मंगलवार, 23 जून 2020

मिथक क्या है ?

मिथक क्या है ?

मिथक क्या है ?

           मिथक मानव जाति का सामूहिक स्वप्न एवम् सामूहिक अनुभव है | मिथक प्रागेतिहासिक घटना या आस्था है जब कि स्वप्न एक प्रतीकात्मक इच्छाभिव्यक्ति | प्रतीक दोनों में विद्यमान हैं, परन्तु अलग अलग ढंग से | मानव चेतना मिथकीय चेतना से ही विकसित हो कर यथार्थवादी (ऐतिहासिक ) चेतना में परिवर्तित होती है | ऐतिहासिक चेतना के साथ साथ मिथकीय चेतना भी जब विलुप्त हो जाती है तो वह संस्कार मात्र रह जाती है, जिसे जुंग ने सामूहिक अवचेतन कहा है | इस आधुनिक ऐतिहासिक चेतना में मिथक बार बार नया रूप लेता है | वह उसे आर्किटाइपल बिम्बों, चिरंतन प्रतीक, और व्याख्याओं के रूप में व्यक्त करता है |
       
            मिथक मानव का आदिम काव्य है | आदिम मनुष्य का मन मिथकवित्  (मिथोपोइक) था | उन मिथकों में  समयांतर से विलुप्तिकरण होने के बाद भी उसकी विचार वस्तु (थीम) का उत्तरजीवन बना रहता है | मिथकों में दो धरातल होने के कारण ऐसा होता है | पहला  प्रत्यक्षीकरण का और दूसरा अवधारणा का है | प्रत्यक्षीकरण धरातल पर अर्केटाइपल बिम्ब स्थित होते हैं जब कि अवधारणा के तल पर प्रतीक | जब भी सामाजिक जीवन में द्वन्द उत्पन्न होता है उस समय ही मिथक प्रतीकीकरण के द्वारा एक नए पक्ष को उद्घाटित कर देता है | इसीलिए यह कहना उचित होगा कि वे मानवचिति (ह्युमन साइकि) की यथार्थता में संस्कार रूप में सुरक्षित रहते हैं | उदहारण के लिए जलप्लावन मिथक को ले सकते हैं | यह घटना असीरियन-बेबिलोनियन स्त्रोतों से चल कर भारत में आई हैं | जल प्लावन की आदिम घटना मनु के मिथक से अनुस्यूत हो गयी हैं | यह हमें शतपथ ब्राह्मण जो कि ईसा पूर्व २००० से २५०० का है से पता चलता है और बाद के समय में विष्णु के तीन तीन अवतार --मत्स्य ,कच्छप और वराह भी इसी जलप्लावन मिथक से सम्बद्ध हो गये |
     
          मिथक का प्रधान चरित पावनता है | वह ऐतिहासिक न होते हुए भी पुनीत है उसकी यह पुनीत यथार्थता( सेक्रेड रियलिटी ) उसे तर्क पूर्व चिंतन ( प्री-लाजिकल थाट ) में बदल देती है | इसीलिए मिथक की अन्तःभूमि चिंतन न हो कर अनुभूति है | हम यदि मिथक की बौद्धिक व्याख्या इत्यादि करते हैं तो उसका प्रत्यक्षीकरण विलुप्त हो जाता है | उसके मेटामार्फोसिस अर्थात  रूपांतरण में उसका आधा जादू खो जाता है |
 मिथक का आधार आस्था में और उससे भी ज्यादा हठात विश्वास में रहता है | इसी धरातल पर मिथकीय कल्पना का हवामहल खड़ा रहता है | आस्था ही मिथक को यथार्थ और पुनीत बनाती है | इन्ही कारणों से धार्मिक चेतना मिथकों को  सत्य भी मानती है |

          मिथक ऐतिहासिक स्थिति का अतिक्रमण भी करती है | यह मनुष्य को ऐतिहासिक स्थिति का विस्मरण करा देती है | जैसे  महर्षि विस्वमित्र का सतयुग और त्रेता में भी उल्लिखित होना | इस विस्मरण से मिथकीय काल चिरंतन हो जाता है जहाँ न तो क्रम है, न परिवर्तन है और न ही गति | इस चिरंतन काल  में विकास और परिवर्तन का स्थान कथान्तरण ले लेता है | यह लक्षित करना कठिन है कि मिथक का अंत कब होता है और धर्म का प्रारम्भ कब होता है क्यों कि धर्म लगातार मिथकीय तत्वों से सम्बंधित और भरा हुआ है | जब हमें अपनी सही राह की खोज में मुश्किलें आ रही हों और समस्याएं अनिश्चित हों तब बहुत अधिक जादू और उसके साथ साथ मिथक शास्त्र भी विकसित होता है | शाक्त, शैव, नाथ और सिद्ध साधनाओ के सन्दर्भ में यही घटित हुआ | इसमें गूढ़ ज्ञान और रहस्यवाद भी विकसित हुआ | जहाँ जादू औसत अंध-विश्वासों की अभिव्यंजना का प्रतीक है वहीँ धर्म सर्वोच्च नैतिक आदर्शों का प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है | देखा जाय तो जादू के आदिम कला ,आदिम मिथक, आदिम विज्ञानं और आदिम धर्म सदैव बने रहे हैं क्यों कि मनुष्य के कौतूहल ने ही जादू को जन्म दिया है और मिथक का जादू ही यह है वह चिरंतन समय या कहें महाकाल में सदैव सिद्ध है और इसीलिए वह निरंतर भी है | इसी कारण से मनुष्य अपने ऐतिहासिक काल के अतिक्रमण कि आकांछा को तृप्त कर लेता है | मिथक सत्य और ऐतिहासिक सत्य में मौलिक रूप से  क्या अंतर है ? मिथक सत्य श्रद्धा पर आश्रित है जब कि ऐतिहासिक सत्य विज्ञान पर | मिथक सत्य कर्मकांड से ओतप्रोत है जब कि ऐतिहासिक सत्य तथ्यों पर आधारित है जो कि तथ्यों को संकलित करने के बाद उसकी व्याख्या करने के बाद मिलती है | हाँ यह कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक प्रतीकों को मिथकीय सत्य से जोड़ा अवश्य जाता है जिससे अर्केटाइपों का फिर से अन्वेषण हो जाता है  |
   अब हम कुछ मिथकीय रूपों की ओर बढ़ते हैं - जैसे नटराज, छिन्नमस्ता, काली इत्यादि |
 

