गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

प्रेम ही सेवा है - ओशो

 

Love-is-service-osho

प्रिय सोहन,

            तेरा पत्र मिला है। अंगुली में क्या चोट मार ली है? दीखता है कि शरीर को कोई ध्य न नहीं रखती है। और, मन के अशांत होने का क्या कारण है? इस स्वप्न जैसे जगत में मन को किसी भी कारण से अशांत होने देना ठीक नहीं है। शांति सबसे बड़ा आनं द है, और उससे बड़ी और कोई भी वस्तु नहीं है, जिसके लिए कि उसे खोया जा स के। इस पर मनन करना। सत्य के प्रति सजग होने मात्र से अंतस में परिवर्तन होते हैं

            मैं सोचता हूं कि शायद मेरी सेवा के लिए उदयपूर नहीं आ सकेगी-कहीं इस कारण ही चिंतित न हो। जहां तक होगा आना हो ही जाएगा और यदि न भी आ सकी तो दुख मत मानता। क्योंकि तेरी सेवा मुझे निरंतर ही मिल रही है। किसी के प्रेम की क या काफी सेवा नहीं है? वैसे यदि तू नहीं आ पाएगी तो मुझे खाली-खाली तो बहुत लगेगा। अभी तक तो उदयपुर शिविर के साथ तेरे साथ का खयाल भी जुड़ा हुआ है।

            और मुझे आशा भी है कि तू वहां आ जाएगी। माणिक वाबू को प्रेम। वहां शेष सब को मेरे प्रणाम रहना। 



रजनीश के प्रणाम
२९-४-१९६५ (प्रभात) प्रति : सुश्री सोहन, पूना

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

प्रेम के दिए - ओशो

 

prem-ke-die-osho

प्यारी सोहन, 

    प्रेम। 

            कल रात्रि जब सारे नगर में दिए ही दिए जले हुए थे तो मैं सोच रहा था कि मेरी सोहन ने भी दिए जलाए होंगे और उन दीयो में से कुछ तो निश्चय ही मेरे लि ए ही होंगे! और फिर वे दिए मुझे दिखाई देने लगे थे जो कि तूने जलाए थे और वे दिए भी जो कि सदा ही तेरा प्रेम जलाए हुए हैं। मैं कल और यहां रहूंगा। सबसे तेरी बातें कही हैं और सभी तुझे देखने को उत्सुक हो गए हैं। माणिक बाबू को प्रेम। बच्चों को आशीष । 



रजनीश के प्रणाम
२५-१०-१९६५ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

रविवार, 25 अप्रैल 2021

अंतर्यात्रा-स्वयं में, सत्य में - ओशो

  

The-inner-journey-in-itself-the-truth-Osho

प्रिय सोहन, 

    स्नेह। 

            मैं आनंद में हूं। आज रात्रि ही पुन: बाहर जा रहा हूं। बंबई आकर मिल सकी, यह शुभ हुआ। तुम्हारे भीतर जो हो रहा है, उसे देखकर हृदय प्रफुल्लित हुआ। ऐसे ही व्यक्ति तैयार होता है और सत्य के सोपान चढ़े जाते हैं। जीवन दुहरी यात्रा है : एक यात्रा समय और स्थान होता है, और दूसरी यात्रा स्वयं में और सत्य में होती है। पहली यात्रा का अंत मृत्यु में और दूसरी का अमृत में होता है। दूसरी ही यात्रा व स्तविक है, क्योंकि वही कहीं पहुंचाती है। जो पहली यात्रा को ही सब समझ लेते हैं, उनका जीवन अपव्यय हो जाता है। वास्तविक जीवन उसी दिन आरंभ होता है जिस दिन दूसरी यात्रा की शुरुआत होती है। तुम्हारी चेतना मैं वह शुभारंभ हुआ है और मैं उसे अनुभव कर आनंद से भर गया हूं। माणिक लाल जा को और सबको मेरा स्ने



