बुधवार, 12 अगस्त 2020

मौन चित्त के बर्तन को साफ करता है - ओशो

Silence-clears-the-pot-of-mind-Osho

मौन चित्त के बर्तन को साफ करता है - ओशो 

          एक साधु ने अपने शिष्य को कहा था, तुम जाओ, जो तुम मेरे पास नहीं समझ सके , वह मेरा एक मित्र है, उसके पास जाकर समझो। वह उसके मित्र के पास गया है। देखकर हैरान हुआ कि जहां उसे भेजा गया है, वह तो एक सराय का रख वाला है। जाते से उसका मन यह हुआ कि सराय के रखवाले से मैं क्या सीखूगा। लेकिन ि फर भी भेजा गया हूं तो वह रुका। उसके गुरु ने कहा था कि तुम सुबह से शाम त क देखना कि वह क्या करता है। उसकी पूरी चर्या को समझना। उसकी पूरी चर्या उ सने समझी। वह तो सराय का नौकर था, सराय का काम मरता था। दो चार दिन बाद वापस लौटने लगा। वह तो पाने को कुछ भी नहीं था। लेकिन उसने सोचा कि मुझे पता नहीं कि रात को सोते वक्त कुछ करता हो। सूबह अंधेरे में जाग आता ह । उस वक्त कुछ करता हो। उसने चलते वक्त उससे पूछा कि क्या मैं यह पूछू कि रात को सोते समय आप क्या करते हैं? और सुबह जागकर क्या करते हैं? उसने कहा, दिन भर से सराय के ब र्त गंदे हो जाते हैं, रात सोते वक्त उनका झाड़ पोंछ कर साफ करके रख देता हूँ। फिर रात भर में धूल जम जाती है। सुबह उठकर फिर उनको साफ कर देता हूं। उ सने सोचा कि कहां के पागल के पास मुझे भेज दिया। जो केवल सराय का रखवाला है और बर्तन साफ करता है।

          वह वापस लौट आया। उसने अपने गुरु को कहा। गुरु ने कहा कि उसकी बात तो पूरी थी, अगर तुम समझते। उसने कहा कि दिन भर में बर्तन गंदे हो जाते हैं, सांझ में साफ कर लेता हं, रात भर में फिर थोड़ी बहूत धूल जम जाती है। सुबह फिर साफ कर लेता हूं। यही तो कुल जमा करना है। वह चित्त हमारा दिन भर में गंदा हो जाता है। उसे रात सोते वक्त साफ कर लें, उसे पोंछ डालें और सुबह सपने फिर रात भर में कुछ गंदा कर देंगे। सुबह फिर उसे पोंछ डालें। कैसे पोंछेगे? क्योकि मकान पोछना तो हमें मालूम है, लेकिन चित्त को कैसे पोंछेगे?

           चित्त को कैसे साफ करेंगे? कौन सा जल है जो चित्त के बर्तन को स फि करेगा? मैं आपको कहूं, मौन-मौन चित्त को साफ करता है। जो जितना ज्यादा मौन में प्रवि ष्ट होता है, उतना उसके चित्त का बर्तन साफ हो जाता है। मौन के जल से चित्त के बर्तन धोए जाते हैं। लेकिन हम मौन रहना भूल गए हैं। हम एक दम बोले जा र हे हैं, दूसरों से या अपने से। हम चौबीस घंटे बातचीत में लगे हुए हैं, अपने से या दूसरों से। सोते समय तक भी बातचीत करते हैं, उठते ही हम फिर बातचीत में ल ग जाते हैं। हम बातों से घिरे हुए हैं। मौन हम भूल गए हैं। इस संसार में अगर को ई चीज खो गई है तो मौन खो गया है और जहां मौन खो जाएगा. वयं जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, वह खो जाएगा क्योंकि सब श्रेष्ठ मौन से जन्मता है, साइलेंस से पैदा होता है।