   नटराज :--

 
   नटराज की मूर्ति या चित्र को देखें तो यह प्रतीत होता है कि शिव जो कि नृत्य के अधिष्ठाता हैं जो  इस विश्व नृत्य में संलग्न है  | इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने पैरों से एक बौने को दबा रखा है जो कि भ्रम का प्रतीक है | उन्होंने अपने दाहिने हाथ में डमरू ले रखा है जो सृजन का प्रतीक है वहीँ बाएं हाथ में लिया हुआ अग्नि मशाल विध्वंश का प्रतीक है | इसकी निचला दायाँ हाथ जो कि आगे कि ओर निकला हुआ है उसकी मुद्रा अभय का प्रतीक है वहीँ निचले बाएं हाथ की मुद्रा मुक्ति का प्रतीक है | इस मूर्ती के चारों ओर एक अग्नि का घेरा है जो पूरे विश्व को प्रदर्शित करता है |

छिन्नमस्ता :--


 छिन्नमस्ता देवी का रूप सृजन और विध्वंश दोनों आयामों को प्रदर्शित करता है | उनके दोनों ओर दो योगिनी हैं क्रमशः - डाकिनी और वारुणी | रतिक्रिया और कामक्रिया  विश्व में स्त्री और पुरुष सिद्धांत हैं जो मिलने पर इस संवृति जगत के पार ले जाती है और द्वैत के अनुभव को समाप्त करती है |

काली :--


काली  शक्ति का शून्य् स्वरूप हैं वे रति और काम रुपी आदिम इच्छा जो समस्त  सृष्टि के सृजन के मूल में  है उस के प्रतीक के ऊपर खड़ी हैं | उन्होंने जो मनुष्यों की खोपड़ियों की माला पहन रक्खी है वे बुद्धि और शक्ति का प्रतीक हैं | उनकी रक्त रुपी  जिव्हा रजो गुण की शक्ति को प्रदर्शित करती हैं जिसके कारण जगत की क्रिया को शक्ति मिलती है | उनके एक हाथ में खड्ग है और दूसरे में कटा हुआ मनुष्य का सिर जो  संबोधित करता है विलीन और शून्य हो जाना जो साधकों को निर्देशित करता है अपने अहंकार को समाप्त करें | उनके कमर में बंधी कटे हुए हाथों से बनी कमरधनी व्यक्ति के कर्म और उसका निरूपण को व्यक्त करती हैं |