रजनीश के प्रणाम
४-१-१९६५ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

अंतस में छिपे खजाने की खुदाई - ओशो

 

Digging-the-hidden-treasure-within-Osho

प्रिय सोहनवाई प्रेम। 

            तुम्हारा पत्र मिला है। जो शांति मुझमें है, उसे चाहा है। किसी भी क्षण वह तुम्हारी ही है। वह हम सब की अंतर्निहित संभावना है। केवल उसे खोदना और उघाड़ना है। जैसे मिट्टी की परतों में जलस्रोत दवे रहते हैं, ऐसे ही हमारे भीतर आनंद का राज्य । छपा हुआ है। यह संभावना तो सब की है, पर जो उसे खोदते हैं, मालिक केवल वे ही उसके हो पा ते हैं। धर्म अंतस में छिपे उस खजाने की खुदाई का उपाय है। वह स्वयं में प्रकाश का कुंआ खोदने की कुदाली है। वह कुदाली तो मैं तुम्हें बताया हूं, अव खोदना तुम्हें है। मैं जान रहा हूं कि तुम्हारे चित्त को भूमि बिलकुल तैयार है।

            और बहुत अल्प श्रम से अनंत जलस्रोतों को पाया जा सकता है। चित्त की ऐसी स्थिति बहुत सौभाग्य से मिलती है। इस सौभाग्य, और इस अवसर का पूरा उपयोग करना है। ऐसे संकल्प से अपने को भरो, और शेष प्रभू पर छोड़ दो। सत्य सदा संकल्प के साथ है। पत्र लिखने में संकोच कभी मत करना। मेरे पास तुम्हारे लिए बहुत समय है। उनके ही लिए हूं, जिनको मेरी जरूरत है।

        मेरे जीवन में मेरे लिए अब कुछ भी नहीं है। श्री मणिकलाल जी को मेरा प्रणाम । 



रजनीश के प्रणाम
२३-११-१९६४ प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

संकल्प और समर्पणरत साधना - ओशो

 

Resolve-and-Dedicated-Silence-Osho

प्रिय सोहनवाई, स्नेह, 

        बहुत बहुत स्नेह । मैं बाहर से लौटा हूं तो आपका पत्र मिला है। उसके शब्दों से आपके हृदय की पूरी आकुलता मुझ तक संवादित हो गयी है। जो आकांक्षा आपके अंतःकरण को आंदोलित कर रही है, और जो प्यास आपकी आंखों में आंसू बन जाती है, उसे मैं भली भांति जानता हूं। वह कभी मुझ में भी थी, और कभी मैं भी उससे पीड़ित हुआ हूं। मैं आपके हृदय को समझ सकता हूं क्योंकि प्रभु की तलाश में मैं भी उन्हीं रास्तों से निकला हूं जिनसे कि आपको निकलना है। और, उस आकुलता को मैंने भी अनुभव ि कया है, जो कि एक दिन प्रज्वलित अग्नि वन जाती है, ऐसी अग्नि जिसमें कि स्वयं को ही जल जाना होता है। पर वह जल जाना ही एक नये जीवन का जन्म भी है। बूं द मिटकर ही तो सागर हो पाती है।

        समाधि साधना के लिए सतत प्रयास करती रहें। ध्यान को गहरे से गहरा करना है। वही मार्ग है। उससे ही, और केवल उससे ही, जीवन सत्य तक पहुंचाना संभव हो पा ता है। और, जो संकल्प से और संपूर्ण समर्पण से साधना होता है, स्मरण रखें कि उसका सत् य तक पहुंचना अपरिहार्य है। वह शाश्वत नियम है। प्रभु की ओर उठाए कोई चरण कभी व्यर्थ नहीं जाते हैं। वहां सबको मेरा प्रणाम कहें। श्री माणिकलाल जी की नए वर्ष की शुभ कामनाएं मिल । हैं। परमात्मा उनके अंतस को ज्योतिमर्य करे, यही मेरी प्रार्थना है। 