- ओशो 


शनिवार, 8 अगस्त 2020

तुम जैसे हो वैसा ही जगत अपने आस पास बना लोगे - ओशो

The-world-will-be-built-around-you-like-you-are---Osho
ओशो 

तुम जैसे हो वैसा ही जगत अपने आस पास बना लोगे -  ओशो 

          एक बूढ़ा आदमी गांव के बाहर बैठा था। दूसरे गांव से आते हुए एक राहगीर ने उससे पूछा कि क्या मैं यह पूछ सकता हूं कि गांव के लोग कैसे हैं। मैं यहां बसने का - इरादा रखता हूं। उस बूढ़े आदमी ने कहा, मैं यह बताऊंगा जरूर कि इस गांव के लोग कैसे हैं? लेकिन मैं पहले यह पूछ लूं कि तुम जिस गांव में बसते थे, वहां के लोग कैसे थे? उसके बाद ही कुछ बताना संभव हो सकता है।

          वह आदमी हैरान हुआ, उसने कहा, इससे क्या संबंध है कि उस गांव के लोग कैसे थे। उस बूढ़े ने कहा , फिर भी मैं पूछ लूं, जीवन भर का अनुभव मेरा यह कहता है कि पहले मैं पूछ लूं कि उस गांव के लोग कैसे थे। उसने कहा, उस गांव के लोगों का नाम भी मत लो। उन्हीं दृष्टों के कारण तो मुझे वह गांव छोड़ना पड़ा है। उस बूढ़े ने कहा, फिर और कोई गांव खोजो इस गांव के लोग बहुत बुरे हैं, बहुत दुष्ट हैं और यहां रहने से कोई सार नहीं होगा।

          और उस बूढ़े आदमी ने ठीक ही कहा। और उस आदमी के जाने के बाद ही एक दूसरा आदमी आया और उसने पूछा कि मैं इस गांव में बसना चाहता है। यहां के लोग कैसे हैं? उसने फिर वही कहा कि पहले मैं यह पूछ लूं कि  उस गांव के लोग कैसे थे, जहां से तुम आते हो? उसे आदमी ने कहा, उनका नाम ही मुझे आनंद से भर देता है। उतने बेहतर लोग मैंने कहीं देखे नहीं। वह बूढ़ा बोला, आओ स्वागत है, बसो। इस गांव में तुम्हें उस गांव से बेहतर लोग मिल जाएंगे।

-ओशो 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

आदतें मनुष्य की चेतना को दबा देती है - ओशो

Habits-suppress-human-consciousness---Osho
ओशो 

आदतें मनुष्य की चेतना को दबा देती है - ओशो 

आदतें मनुष्य की चेतना को दबा देती है। जिस मनुष्य को आत्मा को उपलब्ध करना हो उसकी उतनी ही कम आदतें होनी चाहिए , उसके उतने ही कम बंधन होने चाहिए, उससे उतनी ही कम जड़ता होनी चाहिए। रात जो मैंने कहा, संवेदना का क्या अर्थ है, सेंसेटिव होने का क्या अर्थ है, उसका प्रयोजन यह था, जितनी कम जड़ता हो उतनी ज्यादा मनुष्य के भीतर संवेदन की शक्ति जाग्रत होगी। और जितनी ज्यादा जड़ता हो उतनी संवेदन की शक्ति शून्य हो जाती है। और संवेदन की शक्ति जितनी गहरी हो, हम सत्य को उतनी ही गहराई तक अनुभव कर पाएंगे, और संवेदन की शक्ति जितनी क्षीण हो जाएगी, उतना ही हम सत्य से दूर हो जाएंगे।