बिपिन कुमार सिन्हा

सोमवार, 22 जून 2020

"ईश्वरीय कण" कितना ईश्वरीय


Divine-Particles-How-Divine
         

"ईश्वरीय कण" कितना ईश्वरीय

                 "ईश्वरीय" कण कितना ईश्वरीय .यह प्रश्न अब हरएक व्यक्ति के मस्तिष्क में उठ रहा है कि 'गॉड पार्टिकल " के नाम से प्रचलित मूलभूत कण  क्या वास्तव में यही ईश्वर है या कुछ और. वैज्ञानिकों ने इस मूलभूत कण का नाम हिग्सबोसान कण रखा जो कि ब्रिटिश नागरिक डा.हिग्स और भारतीय वैज्ञानिक डा. सत्येन बोस के नाम पर आधारित है. पिछली शताब्दी में मूलभूत कणों के विषय में बहुत खोजें हुई और उन्हें खोज भी लिया गया. मूल कण वे कण है जो अन्य किसी कण से नहीं बने हैं. इन कणों में उल्लेखनीय कण जैसे क्वार्क , लेपटोन (जैसे - न्यूट्रिनो , इलेक्ट्रान , म्यु आन आदि.) तथा कुछ बोसान कण हैं. इन कणों के द्वारा भौतिकी का स्टैंडर्ड माडल बनाया गया. इसके स्टैंडर्ड माडल के द्वारा ब्रह्माण्ड के कार्य-कलाप को समझाने में मदद मिली. यानि कि कैसे ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ ? पृथ्वी इत्यादि ग्रहों का निर्माण कैसे हुआ ? क्रमिक रूप से ये कैसे विकसित हुई ?
                      इस कण को जब खोजा गया तो यह कहा जाने लगा कि इस विराट वैज्ञानिक उपलब्धि के बाद मनुष्य ईश्वर के करीब पहुँच गया है. यह कण ब्रह्माण्ड की कहानी समझाएगा. इस कण को ईश्वरीय कण के नाम से भी विहित किया जाने लगा क्यों कि यह लाखों एटम बम कि ताकत वाला कण है यह सूक्ष्म कणों का देवता है. इस कण को जिसे वैज्ञानिक नाम हिग्स बोसन कण दिया गया है , एक मूल प्रारम्भिक कण कहा गया है वैज्ञानिकों और आम व्यक्ति के मन में यह प्रश्न सदियों से उठता रहा है कि यह ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया कैसे ? इसकी रचना कैसे हुई और इसके लिए कौन जिम्मेवार है ? इसका संचालन किस प्रकार से हो रहा है ? वैज्ञानिकों के अनुसार ब्रह्माण्ड के निर्माण में कणों कि अहम् भूमिका है.  बिग-बैंग सिद्धांत जिसे सबसे अधिक मान्यता मिली है यह बताता है की 14 खरब वर्ष पहले एक विस्फोट हुआ था उसके बाद  ब्रह्माण्ड का विस्तार होना आरंभ हुआ था और उर्जा कण चारों ओर फ़ैल रहे थे कालांतर में जब ये ठन्डे होने शुरू हुए तो ये उर्जा कण पदार्थ में परिवर्तित होने लगे . वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के दौरान यह पाया कि कुछ कण अधिक भार युक्त हैं और कुछ कम भारी हैं तथा कुछ में तो बिलकुल भी भार नहीं हैं . उनके अनुसार ऐसा कोई कण जरूर है जो इन कणों को भार प्रदान करता है. और इसीलिए सभी कणों में अंतर पाया जाता है. आगे अध्ययन से  यह ज्ञात हुआ कि क्वार्क और लेप्टान नमक मूलभूत कणों से पदार्थ कि रचना हुई है और जो कण इन्हें भार प्रदान करता है वह यही हिग्स बोसन कण है. जिसे गॉड पार्टिकल भी कहा गया.
                       वैज्ञानिकों कि धारणा है कि इसी कण के कारण आरम्भिक द्रव्य इस स्थिति को प्राप्त हो सके जिससे कि ब्रह्माण्ड की रचना हो सकी .वैज्ञानिक कहते हैं कि पदार्थ ऊर्जा का ही दूसरा रूप है ऊर्जा का कोई द्रव्यमान नहीं होता अर्थात भार नहीं होता जब कि पदार्थ द्रव्यमान युक्त होते हैं जिसके कारण यह ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया. उन्हें यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि इन पदार्थों को कौन द्रव्यमान प्रदान कर रहा है क्यों कि यदि द्रव्यमान न हो तो समस्त कण या पदार्थ प्रकाश के वेग से भटकते रहेंगे. इस सम्बन्ध में 1964 में पीटर हिग्स ने हिग्स कण कि परिकल्पना की , जिसमे यह कहा गया कि ब्रह्माण्ड में सब जगह , शून्य में भी हिग्स उर्जा क्षेत्र और हिग्स कण व्याप्त हैं (इस दृष्टि से यदि इसे ईश्वर कण या गॉड पार्टिकल का नाम दिया जाना अनुचित नहीं है.) समस्त दिक् (स्पेस) , शून्य में भी एक क्षेत्र (फील्ड) है जिसे हिग्स फील्ड कहते हैं जो उपयुक्त दशाओं में पदार्थों में द्रव्यमान देता है .
                      इस सृष्टि के लिए पदार्थों में द्रव्यमान का होना आवश्यक है. हिग्स के अनुसार इस फील्ड में जब भी कोई कण गतिमान होता है तो उस गति का विरोध इस फील्ड द्वारा  होता है कुछ इस प्रकार कि जैसे हवा में वस्तु के चलने पर विरोध होता है. हिग्स क्षेत्र का यह विरोध ही उस कण का द्रव्यमान है. जो हिग्स क्षेत्र में प्रतिक्रिया करने पर प्राप्त हुआ है. इसका मतलब यह हुआ कि यदि यह हिग्स क्षेत्र नहीं होता तो हम समझ ही नही पाते कि पदार्थों में द्रव्यमान कहाँ से आता है. हिग्स क्रियाविधि से पदार्थों में द्रव्यमान आता है जिससे उनमें गुरुत्व बल आता है इसे इस प्रकार से समझा जा सकता है कि मान लीजिये कि हिग्स क्षेत्र शहद से भरा है . अब जो भी कण इसके संपर्क में आयेगा तो उसकी क्षमता के अनुसार उस पर शहद चिपक जायेगा . और उसका द्रव्यमान बढ़ जायेगा . यह हिग्स बोसान  कण भौतिकी के अनेक प्रश्नों के सही उत्तर दे रहा है इसलिए भौतिकी के विकास के लिए इसका महत्वपूर्ण स्थान है . अब तक सभी मूल कण देखे और परखे जा चुके हैं , लेकिन हिग्स बोसान कण अभी तक ज्ञात नहीं हो सका था . 4 जुलाई 2012 ई. को जिस कण को देखने कि चर्चा हुई उसकी उर्जा 125.3 GeV थी जो प्रोटोन से 133 गुना अधिक थी.  ब्रह्मांड में व्याप्त हर वस्तु के आकार और द्रव्यमान का कारक ईश्वरीय कण यानी हिग्स बोसोन सब कुछ तबाह भी कर सकता है . यह चेतावनी दी है प्रख्यात भौतिकविद स्टीफन हाकिंग ने . ७२ वर्षीय हाकिंग का कहना है कि ब्रह्मांड को स्वरूप और आकार देने वाले इस ईश्वरीय कण के गुणधर्म बेहद चिंताजनक हैं . इसमें पूरे ब्रह्मांड को तबाह करने की ताकत है . हाकिंग की इस चेतावनी से विज्ञान जगत में खलबली मच गई है . इस कण से विज्ञान के किन-किन रहस्यों को समझा जा सकेगा यह अभी देखा जाना बाक़ी है.