रजनीश के प्रणाम
११-११-१९६४ प्रति : सोहन वाफना, पूना

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

प्रेम-अनंतता है - ओशो

 

Love-is-infinity-osho

मेरे प्रिय। 

    प्रेम। 

               तुम्हारा पत्र पाकर अत्यंत आनंदित हूं। ऐसा हो भी कैसे सकता है कि प्रेम की किरण आवे और साथ में आनंद की सुवास न हो? आनंद प्रेम की सूवास के अतिरिक्त है ही क्या? लेकिन पृथ्वी तो ऐसे पागलों से भरी है, जो कि-जीवन भर आनंद की तलाश करते हैं और प्रेम की ओर पीठ किए रहते हैं। प्रेम ही जब समग्र प्राणों की प्रार्थना बन जाता है। तभी प्रभु के द्वार खुल जाते हैं। शायद उसके द्वार खुले ही हैं, लेकिन जो आंखें प्रेम के लिए बंद हैं, वे उसके खुले द्वा रों को भी कैसे देख सकती हैं? लेकिन, यह क्या लिखा है : क्षणिक संपर्क! नहीं! नहीं! प्रेम का संपर्क क्षणिक कैसे हो सकता है? प्रेम तो क्षण को भी अनंत बना देता है। प्रेम जहां है वहां कुछ भी क्षणिक नहीं है। प्रेम जहां है वहीं अनंतता (द्मजमतदपजल) है। बूंद क्या बूंद ही है? नहीं! नहीं! वह सागर भी है। प्रेम की आंखों से देखी गई बूंद सागर हो जाती है। मैं अगस्त में यहां प्रतीक्षा करूंगा। २, ३, ४ अगस्त। टंडन जी को मेरे प्रणाम कहें। 



रजनीश के प्रणाम
३०-६-६८ प्रति : श्री महीपाल, बंबई

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

छोड़ो स्वयं को और मिटो - ओशो

Quit-yourself-and-delete-Osho


मेरे प्रिय, 

    प्रेम। 

            प्रेम भी आग है। ठंडी आग! फिर भी उसमें जलना तो पड़ता ही है। लेकिन, वह निखारता भी है। निखारने के लिए ही वह जलाती है। कूड़ा-कर्कट जल जाता है, तभी तो शुद्ध स्वर्ण उपलब्ध होता है। ऐसे ही मेरा प्रेम भी पीड़ा बनेगा। मैं तुम्हें मिटा ही डालूंगा क्योंकि तुम्हें बनाना है। वीज को तोड़ना ही होगा-अन्यथा वृक्ष का जन्म कैसे होगा? सरिता को समाप्त करना ही पड़ेगा अन्यथा वह सागर वनने से वंचित ही रह जाएगी इसलिए, छोड़ो स्वयं को और मिटो। क्योंकि, स्वयं को पाने का और कोई मार्ग नहीं है। 



रजनीश के प्रणाम
२५-१९-१९७० प्रति : श्री सरदारीलाल सहगल, न्यू मिसरी बाजार, अमृतसर

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

जीवन-संगीत - ओशो

Life-Music-Osho


प्यारी संगीता,

    प्रेम। 

            आकाश में चांद उगे तब उसे एक टक निहारना-शेष सब भूल कर। स्वयं को भी भूलकर। तव ही तू जानेगी उस संगीत को जो कि स्वरहीन है। और तब भोर का सूर्य जगे तब पृथ्वी पर सिर टके उसके प्रणाम में खो जाना। तव ही तू जानेगी उस संगीत को कि मनुष्य निर्मित नहीं है। और जव वृक्षों पर फूल खिलें तव हवा के झोंको में उनके साथ नाचना फूल ही वनक र। तव ही तू जानेगी उस संगीत को जो कि स्वयं के अंतस्तल में ही जन्मता है। और जो ऐसे संगीत को पहचान लेता है, वह जीवन को ही पहचान लेता है। जीवन संगीत का ही दूसरा नाम परमात्मा है। 



रजनीश के प्रणाम
१४-११-७० प्रति : चि. संगीता खाबिया, खाविया सदन, चौमुखी पूल, रतलाम म. प्र.