तो मैं आपको कहूंगा, जो धार्मिक हैं, वह स्मरण रखें कि धर्म उनकी आदत न बन जाए। कहीं धर्म भी उनकी एक जड़ आदत न बन जाए कि वह सूबह रोज मंदिर जाएँ, नियत समय पर मंदिर जाए, एक नियत मंत्र पढ़ें, एक नियत देवता के सामने । हाथ झुकाए, यह कहीं उनकी जड़ आदत न हो। और यह सच है कि सौ मैं निन्यान बे मौके पर यह एक जड़ आदत है। और यह आदतें बेहतर नहीं है और यह आदत ठीक नहीं है। फिर यह भी स्मरण रखें, आपने दुसरों की आज्ञाएं स्वीकार कर ली हैं और आप उनके अनुकूल वर्तन कर रहे हैं, उनके अनुकूल आचरण कर रहे हैं। यह भी जड़ता का अंगीकार कर लेना है। जब भी मैं कोई आज्ञा दूं और आप स्वीकार कर लें तो आपकी चेतना भीतर क्षीण हो जाती है। जब भी दूसरा कुछ कहे और आप स्वीकार कर लेते हैं, आपके भीतर की चेतना जड़ होने लगती है। समाज कहता है, संस्कार कहते हैं, पुरोहित कहते है, हजारों वर्षों की उनकी परंपरा है, उसके वजन पर कहते हैं। उद्वरण करते हैं शास्त्रों का कि यह ठीक है और हम उसे मान लेते हैं। और उसे स्वीकार कर लेते हैं। धीरे-धीरे हम स्वीकार मात्र पर टिके रहे जाएंगे, और हमारे जो स्फुरण होना चाहिए था, जीवन का, वह बंद हो जाएगा।

-ओशो 

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मनुष्य जितना यांत्रिक होता जायेगा उतना उसकी चेतना सिकुड़ती जायेगी - ओशो

The-more-mechanical-a-man-becomes-the-more-his-consciousness-will-shrink---Osho
ओशो 

मनुष्य जितना यांत्रिक होता जायेगा, उतना उसकी चेतना सिकुड़ती जायेगी - ओशो 

          इस जगत का जैसा विकास हुआ है वह क्रमशः इस भांति हुआ है कि हम मनुष्य की जगह मशीन को ज्यादा आदर देने लगे हैं और क्रमश: मनुष्य भी धीरे-धीरे मशीन होता जा रहा है। जो आदमी जितना ज्यादा मैकेनिकल, जितना ज्यादा यांत्रिक हो जएगा, उतनी ही उसके भीतर की आत्मा सिकुड़ जाती है। उसके प्रगटीकरण के रासते बंध हो जाते हैं। हम अपने को देखेंगे तो हम पाएंगे कि हम करीब-करीब एक म शीन की भांति हैं, रोज वहीं के वहीं काम कर लेती है। और हम इन कामें को दोहराते चले जाते हैं। और एक दिन हम पाते हैं, आदमी मर गया। मृत्यु इसी यांत्रिक ता का अंतिम चरण है। हम धीरे-धीरे जड़ होते जाते हैं।

          एक छोटा बच्चा जितना चैतन्य होता है एक बूढ़ा उतना चैतन्य नहीं होता। इसलिए क्राइस्ट ने कहा है, जो छोटे बच्चे की भांति होगे वे परमात्मा के राज्य को अनुभव कर सकते है। इसका केवल यह अर्थ नहीं है कि जिनकी उम्र कम होगी, इसका यह अर्थ है कि जिनके भीतर स्फुरणा, जिनके भीतर सहज चेतना। जितनी ज्यादा होगी, उतने जल्दी परमात्म के करीब पहुंच सकते हैं, वे उतने जल्दी सत्य को अनुभव कर सकते हैं।

          जैसे विगत दो हजार, ढाई हजार, वर्षो में मनुष्य का विकास होता रहा है, यह संभविना कम होती हुई है। हमारा सहजता, वह जो भी स्पोटेनियस है वह हमारे भीतर कम होता गया है और हमारी जड़ता बढ़ती गयी है। जीवन जैसा है, उसमे शायद जड़ता को बढ़ा लेना उपयोगी होता है। एक आदमी सेना में भर्ती हो जाए, अगर वह चेतन हो तो सेना उसे इनकार कर देगी, वह जितना जड़ हो उतना ही अच्छा सैनिक हो सकेगा। जड़ होने का अर्थ है, उसके भीतर अपनी कोई स्वतंत्र बुद्धि न रह जाए। उसे जो आज्ञा दी जाए, उसे वह पुरा का पुरा पालन कर ले, उसमें जरा भी यहां, वहां, उसके भीतर कोई कंपन चेतन का नहीं होना चाहिए। इसलिए सैनिक धीरे-धीरे जड़ हो जाता है और जितना ही जड़ हो जाता है उतना ही हम कहते हैं, वह योग्य सैनिक है, क्योंकि जब हम उस से कहते हैं, आदमी को गोली मारो तो उसके भीतर कोई विचार नहीं उठता, वह गोली मारता है। और जब हम कहते हैं, बाएं घूम जाओ, तो वह बाएं घूम जाता है उकसे भीतर कोई विचार नहीं उठते। डिसीप्लीन पूरी हो गयी और आदमी मर गया। आशा पूरी होने लगी और आदमी भीतर समाप्त हो गया।