 - ओशो बिपिन 

रविवार, 21 जून 2020

दुखी आदमी हिंसक होता है और हिंसक आदमी दुखी - ओशो

Unhappy-man-is-violent-and-violent-man-unhappy---Osho


दुखी आदमी हिंसक होता है और हिंसक आदमी दुखी -  ओशो 

          चंगेज दिल्ली आया उसने आते से, दस हजार बच्चों के सिर कटवा दिए और और उनको भालों पर लगवाकर जुलूस निकलवाया आगे। लोगों ने पूछा, यह तुम क्या करते हो? उसने कहा, ताकि दिल्ली में लोगों को याद रहे कि कोई आया था। वह खुश था दस हजार बच्चों के सिर कटवाकर। यह आदमी जरूर बहुत दुखी रहा होगा। इसके दुख का अंत न होगा। इसके भीतर नर्क ही रहा होगा, तभी तो इसे खुशी मिल सकी। जब हिंदुस्तान से वापस लौटा, एक गांव में  रुका। कुछ वेश्याएं, रात को उसके दरबार में नाचने आयी।  आधी रात में, दो बजे जब वेश्याएं लौटने लगी तो उन्होंने कहा, हमें डर लगता है, र स्तेि में अंधेरा है। चंगेज ने कहा अपने सैनिकों को, रास्ते में जितने गांव पड़ते हैं, सब में आग लगा दो ताकि इन वेश्याओं को याद रहे कि चंगेज के दरबार में नाचने गयी थीं तो आधी रात में भी उसने दिन करवा दिया।

      सारे गांव में आग लगा दी गई, कोई बीस गांव जला दिए गए। उसमें सोए लोग वहां जल गए। लेकिन वेश्याओं के रास्ते पर प्रकाश कर दिया। यह आदमी जरूर भीतर गहरे नर्क में रहा होगा। चंगेज सो नहीं सकता था। हिटलर भी नहीं सो सकता था, स्टेलिन भी नहीं सो सकता था। भीतर एक गहरी पीड़ा रह होगी, कितना गहरा दुख रहा होगा कि दूसरे के दुख का दुख तो अनुभव नहीं हुआ, बल्कि दूसरे को दुख देने में एक खुशी अनुभव हुई। हम सारे लोग दुखी हैं। अगर आप दुखी हैं, तो आप स्मरण रखिए, आपका हाथ युद्ध में है। अगर आप दुखी हैं

          तो आप युद्ध की आकांक्षा कर रहे हैं। अगर आप दुखी हैं तो आप दूसरे के लिए दुख पैदा कर रहे हैं। हम सार लोग मिलकर दुख पैदा कर रहे हैं-सामूहिक रूप से, 8 यक्तिगत रूप से, राष्ट्रों के रूप से। और जब सारी दुनिया बहुत दुख से भर जाती हैं , दस पंद्रह वर्ष में, दुख के सिवाय हमारे दुख के रिलीफ का, निकास का कोई रास ता नहीं रह जाता। युद्ध राजनैतिक घटना मात्र नहीं है, हमारे पूरे मानसिक नर्क का निकास है, रिलीफ है। जब भीतर बहुत पीड़ा इकट्ठी हो जाती है, एक दुख सारी दु निया में हम पैदा कर देते हैं, पागलपन पैदा कर देते हैं। दस पंद्रह वर्ष के लिए फि र एक हल्की शांति छा जाती है। दस पंद्रह वर्ष में हम फिर इकट्ठे कर लेते हैं।

          अगर कोई व्यक्ति इस बात के लिए उत्सुक है कि दुनिया में शांति हो और युद्ध न हो, हिंसा न हो तो सबसे पहले उसे इस बात पर विचार करना होगा कि उसके स्व यं के जीवन में दुख न हो। यह पहली बात है जो मैं आपसे निवेदन करना चाहता है। अगर आप प्रफुल्लित और आनंदित हैं. अगर आप अपने जीवन में चौबीस घंटे खुशी बिखेर रहे है, फूल बिखेर रहे हैं, खुशबू और सुगंध बिखेर रहे हैं तो आप युद्धके खिलाफ काम कर रहे हैं। आप एक ऐसी दुनिया के बनाने के काम में लगे हुए हैं, जहां युद्ध नहीं हो सकेंगे। अगर दुनिया में अधिक लोग खुश हो तो युद्ध असंभव हो जाएगा। युद्ध को रोकने के लिए और कोई रास्ता नहीं है, सिवाय इसके कि दुनि या में आनंद की गहरी पर्ते बिखेरी जाएं।

-ओशो 

शनिवार, 20 जून 2020

अगर एक बेहतर दुनिया बनानी है तो उसमें मुस्कुराहट बिखेरना जरूरी - ओशो

If-you-want-to-create-a-better-world-then-it-is-necessary-to-spread-a-smile-in-it--Osho


अगर एक बेहतर दुनिया बनानी है तो उसमें मुस्कुराहट बिखेरना जरूरी - ओशो 

          मैडम व्लावडस्की जिस गांव में गयी, जिस रास्ते में निकली, अपने साथ हमेशा एक  झोले में बहुत से फूलों के बीज लिए रहती थी। बस में बैठी हो, कार में बैठी हो, ट्रेन में बैठी हो, रास्तों के किनारे, खेत में फूल के बीज फेंकती जाती थी। लोगों ने पू छा, तुम पागल हो। उसने लाखों रुपयों के फूलों के बीज अनजान रास्तों पर फेंक दिए। लोगों ने कहा, तुम पागल हो इन बीजों को फेंकने से फायदा? उस महिला ने कहा, जरूर वर्षा आएगी जल्दी ही, यह बीज फूटेंगे, इनमें फूल लगेंगे और कोई उन फूलों को देखकर खुश होगा। लोगों ने कहा, लेकिन तुम दुबारा इस रास्तों से न नि कल सकोगी, और न उन लोगों को खुश देख सकोगी। उसने कहा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर एक बेहतर दुनिया बनानी है तो उसमें मुस्कुराहट बिखेरना जरूरी है, बहुत फूल फैला देने जरूरी हैं।

