके सौभाग्य का क्या कहना जिनके हृदय में सिवाय प्रेम के और कुछ भी शे ष नहीं रह जाता है। संपदा और शक्ति के ऐसे क्षणों में ही प्रभू का साक्षात होता है। मैंने तो प्रेम को ही प्रभु जाना है। माणिक वावू को मेरा प्रेम पहुंचाना। 



रजनीश के प्रणाम
१-६-१९६५ (प्रभात) प्रति : सुश्री सोहन, पूना