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

जीवन-श्रृंखला की समझ - ओशो

  

Life-series-understanding-Osho

प्रिय, हसुमति, 

    प्रेम। 

            असंभव भी असंभव नहीं है। बस संकल्प चाहिए। और संभव भी असंभव हो जाता है। बस, संकल्पहीनता चाहिए। जगत जिसमें हम जीते हैं. वह स्वयं का ही निर्माण है। लेकिन, वीज बोने और फसल आने मग समय के अंतराल से बड़ी भांति हो जाती है।

            कारण (बनेम) और कार्य (ममिवज) के जुड़े हुए न दिखाई देने से चित्त जिसे सहज ही समझ सकता था, उसे भी नहीं समझ पाता है। लेकिन, टूटा हुआ और अशृंखला कुछ भी नहीं है। जो कड़ियां (ऊपेपदह डपदो) दिखाई नहीं पड़ती हैं, वे भी हैं, और थोड़े ही गहरे निर क्षिण के सामने प्रकट हो जाती हैं। जीवन शृंखला की समझ ही शांति का द्वार है। प्रकाश बहुत निकट है, लेकिन वह भी खोजने वाले की प्रतीक्षा करता है। 



रजनीश के प्रणाम
१९-११-१९७० प्रति : कूमारी हसुमति एच, दलाल, लाड निवास, ३ रा माला, रूम नं. २६, अर्धेश्वर दादी स्ट्रीट, बंबई-४

रविवार, 11 अप्रैल 2021

प्यास, प्रार्थना, प्रयास और प्रतीक्षा - ओशो

Thirst-Prayer-Effort-and-Waiting-Osho


परम प्रिय, 

    प्रेम। 

        पत्र मिला है। उससे आनंदित हूं। सत्य के लिए, शांति के लिए, धर्म के लिए, हृदय जब इतनी अभीप्सा से भरा है, तो एक न एक दिन उस सूर्य के दर्शन भी होंगे ही जिसके साक्षात से ही जीवन का सव अंधकार दूर हो जाता है। प्यास करो। प्रार्थना करो। प्रयास करो और प्रतीक्षा करो। छोटे छोटे कदम कैसे हजारों मिल का फासला तय करेंगे, इससे घबड़ाना मत। एक ए क कदम चलकर ही अनंत दूरियां भी तय की जा सकती हैं। बूंद बूंद जुड़कर ही तो सागर भरता है। वहां सवको प्रणाम। मैं तो अब जल्दी ही आ रहा हूं। शेष मिलने पर। त्रिमूर्ति के क्या हाल हैं? 



रजनीश के प्रणाम
३०-८-१९६६ प्रति : श्री जयंती भाई, बंबई

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

योग साधना है सम्यक धर्म - ओशो

Yoga-practice-is-right-religion-Osho


प्रिय वहिन, 

    प्रणाम। 

        आपका पत्र मिला है। मैं प्रतीक्षा में ही था। राजनगर की यात्रा आनंदपूर्ण रही है। धर्म साधना योग की दिशा को छोड़ केवल नैतिक रह गयी है; उससे उसे प्राण खो गए हैं। नीति नकारात्मक है और केवल नकार पर जीवन की बुनियाद नहीं रखी जा सकती है। अभाव प्राण नहीं दे सकता है। छोड़ने पर नहीं, पाने पर जोर आवश्यक है। अज्ञात को छोड़ने की जगह ज्ञान को पाने को केंद्र बनाना है। यह साधना से ही हो सकता है। ऐसी साधना योग से उपलब्ध होती है। आचार्य श्री तलसी मनि श्री न थुमल जी आदि से हुई चर्चाओं में मैं इतनी वात पर जोर दिया हूं। राजनगर तथा रा जस्थान से इस संबंध में बहुत से पत्र भी आ रहे हैं; जैसा कि आपने लिखा है; लगता है कि वहां आने से कुछ सार्थक कार्य हुआ है। इतना स्पष्ट दिख रहा है कि लोग आ त्मिक जीवन के प्यासे हैं और प्रचलित धर्म के रूप उन्हें तृप्ति नहीं दे पाते हैं। और सम्यक धर्म का रूप उन्हें दिया जा सके तो मानवीय चेतना में एक क्रांति घटित हो स कती है। आपकी स्मृति आती है। ईश्वर आपको शांति दे। सबको मेरा प्रेम और प्रणाम कहें। 