          इसलिए दुनिया में जितने सैनिक बढ़ते जाएंगे उतना धर्म शून्य और क्षीण होता जाएगा, क्योंकि वे सबके सब इतना अनुशासित होंगे कि उनके भीतर चेतना का कोई प्रवाह नहीं हो सकता। इसलिए मैं सेनाओं के विरोध में हूं, इसी लए नहीं कि वे हिंसा करती हैं, बल्कि इस लिए कि इसके पहले कि कोई आदमी हसने में समर्थ हो सके, जड़ हो जाता है। और दुनिया में जितनी सेनाएं बढ़ती जाएँगी , उतने लोग जड़ होते जाएंगे। और अब तो सारी दुनिया करीब-करीब एक सैनिक कैप में परिणत होती जा रही है। अब तो हम अपने बच्चों को भी कालेजों में, सकूलों में सेना की शिक्षा देंगे। और हमें याद नहीं है कि हम जिस आदमी को भी सेना की शिक्षा दे रहे है, हम उसे इस बात की शिक्षा दे रहे हैं कि उसके भीतर चेतना क्षीण हो जाए, वह एक मशीन हो जाए। उससे जो कहा जाए, वही वह करे, उ सके भीतर अपनी कोई स्वतंत्र विचारणा न रह जाए। अगर यह दुनिया में हुआ तो दुनिया में धर्म विलीन हो जाएगा।

-ओशो 

बुधवार, 5 अगस्त 2020

जो व्यक्ति जितना जागरूक होकर जीवन जियेगा, वह उतना ही शून्य होता जायेगा - ओशो

The-more-aware-a-person-lives-the-more-it-becomes-zero-Osho
ओशो

जो व्यक्ति जितना जागरूक होकर जीवन जियेगा, वह उतना ही शून्य होता जायेगा -  ओशो 

          जो व्यक्ति जितना जागरूक होकर जीवन में जीता है, वह उतना शून्य होता जाता है। समझ लें, मैं यहां सौ फीट लंबी और एक फीट चौडी लकडी की एक पट्टी रख दं और आपसे कहूं कि उस पर चलें, तो आप गिरेंगे, कि पार निकल जाएंगे। सभी पार निकल जाएंगे। छोटे बच्चे, स्त्रियां, बूढ़े, सभी पार निकल जाएंगे। सौ फीट लंबी , एक फीट चौड़ी लकड़ी की पट्टी रखी हुई है। आपसे मैं कहूं, चलें, और आप सभी निकल जाएंगे कोई भी गिरेगा नहीं।

          फिर समझ लें कि इस ऊपर किसी स्थान से दीवाल तक अगर सौ फीट लंबी पट्टी रख दी गयी हो और नीचे गहराई हो. और फिर आपसे कहा जाए, इस पर चलें, आप में से कितने लोग चल पाएंगे? फर्क तो कुछ भी नहीं हुआ है वह पट्टी सौ फीट लंबी, एक फीट चौड़ी अब भी है, जितनी उस  समय पर थी, उतनी अब दो मकानों के ऊपर राखी हुई है। फिर आपको जाने में डर क्या है? घबराहट क्या है? कितने लोग उसके पार हो पाएंगे? कितने लोग पार जाने की हिम्मत करेंगे? कठिनाई क्या आ गयी? उसकी लंबाई चौड़ाई वही की वही है, आप वही के वही आदमी हैं। इस नीचे गड्ढे से फर्क क्या पड़ रहा है ?