          तो मैं आपसे कहूंगा, अगर आप प्रसन्न हैं और आपके जीवन से कांटे नहीं, फूल गिरते हैं, अगर आपके व्यवहार से, आपके विचार से, आपके संबंधों में खुशी बिखरती है तो आप एक ऐसी दुनिया में निर्माण में भागीदार हो रहे हैं, जिसमें युद्ध नहीं हो सकेंगे। जिसमें हिंसा नहीं हो सकेगी। यह बात अजीब लगेगी कि मैं युद्ध के रोकने के लिए यह कहूं । लेकिन मैं जानता हूं, सिवाय इसके कोई उपाय नहीं है। दुखी लोग युद्ध से नहीं बच सकते। दुखी लोग हिंसा से नहीं बच सकते, क्योंकि दुखी लोग दूसरों को दुख देने से नहीं बच सकते हैं। यह तो पहली बात है। और यह प्रत्येक ८ यक्ति को स्मरण रखनी जरूरी है तो उसके जीवन से एक आनंद की फुआर, आनंद की गंध निरंतर उठती रहे। उसके सोते, उठते, बैठते उसके जीवन में एक आनंद प्रकट हो।

- ओशो 

शुक्रवार, 19 जून 2020

गुरुवार, 18 जून 2020

जो मनुष्य सृजन करता है, वही मनुष्य शांति को और आनंद को उपलब्ध होता है - ओशो

The-man-who-creates-that-man-gets-peace-and-happiness-Osho


जो मनुष्य सृजन करता है, वही मनुष्य शांति को और आनंद को उपलब्ध होता है - ओशो 

          मैं आपसे यह कहना चाहता हूं, जीवन में जो भी जोड़ता है, वह आनंद को उपलब्ध होता है। जो भी क्रिएट करता है, जो भी सृजन करता है, जो भी बनाता है, वह आनंद को उपलब्ध होता है। अगर आप दुखी हैं तो उसका अर्थ है, आपने केवल तोडना सीखा होगा, जोड़ना नहीं। अगर आप दुखी हैं तो आपने मिटाना सीखा होगा, बनाना नहीं। आपने जीवन में कुछ बनाया, कुछ सृजन किया, कुछ क्रिएट किया? आपके जीवन से कुछ निर्मित हुआ? कुछ सृजित हुआ, कुछ बना, कुछ पैदा हुआ? को ई एक गीत, जो आपके मरने के बाद भी गाया जा सके. कोई एक मूर्ती जो आप के बाद भी स्मृति बनी रहे, कोई एक पौधा, जो आपके न होने के बाद भी छाया दे ? आपने कुछ बनाया, कुछ निर्मित किया? जो आपसे बड़ा हो, जो आप मिट जाएं और रहे, जो आप न हों और फिर भी हो। जो मनुष्य सृजन करता है, वही मनुष्य शांति को और आनंद को उपलब्ध होता है। जिसके जीवन में जितनी सृजनात्मकता,

          जितनी क्रिएटिविटी होती है. उसके जीवन में उतनी ही शांति और उतना ही आनं द होता है। जो लोग केवल मिटाते और तोड़ते हैं, वे आनंदित नहीं हो सकते। क्यों सूजन करने से मनुष्य को आनंद उपलब्ध होता है? जो व्यक्ति जितने दर तक सृजन करता है, वह उतने दूर तक ईश्वर का भागीदार हो जाता है। ईश्वर है सृष्टा , और जब भी हम कुछ सृजन करते हैं, ईश्वर का एक अंश हमसे काम करने लग ता है और जो व्यक्ति सारे जीवन को सृजनात्मक बना देता है, सारे जीवन को एक सृजनात्मक सेवा में समर्पित कर देता है, उसके जीवन में संपूर्ण रूप से ईश्वर प्रकट होने लगता है। उसका जीवन आनंद से प्रेम से भर जाता है।

- ओशो 

बुधवार, 17 जून 2020

मंगलवार, 16 जून 2020

अभिभावक बच्चों को प्रेम तो दें, लेकिन अपने विश्वास न दें, अपनी श्रद्धाएं न दें, अपने विचार न दें - ओशो

Parents-should-give-love-to-children-but-do-not-give-their-beliefs-do-not-pay-their-respects-do-not-give-their-views-Osho

अभिभावक बच्चों को प्रेम तो दें, लेकिन अपने विश्वास न दें, अपनी श्रद्धाएं न दें, अपने विचार न दें -  ओशो 

          जो कमजोर है, वह सत्य को उपलब्ध नहीं हो सकता। विश्वास भय है। विश्वास आपके किसी न किसी रूप में भय पर, घबड़ाहट पर, डर पर खड़ा हुआ है। और जो डरा हुआ है, भयभीत है, वह सत्य को कैसे पा सकेगा।
सत्य को पाने की पहली शर्त तो अभय है। उसे पाने की पहली बुनियाद तो भय को छोड़ देना है। लेकिन हमारे धर्म, हमारे संप्रदाय, हमारे पुरोहित, हमारे पादरी, हमारे धर्म गुरु, हमारे संन्यासी भय सिखाते हैं। उनके भय सिखाने के पीछे जरूर कोई कारण है। छोटे-छोटे बच्चों के मनों में भी हम भय को भर देते हैं, और छोटे-छोटे बच्चों के मनों में भी हम श्रद्धा को पैदा करना चाहते हैं। इसके पहले कि वे विचार में सजग हो सकें, हम किसी तरह के विश्वास में उनको आबद्ध कर देना चाहते हैं

