बुधवार, 19 मई 2021

जो घर बारै आपना - ओशो

  

Which-house-is-yours-Osho

मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

            प्रेम स्वप्न में भी भेद नहीं करता है। और वह प्रेम जो कि प्रार्थना भी है, उसमें तो भेद भाव का उपाय ही नहीं है। मैं तो अब हूं ही कहां? मैं बस एक काम चलाऊं शब्द ही रह गया है। और, इसलिए वहुत जगह उसे अकारण ही वाधा भी पड़ने लगी है। मैं की बदली हट जाने पर जो पीछे वचा है, वह प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। प्रेम-अकारण। प्रेम-बेशर्त बस कोई लेने को तैयार भर हो-तो मैं तो बाजार में ही खड़ा हूं। “कबिरा खड़ा वजार में, लिए लूकाठभ हाथ। जो घर वारै आपना चले हमारे साथ।" 



रजनीश के प्रणाम
२६-११-१९७० प्रति : श्री चंद्रकांत एन. पटेल, आसोपालव, बैंक आफ बड़ौदा के सामने, रावपूरा, वड़ मैदा, गुजरात