          फर्क यह पड़ रहा है कि जब नीचे पट्टी रखी थी, आपको मूर्छित चलना संभव था , कठिनाई नहीं थी। आप अपने दिमाग में कुछ भी सोचते हुए चल सकते थे। अब ऊपर आपको परिपूर्ण जागरूक होकर चलना होगा। अगर जरा भीतर दिमाग में कुछ गड़बड़ हुई, बातें चली, आप नीचे जाएंगे। घबराहट है आपकी मूर्छा। जो जागरूक है वह ऊपर भी चल जाएगा, कोई फर्क नहीं पड़ता। जमीन जैसे नीचे थी वैसे ऊपर भी है। कौन सा फर्क पड़ रहा है। जागरूक अपने शरीर अपने मन, अपने विचार सबके प्रति जागा हुआ होता है, मूर्छित सोया हुआ होता है। तो नीचे तो चल जाते हैं आप, क्योंकि वहां कोई मूर्छा के तोडने की जरूरत नहीं है, ऊपर चलने में घबड़ाते है।

          मुझसे लोग कहते हैं कि जागरूक कैसे हो? तो मेरे गांव के पास एक छोटी सी पहा,डी है, वहां एक बड़े नीचे खंदक है और एक छोटी सी पड़ी है.जिस पर चलने में प्राण कंपते हैं। मैं उन्हें वहां ले जाता हूं और उनसे कहता हूं, इस पर चले। आप को पता चल जाएगा कि जागरूकता क्या है? उस पर दो कदम चलते हैं और कहते हैं कि निश्चित ही, इसके भीतर जाते ही एकदम चित्त शून्य हो जाता है, हम एकदम जाग जाते हैं। जैसे किसी पहाड़ की कगार पर चलते वक्त आप बिलकुल होश से चलते हैं, ठीक वैसे ही चौबीस घंटे जो आदमी होश को संभालता है, वह क्रमशः शुन्य हो जाता है।

-ओशो 


मंगलवार, 4 अगस्त 2020

वही व्यक्ति संवेदनशील हो सकता है, जिसका मन शून्य हो - ओशो

The-same-person-can-be-sensitive-whose-mind-is-zero-Osho
ओशो 

वही व्यक्ति संवेदनशील हो सकता है, जिसका मन शून्य हो - ओशो 

          मैं एक मित्र को लेकर, एक पहाड़ी पर गया हुआ था। पूर्णिमा की रात थी, हमने न दी में देर तक नाव पर यात्रा की। वे मेरे मित्र स्विटजरलैंड होकर लौटे थे। जब त क हम उस छोटी सी नदी में, उस छोटी सी नौका पर थे, तब तक वे स्विटजरलैंड की बातें करते रहे, वहां की झीलों की, वहां के चांद की, वहां के सौंदर्य की। कोई घंटे भर बाद हम वापस लौटे तो बोले, बहुत अच्छी जगह थी जहां आप मुझे ले गए । मैंने उनसे कहा, क्षमा करें, आप वहां पहुंचे नहीं। मैं तो आपको ले गया, आप व हां नहीं पहुंचे। मैं तो वहां था, आप वहां नहीं थे। वे बोले, मतलब? मैंने कहा, आप स्विटजरलैंड में रहे। और मैं आपको यह भी कह दूं, जब आप स्विटजरलैंड में रहे होंगे, तब आप वहां भी नहीं रहे होंगे, क्योंकि मैं आपको पहचान गया, आपकी वृत्ति को पहचान गया। तब आप कहीं और रहे होंगे।

          हम करीब-करीब सोए हुए हैं। जो हमारे सामने होता है, वह हमें दिखायी नहीं पड़ ता है। जो हम सुन रहे हैं, वह हमें सुनायी नहीं पड़ता। मन किन्हीं और चीजों से भरा रहता है। वही व्यक्ति संवेदनशील हो सकता है, जिसका मन शून्य हो। चांद के करीब जिसका मन बिलकुल शून्य है वह चांद के सौंदर्य को अनुभव कर लेगा। फूल के करीब जिसका मन बिलकुल शून्य हैं वह फूल के सौंदर्य को अनुभव कर लेगा। अगर मैं आपके पास हूं और मैं बिलकुल शून्य हूं, तो मैं आपके भीतर जो भी है उसे अनुभव करूंगा। अगर कोई व्यक्ति परम शून्य को उपलब्ध हो गया है, तो इस जगत के भीतर जो भी छिपा है, उसमें उसकी गति और प्रवेश हो जाएगा।