          दुनिया के सारे धर्म, बच्चों के साथ जो अनाचार करते हैं, उससे बड़ा कोई अनाचार  नहीं है। इसके पहले कि बच्चे की जिज्ञासा जाग सके, वह पूछे कि क्या है, हम उसके दिमाग में वे बातें भर देते हैं जिनका हमें भी कोई पता नहीं है। हम उसे हिंदु, मुसलमान, जैन या ईसाई बना देते हैं। हम उस उसे कुरान या बाइबिल या गीता रटा देते हैं। हम उसे कह देते हैं, ईश्वर है या ईश्वर नहीं है। फिर यह ही विश्वास जीवन भर कारागृह की तरह उसकी चेतना को बंद किए रहेंगे यह वह कभी साहस नहीं कर सकेगा कि सत्य को जान सके। बच्चों के साथ, अगर किन्हीं मां बापों को, किन्हीं गुरुओं को, किन्हीं अभिभावकों को प्रेम हो, तो उन्हें पहला काम करना चाहिए कि उन्हें अपना प्रेम तो दें, लेकिन अपने विश्वास न दें, अपनी श्रद्धाएं न दें, अपने विचार न दें। उन्हें उन्मुख रखें, उनकी जिज्ञासा को जगाए, लेकिन उनकी जिज्ञासा को समाप्त न करें। श्रद्धा जिज्ञासा को तोड़ देती है और नष्ट कर देती है। हम सारे लोग ऐसे ही लोग हैं, जिनकी जिज्ञासाएं बचपन में तोड़ दी गयी हैं, और जो किसी न किसी तरह की श्रद्धा, अपने किसी न किसी तरह के विश्वास, किसी न किसी तरह के बिलीफ को पकड़ के बैठ गए हैं। वह विश्वास ही हमें ऊपर नहीं उठने देता। वह विश्वास ही ह में विचार करने देता। वह विश्वास कहें गलत न हो, इसलिए हमें जिज्ञासा नहीं कर ने देता।

- ओशो 


सोमवार, 15 जून 2020

रविवार, 14 जून 2020

श्रद्धा वाले धार्मिकों ने सारी दुनिया को नष्ट किया है- ओशो

Religious-religions-have-destroyed-the-whole-world-Osho


श्रद्धा वाले धार्मिकों ने सारी दुनिया को नष्ट किया है-  ओशो 

          श्रद्धा वाले धार्मिकों ने सारी दुनिया को नष्ट किया है। उनका पूरा इतिहास खून खराबो, बेईमानी, अत्याचार, आक्रमण और हिंसा से भरा हुआ है। क्योंकि श्रद्धा हमेशा किसी न किसी के विरोध में खड़ा कर देती है। एक मुसलमान की श्रद्धा उसे हिंदू के विरोध में खडाकर देती है। एक हिंदू की श्रद्धा उसे ईसाई के विरोध में खड़ा कर देती है। एक जैन की श्रद्धा उसे बौद्ध के विरोध में खड़ा कर देती है।

          लेकिन खयाल करें, जिज्ञास किसी के विरोध में किसी को खड़ा नहीं करती। इसलिए श्रद्धा किसी भी हालत में धार्मिक आदमी का लक्षण नहीं हो सकता है। जिज्ञासा किसी के विरोध में किसी को खड़ा नहीं करती, यही वजह है कि साइंस, जो कि श्रद्धा पर नहीं खड़ी है, जिज्ञासा पर खड़ी है, एक है, पच्चीस तरह की साइंसेज नहीं है। हिंदुओं की अलग केमिसट्री, मुसलमानों की अलग केमिस्ट्री नहीं है। हिंदुओं का अलग गणित, जैनों का अलग गणित नहीं है। साइंस एक है, क्योंकि साइंस श्रद्धा पर नहीं, जिज्ञासा पर खड़ी है। धर्म भी दुनिया में एक होगा, अगर वह श्रद्धा पर नहीं, जिज्ञासा पर खड़ा हो। और जब तक धर्म अनेक हैं, तब तक धर्म के नाम पर झूठ बात चलती रहेगी। बीच में एक महिला की आवाज : क्रोध में:

          अलग-अलग धर्म होगे, तब तक इस तरह का गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन में गुस्सा नहीं करूंगा, क्योंकि मेरी कोई श्रद्धा नहीं है। जिसकी श्रद्धा होती है, वह गुस्से में जा सकता है। कमजोरी है श्रद्धा की, और दुनिया में जितने श्रद्धालु हैं, कुछ जल्दी गुस्से में आ जाते हैं, मेरी कोई श्रद्धा नहीं है, इसलिए मुझे गुस्से में लाना बहुत मुश्किल है। और दुनिया में मैं ऐसे लोग चाहता हूं, जो जल्दी गुस्से में न आए, ऐसे लोगों से धार्मिक दुनिया निर्मित होगी।