रजनीश के प्रणाम
१०-२-१९६३ प्रति : सुश्री जया शाह, बंबई

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

शून्य है द्वार प्रभु का - ओशो

 

Zero-is-the-door-of-God-Osho

प्रिय बहिन, 

    प्रणाम। 

            मैं प्रतीक्षा में ही था कि पत्र मिला है। जीवन में आपके प्रकाश भर जाए और आप प्रभु को समर्पित हो सकें यही मेरी कामना है। प्रभू और प्रकाश निरंतर निकट हैं, बस आंख भर खोलने की बात है और-जो हमारा है वह हमारा हो जाता है। आंख की पलकों का ही फासला है-याकि, शायद उतना भी फासला नहीं है, आंखें खुली ही हैं और हमें ज्ञात नहीं है। एक पुरानी कथा है : एक मछली बहुत दिनों से सागर के संबंध में सुनती रही थी। फर एक दिन उससे न रहा गया और उसने मछलियों की रानी से पूछ लिया कि यह सागर क्या है ? और कहा है ? रानी बोली थी : सागर? सागर में ही तुम हो, (सागर में ही) तुम्हारा जीवन, तुम्हारा सत्ता है। सागर तुमने है और तुम्हारे बाहर भी जो है वह भी सागर है। सागर से तुम बनी हो और उसमें ही तुम्हें विलीन होना है। सागर तुम्हारा सब कुछ है और उसके अतिरिक्त तुम कुछ भी नहीं हो। और शायद इसलिए ही सागर मछली को दिखाई नहीं पड़ता है? और शायद इसलिए ही प्रभु से हमारा मिलन नहीं होता है? पर मिलन हो सकता है। उस मिलन का द्वार शून्य है, शून्य होते ही उससे मिलना हो जाता है क्योंकि वह भी शून्य ही है। मैं आनंद में हूं : याकि कहूं कि आनंद ही है और मैं नहीं हूं। 



रजनीश के प्रणाम
१२-१-१९६३ प्रति : सुश्री जया बेन शाह, बंबई

सोमवार, 5 अप्रैल 2021

स्वप्निल मूर्छा-ग्रंथि - ओशो



Ophthalmic-gland-Osho


प्रिय वहिन, 

    प्रणाम। 

            आपका पत्र मिले देर हो गई है। मैं शांति पाने की आपकी भावना से आनंद से भर जाता हूं। यह विचार अपने से अलग कर दें कि आप पीछे हैं। कोई पीछे नहीं है : जरा सा भीतर मुड़ने की बात है और बूंद सागर हो जाती है। वस्तुतः तो बूंद सागर ही है पर उसे यह ज्ञात नहीं है। इतना सा ही भेद है। ध्यान के शून्य में जो दर्शन होता है उससे यह भेद भी पूछ जाता है। ध्यान जीवन साधना का केंद्र है। विचार प्रवाह धीरे-धीरे चला जाएगा और उसके स्था न पर उतरेगी शांति और शून्यता। विचार गए तो जो द्रष्टा है, साक्षी है उसके दर्शन होंगे और मूर्छा की ग्रंथि खुली जाएगी। इस ग्रंथि से ही बंधन है। यह ग्रंथि प्रारंभ में पत्थर सी दीखती है और धैर्य से प्रयोग करता साधक एक दिन पाता है कि वह बिल कूल स्वप्न थी-हवा थी। ध्यान का बीज एक दिन समाधि के फूल में खिले मेरी यही आपके प्रति कामना है। सवको मेरे विनम्र प्रणाम कहें। इला कैसी है? शेष मिलने पर। 