-ओशो 

सोमवार, 3 अगस्त 2020

हमारी संवेदना जितनी गहरी होगी, उतने गहरे सत्य हमें प्रकट होने लगेंगे - ओशो

The-deeper-our-sensations-the-deeper-truths-will-begin-to-appear-to-us-Osho
ओशो 

हमारी संवेदना जितनी गहरी होगी, उतने गहरे सत्य हमें प्रकट होने लगेंगे - ओशो 

          अगर एक अंधा आदमी मुझसे आकर कहे कि मुझे प्रकाश को जानना है तो क्या में उसे सलाह दूंगा कि तुम जाओ और प्रकाश के संबंध में लोगों से समझो। वह तुम्हें जो बताए, उसे याद कर लो तो प्रकाश का पता हो जाएगा? मैं उससे कहूंगा, प्रकाश के संबंध में जानने की फिकर मत करो, आंख ठीक हो जाए, आंख का उपचार हो जाये, इसकी चिंता करो। अगर आंख का उपचार हो जाए तो प्रकाश का अनुभव होगा। लेकिन अगर आंख का उपचार न हो तो प्रकाश के संबंध में कुछ भी जान लेने से कोई अनुभव नहीं होता है। आंख संवेदना है. प्रकाश सत्य है। सत्य को खोजी ।

         ईश्वर के खोजी की भी मैं कहता हूं कि ईश्वर की फिकर छोड़ दो, संवेदना की फिकर करो। हमारी जितनी गहरी संवेदना होगी उतनी ही दूर त क सत्य के हमें दर्शन होते हैं। में आपको देख रहा हूँ। मेरी देखने की शक्ति आपके शरीर के पार नहीं जाती, इसलिए में आपके शरीर को देखकर वापस लौट आता है। अपने को देखता हूं, तो अपने को भी देखने में, शक्ति मेरी, मन के पार नहीं जाती, तो मन को देखकर वापस लौट जाऊंगा। मेरे देखने की शक्ति जितनी गहरी होगी उतना गहरा सत्य का मुझे अनूभव होगा।

          जो लोग परमात्मा को अनुभव करते हैं, उनके देखने की शक्ति इतनी तीव्र है कि प्रकृति को पार कर जाते हैं और परमात्मा को देख लेते हैं। प्रकृति से अलग कहीं परमात्मा नहीं बैठा हुआ है। जो चारों तरफ दिखाई पड़ रहा है, इसमें ही वह छिपा है। अगर हमारी आंख गहरी हो तो हम आवरण को पार कर जाएंगे और केंद्र को अनुभव कर लेंगे। इसलिए सवाल ईश्वर की खोज का नहीं, सवाल अपनी संवेदना को गहरा करने का है। हम जितना गहरा-गहरा अनुभव कर सकें, उतने गहरे सत्य हमें प्रकट होने लगेंगे।

          लेकिन हमें सिखाई कछ और बातें गयी है। हमें सिखाया जाता है, ईश्वर को खोजो। तब पागल कुछ हिमालय पर ईश्वर को खोजने जाते हैं, जैसे कहां ईश्वर नहीं है। तब कोई एकांत वन में ईश्वर को खोजने जाता है, जैसे भीड़ में ईश्वर नहीं है। तब कोई भटकता है, दूर-दूर, तीर्थों कि यात्राएं करता है कि वहां ईश्वर मिलेगा। जैसे इन जगहों में जहां तीर्थ नहीं है. कां ईश्वर नहीं है। ईश्वर उसे मिलता है, जिसकी संवेदना गहरी हो। न हिमालय पर जाने से मिलता है. न तीर्थों में जाने से मिलता है. न वनों में जाने से मिलता है। संवेदना गहरी हो तो ईश्वर यहीं, इसी क्षण उपलब्ध है। जिसे देखने की शक्ति हो उसे यहां प्रकाश है और जिसकी आंख न हो ठीक उसे यहां प्रकाश नहीं है। इसलिए महत्वपूर्ण ईश्वर की खोज नहीं, संवेदना की खोज है। और हम बहुत कम संवेदनशील हैं हम बहुत ही कम संवेदनशील है।