          अभी तक तो जो कुछ इतिहास में हुआ है , धर्म के नाम से जो कुछ हुआ है, वह अधर्म हुआ है। धर्म के नाम से जो भी प्रचारत किया गया, वह सब झूठ है। बिलकुल असत्य है। और उस असत्य को जबर्दस्ती लादने की हजार-हजार चेष्टाएं की गई है। लेकिन अगर कोई मनुष्य जिज्ञासा से प्रारंभ करे तो स्वाभाविक है कि वे सारे धार्मिक लोग, जिनका व्यवसाय, जिनका धंधा केवल श्रद्धा पर खड़ा है, परेशान और गुस्से से में आ जाएंगे। इसलिए दुनिया में जब भी कोई धार्मिक आदमी पैदा होता है तो पुरोहित और ब्राह्मण और पंडित हमेशा उसके विरोध में खड़े हो जाते है।

          क्राइस्ट को जिन्होंने सूली दी ये पुरोहित, पंडित और धार्मिक लोग थे। सुकरात को जिन्होंने दिया जहर वे धार्मिक, पुरोहित, विचार शील लोग पंडित थे। दुनिया में हमेशा पंडित धार्मिक आदमी के विरोध में रहा है। दुनिया में हमेशा पूरोहत धार्मिक आदमी के विरोध में रहा है। क्यों? क्योकि धार्मिक आदमी सबसे पहले इस बात पर चेष्टा करेगा कि धर्म के नाम पर बना हुआ जो भी प्रचारित संगठन है, धर्म के नाम से जो भी धार्मिक संप्रदाय है. धर्म के नाम पर जो भी झूठे विश्वास, अंध श्रद्धाएं फैलायी गयी हैं, वे नष्ट कर दी जाए। अगर क्राइस्ट फिर से पैदा हों तो सबसे पहले जो उनके विरोध में खड़े होगे, वह ईसाई पुरोहित और पावरी होंगे। अ गर कृष्ण फिर से पैदा हों तो सबसे पहले उनके विरोध में जो खड़ा होंगे वे, वे ही लोग होगे जो गीता का प्रचार करते हैं और गीता को प्रचारित हुआ देखना चाहते हैं। अगर बुद्ध वापस लौटे तो बौद्ध भिक्षु उनके विरोध में खड़े जो जाएंगे। यह बिल कुल स्वाभाविक है, क्योंकि धर्म एक तरह का विद्रोह है।

- ओशो 

शनिवार, 13 जून 2020

कोई मनुष्य किसी दूसरे जैसा बनने को पैदा भी नहीं हुआ - ओशो

No-man-was-even-born-to-be-like-anyone-else--Osho


कोई मनुष्य किसी दूसरे जैसा बनने को पैदा भी नहीं हुआ - ओशो 

पहला सींखचा है हमारे बंधन का, वह है श्रद्धा। 

         नहीं, श्रद्धा नहीं चाहिए। चाहिए, सम्यक संदेह, राइट डाउट। चाहिए स्वस्थ संदेह। इन मुल्कों में हम देखें, जहां श्रद्धा का प्रभाव रहा, वहां विज्ञान का जन्म नहीं हो सका। आगे भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि जहां श्रद्धा बलवती है, वहां खोज ही पैदा नहीं होती। जिन मुल्कों में विज्ञान का जन्म हुआ, वह तभी हो सका, जब श्रद्धा के सिंहासन पर संदेह विराजमान हो गया। आज भी जो कौमें विज्ञान की दृष्टि से पिछड़ी हैं, वे ही कौमें हज, तीर्थ वाली हैं.

          जिनका विश्वास पर आग्रह है। और न केवल विज्ञान के लिए यह बात सच है, धर्म के लिए भी उतनी ही सच है, क्योंकि धर्म तो परम विज्ञान है , वह तो सुप्रीम साइंस है। वैज्ञानिक तो फिर भी हाइपोथीसिस को मानकर चलता है, थोड़ा बहुत। एक अनुमान स्वीकार करता है, एक परिकल्पना स्वीकार करता है। लेकिन धर्म को खोजी परिकल्पना को भी स्वीकार नहीं करता। कुछ भी स्वीकार नहीं करता। निपट, सहज जिज्ञासा को लेकर गतिमान होता है। प्रश्न तो उसके पास होते हैं, उत्तर उसके पास नहीं होते। पूछता है जीवन से। खोजता है, बाहर और भीतर और बिना कुछ स्वीकार किये खोजता चला जाता है, खोजता चला जाता है, जब स्वीकार नहीं करता है तो उसकी खोज की मेधा तीव्रतर होती चलती जाती है, इनटेंस से इनटेंस होती चली जाती है। और एक दिन उसकी यह प्यास और खोज इतनी गहनतम, इतनी चरम तीव्रता को उपलब्ध हो जाती है कि उसी चरम तीव्रता में, उसी चरम तीव्रता के उ त्ताप में एक द्वार खुल जाता है और वह जानने में समर्थ होता है। जिज्ञासा चाहिए, विश्वास नहीं। और विश्वास हमारा पहला बंधन है, जो हमें चारों तरफ से बांधे हुए हैं।