रजनीश के प्रणाम।
१४-१२-६२ प्रति : श्री जया शाह, बंबई

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

अतः ज्योति - ओशो

 

Hence-Jyoti-Osho

प्रिय वहिन, 

            प्रभू की अनुकंपा है कि आप भीतर की ज्योति के दर्शन में लगी हैं। वह ज्योति निश्चि त ही भीतर है जिसके दर्शन से जीवन का समस्त तिमिर मिट जाता है। एक एक चर ण भीतर चलता है और पर्त पर्त अंधेरा कटता जाता है और फिर आता है आलोक को लोक और सव कुछ नया हो जाता है। इस दर्शन से वंधन गिर जाते हैं और ज्ञात होता है वे वस्तुतः कभी थे ही हनीं-नित्य मुक्त को मुक्ति मिल जाती है। मैं आपकी प्रगति से प्रसन्न हूं। आपका पत्र मिले तो देर हुई पर बहुत व्यस्थ था इसलि ए उत्तर में विलंब हो गया है। पर स्मरण आपका मुझे बना रहता है-उन सबका वना रहता है जो प्रकाश की ओर उन्मुख हैं और उन सबके लिए मेरी अंतरात्मा से सदभ वनाए बहती रहती हैं। चलते चलना है-बहुत बार मार्ग निराश करता है पर अंततः जिन्हें प्यास है उन्हें पानी भी मिल ही जाता है। वस्तुत: प्यास के पूर्व ही पानी की स त्ता है। सबको मेरे विनम्र प्रणाम। 



रजनीश के प्रणाम
२१-११-१९६२ (प्रभात) प्रति : सुश्री जया शाह, बंबई

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

साक्षी की आंखें - ओशो

Witness-s-eyes-Osho


सुश्री जया जी, 

    प्रणाम। 

            मैं वाहर था : मेरे पीछे घूमता हुआ आपका पत्र मुझे यात्रा में मिला। उसे पा कर आनंद हुआ है। जीवन मुझे आनंद से भरा दीखता है। पर उसे देख पाने की आंखें न होने से हम उससे वंचित रह जाते हैं। ये आंखें पैदा की जा सकती है : शायद पैद | करना कहना ठीक नहीं है : वे हैं और केवल उन्हें खोलने भर की ही बात है और परिणाम में सब कुछ बदल जाता है। ध्यान से यह खोलना पूरा होता है। ध्यान का अ र्थ है : शांति : शून्यता। यह शून्यता मौजूद पर विचार प्रवाह से, मन से ढंकी है। विच र के जाते ही वह उदघाटित हो जाती है। पूरी विचार प्रवाह से मुक्त होना कठिन द खिता है पर बहुत सरल है। यह मन बहुत चंचल दीखता है पर बहुत ही आसानी से रुक जाता है। इसे पार कर जाने की कुंजी साक्षी भाव है। मन के प्रति साक्षी होना है , द्रष्टा बनना है : इसे देखना है : केवल देखना है और यह साक्षी वोध जिस क्षण उप लब्ध हो जाता है उसी क्षण विचार से मुक्ति हो जाती है। विचार मुक्त होते ही आनं द के द्वार खूल जाते हैं और यहां जगत एक नया जगत हो जाता है। ध्यान को चलाए चलें-परिणाम आहिस्ता-आहिस्ता आएंगे। उनकी चिंता नहीं करनी है । उनका आना निश्चित है। मेरा वंवई आना अभी तय नहीं है। तय होते ही सूचित करूंगा। सबको मेरे विनम्र प्रणाम । 



रजनीश के प्रणाम
२०-१०-१९६२ प्रति : सुश्री जया शाह, वंबई