-ओशो 

रविवार, 2 अगस्त 2020

हमारी जितनी चेष्टाएं दूसरों को देखकर होगी, वे हमें गलत दिशा की और ले जाएंगी - ओशो


All-our-efforts-will-be-seen-by-others-they-will-lead-us-in-the-wrong-direction-Osho
ओशो 

हमारी जितनी चेष्टाएं दूसरों को देखकर होगी, वे हमें गलत दिशा की और ले जाएंगी - ओशो 

          मैं एक गांव गया। मेरे एक मित्र वहां साधू हो गए थे। उन्हें मिलने गया। एक पहाड़ के किनारे एक छोटे झोपडे में वे रहते थे। मैं उनसे मिलने गया। उनको कोई खब र नहीं किया और गया। मैंने खिड़की से देखा, वे अपने कमरे में नंगे होकर टहल र हे हैं। कपड़े उतार दिए हैं, मैंने जाकर दरवाजा खटखटाया। उन्होंने जल्दी से दरवाज [ खोला और चादर लपेटकर दरवाजा खोल दिया। मैंने उनसे पूछा, अभी आप नग्न थे, फिर यह चादर क्यों पहन ली? वे मुझसे बोले, मैं धीरे-धीरे, नग्न साधू होने का अभ्यास कर रहा हूं। अभी मुझे भय मालूम होता है, इसलिए अकेले में नग्न होने का अभ्यास करता हूं। फिर धीरे-धीरे मित्रों के सामने करूंगा, फिर गांव में, फिर धीरे-धीरे में अभ्यस्त हो जाऊंगा। मैंने उनसे कहा, किसी सर्कस में भर्ती हो जाए, क्यों कि नग्न होने का अभ्यास करके जो आदमी नंगा हो जाएगा, वह सर्कस के लायक है , संन्यास के लायक नहीं है। वह महावीर को अपना आदर्श बनाए हुए थे और उनका खयाल था कि महावीर नग्न होगे, इसलिए मैं भी नग्न हो जाऊं।

          मैंने उनको कहा; पता है, महावीर नग्न अभ्यास करके नहीं हुए थे। महावीर की नग्नता सहज थी। एक वक्त, एक प्रतीति, एक संभावना उनके भीतर उदित हई। उन्हीं वस्त्र अनावश्यक हो गए। उन्हें याद भी न रहा कि वस्त्र पहने। वे उस सरलता को, उस निषिता को उपलब्ध हुए, जहां ढांकने का उन्हें कोई खयाल ही न रहा। वस्त्र छूट गए। यह तो मेरी समझ में नहीं आता है कि एक आदमी नग्न होने का अभ्यास करके नग्न हो जाए, उसकी नग्नता बहुत दूसरी होगी। यह अभिनय और पाखंड होगा। किसी आदमी के भीतर प्रेम का स्फुरण हो और वह सारी दुनिया के प्रति प्रेम से भर जाए और अहिंसा से भर जाए तो समझ में आता है। लेकिन एक आदमी चेष्टा करे, प्रयास करे, अभ्यास करें अहिंसक होने का, यह समझ में नहीं आता।

          हमारी जितनी चेष्टाएं दूसरों को देखकर होगी, वे हमें गलत ले जाएंगी और हमारे जीवन को व्यर्थ कर देंगी। इसी वजह से सामान्य जन भी उतना असंतुष्ट और अशांत नहीं होता, जितना तथाकथित साधू और संन्यासी होते हैं। वे सारे पागलपन में लगे हए हैं। एक न्यूरो सस उनको पकड़े हुए है, किसी दूसरे आदमी जैसा होना है। यह पागलपन है, यह विछिप्तअता है। किसी दूसरे जैसे होने की कोशिश बिलकुल पागलपन है। क्योंकि यह सपरी चेष्टा का परिणाम होगा आत्म दमन, इसका अर्थ होगा रिप्रेशन, जो तुम हो उसे दबाओ और जो तुम नहीं हो, उसको होने की कोशिश करो। ऐसा व्यक्ति अपने हाथ से नर्क में पहुंच जाता है। चौबीस घंटे नर्क में जीने लगता है, जो वह है उसकी निंदा करता है, और जो उसे होना है, उसकी चेष्टा करता है।

-ओशो 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य जैसा नहीं हो सकता - ओशो

No-human-can-be-like-any-other-human-being--Osho
ओशो 

कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य जैसा नहीं हो सकता - ओशो 

          बुद्ध के जीवन में एक उल्लेख है। अपने पिछले जन्म में उन्होंने पिछले जन्मों की कथाएं कही हैं-जब वह बुद्ध हुए, उसके पहले जन्म में वे गांव में गए। वहां एक बुद्ध पुरुष था, उसका नाम था दीपंकर। वे गए और उन्होंने दीपंकर के पैर छुए। जब वे पैर छूकर उठे तो उन्होंने देखा कि दीपंकर उनके पैर छू रहा है। वे बहुत घबड़ा गए। और उन्होंने कहा कि यह क्या कर रहे हैं? मैं एक अज्ञानी हूं. मैं एक सामान्य जन हूं, मैं एक अंधकार से भरी हुई आत्मा हूं। मैंने आपके पैर छुए, एक प्रकाशित पूरुष के, यह तो ठीक था। आपने मेरे पैर क्या क्यों छए? दीपंकर ने कहा, तुमने अपने भीतर बैठी हुई प्रज्ञा का अपमान किया है, उसे बताने को। तुम मेरे पैर छू रहे हो यह सोचकर कि प्रकाश इनके पास है, और मैं तुम्हारे पैर छू रहा हूं, यह घोषणा करके को कि प्रकाश सबके पास है।

          वह प्रत्येक के भीत र जो बैठा हुआ है, उसे किसी के पीछे ले जाने की कोई भी जरूरत नहीं है। और जब हम उसे पीछे ले जाने लगते हैं तभी हम एक कांफिलक्ट में, एक अंत द्वंद्व में पड जाते हैं। असलियत यह है, इस जमीन पर, प्रकृति में, इस परमात्मा के राज्य में, दो कंकड़ भी एक जैसे नहीं होते हैं। दो पत्ते भी एक जैसे नहीं होते हैं। सारी जमीन को खोज आए दो पत्ते, दो कंकड़ एक जैसे नहीं मिलेंगे। दो मनुष्य भी एक जैसे कैसे हो सक ते हैं? प्रत्येक व्यक्ति अद्वितीय है और इसलिए जब कोई व्यक्ति राम का अनुसरण करके राम बनने की कोशिश करता है, बुद्ध का अनुसरण करके बुद्ध बनने की को शश करता है, तभी भूल हो जाती है।

          इस जगत में परमात्मा ने प्रत्येक को अद्विती य बनाया है। कोई किसी का अनुकरण करके कुछ भी नहीं बन सकेगा। एक थोथा पाखंड और एक अभिनय भर होकर रह जाएगा। क्या इस बात के संबंध में इतिहास प्रमाण नहीं है? बुद्ध को मरे पच्चीस सौ वर्ष हुए क्राइस्ट को मरे दो हजार वर्ष होते है। इन दो हजा र वर्ष में कितने लोगों ने बुद्ध के पीछे चलने की कोशिश की है और कितने लोगों ने क्राइस्ट के, क्या कोई दूसरा क्राइस्ट या दसरा बुद्ध पैदा होता है? क्या यह दो हजार वर्ष, ढाई हजार वर्ष का असफल प्रयास इस बात की सूचना नहीं है कि यह कोशिश ही गलत है? असल में कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य जैसा नहीं हो सकता। जब भी मनुष्य किसी दूसरे जैसा होने की कोशिश करता है तभी वह अंत द्वंद्व में, एक कांफिलक्ट में, एक परेशानी में पड़ जाती है। जो वह है उसे तो भूल जाता है और जो होना चाहता है, उसकी कोशिश पैदा कर लेता है। इस भांति उसके भीतर एक बेचैनी, एक अशांति और एक संघर्ष पैदा हो जाता है।

-ओशो