          ठीक उस के साथ ही बंधा हुआ दूसरा बंधन है, जिसने हमारा कारागृह बनाया और वह है अनुगमन, फालोइंग, किसी दूसरे के पीछे चलना।  किसी को मान लेना विश्वास से किसी के पीछे चलना अंधानुकरण है। और इधर हजारों वर्षों से में यह सिखाया जाता रहा है कि दूसरों के पीछे चलो, दूसरे जैसे बनो-राम जैसे बनो, कृष्ण जैसे बनो, बुद्ध जैसे बनो। और अगर पुराने नाम फीके पड़ गए हैं तो हमेशा नए नाम मिल जाते हैं कि गांधी जैसे बनो, विवेकानंद जैसे बनो। लेकिन आज तक किसी ने नहीं कहा कि हम अपने जैसे बनें। किसी दूसरे जैसा कोई क्यों बने? और क्या यह संभव है कि कोई किसी दूसरे जैसा बन सके। क्या यह आज तक कभी संभव हुआ है कि दूसरा राम पैदा हो? कि दूसर  बुद्ध, कि दूसरा क्राइस्ट। क्या तीन चार हजार वर्ष की नासमझी भी हमें दिखाई नहीं पड़ती? क्राइस्ट को हुए दो हजार साल हो गए, और कितने पागलों ने यह कोशि श नहीं की कि वह क्राइस्ट जैसे बन जाएं। लेकिन क्या कोई दूसरा क्राइस्ट बन सका ? नहीं बन सका। क्या इससे कुछ बात स्पष्ट नहीं होती है? क्या यह स्पष्ट नहीं होता कि हर मनुष्य एक अद्वितीय, यूनीक व्यक्तित्व है? कोई मनुष्य किसी दूसरे जैसा  बनने को पैदा भी नहीं हुआ?

- ओशो 


शुक्रवार, 12 जून 2020

दूसरे के जैसे बनने की कोशिश आदमी को बहुत गहरे बंधन में ले जाती है - ओशो

Trying-to-be-like-another-takes-a-man-into-a-very-deep-bond-Osho


दूसरे के जैसे बनने की कोशिश आदमी को बहुत गहरे बंधन में ले जाती है - ओशो 

          अंधानुकरण, किसी दूसरे जैसे बनने की कोशिश में आदमी बहुत गहरे बंधन में पड़ता है। और बंधन में इसलिए पड़ता है कि दूसरे जैसा तो वह कभी बन ही नहीं सकता है, इसलिए कि असंभावना है, यह इंपोसबिलिटी है। लेकिन इस कोशिश में, अभिनय कर सकता है दूसरे जैसा। उसकी आत्मा अलग हो जाती है, अभिनय अलग हो जाता है। राम तो बन नहीं सकता है कोई, लेकिन रामलीला का राम बन सकता है। राम लीला का राम बिलकुल झूठा आदमी है। ऐसे आदमी की जमीन पर कोई भी जरूरत नहीं है। राम लीला का राम एक अभिनय है, एक एक्टिग है। ऊपर से हम कुछ ओढ़ ले सकते हैं, भीतर आत्मा होगी पृथक, यह ओढ़े हुए वस्त्र होंगे अलग। इन दोनों के बीच एक द्वंद होगा, एक काफिलक्ट होगी, एक सतत कलह होगी, और अभिनय कभी भी आनंद नहीं ला सकता। देखने वालों को लाता हो, यह दूसरी बात है, लेकिन जो अभिनय कर रहा है, वह निरंतर यह पीड़ा अनुभव करता है कि मैं किसी और जगह खड़ा हूं, मैं अपनी जगह नहीं हूं। मैं कोई और हूं, मैं वही नहीं हूं, जो हूं।

          वैसा आदमी कभी आत्म स्थित नहीं हो पाता, क्योंकि वह निरंतर दूसरे के अभिनय में व्यस्त होता है। यह भी हो सकता है कि कोई राम का अभिनय इतनी कुशलता से करे कि खुद राम भी मुसीबत में पड़ जाए, यह हो सकता है। क्योंकि अभिनेता को भूल चूक नहीं करनी पड़ती है, उसका सब पार्ट रटा हुआ तैयार होता है। खुद राम से भूल चूक हो सकती है, क्योंकि पाठ तैयार नहीं है, पहले सब सिखाया हुआ नहीं है। जिंदगी रो ज सामने आती है। असली आदमी भूल चूक कर सकता है, नकली आदमी कभी भूल चूक नहीं कर सकता इसलिए जो आदमी कभी भूल चूक न करता हो, समझ लेना, उस आदमी में कुछ नकली मौजूद है। वह किसी ढांचे में ढला हुआ आदमी है, उससे ज्यादा नहीं है।

-ओशो 


गुरुवार, 11 जून 2020

मंगलवार, 9 जून 2020

दो महायुद्ध हमारे भीतर की बहुत गहरी विक्षिप्तता और पागलपन को दर्शाते है - ओशो

Two-great-wars-reflect-the-deep-insanity-and-insanity-within-us-Osho

दो महायुद्ध हमारे भीतर की बहुत गहरी विक्षिप्तता और पागलपन को दर्शाते है - ओशो 

          मनुष्य जाति के अत्यंत प्राथमिक क्षणों की बात है। अदम और ईव को स्वर्ग के बगीचे से बाहर निकाला जा रहा था। दरवाजे से अपमानित होकर निकलते हुए अदम ने ईव से कहा, तुम बड़े संकट से गुजर रहे हैं। यह पहली बात थी, जो दो मनुष्यों के बीच संसार में हुई, लेकिन पहली बात यह थी कि हम बड़े संकट से गुजरे रहे हैं। और तब से अब तक कोई बीस लाख वर्ष हुए, मनुष्य जाति और बड़े और बड़े संकटों से गुजरती रही है। यह वचन सदा के लिए सत्य हो गया। ऐसा कोई समय न र हा, जब हम संकट में न रहे हों, और संकट रोज बढ़ते चले गए हैं।

          एक दिन अदम को स्वर्ग के राज्य से निकाला गया था, धीरे-धीरे हम कब नर्क के राज्य में प्रविष्ट हो गए, उसका भी पता लगाना कठिन है। आज तो यह कहा जा सकता है, इधर तीन हजार वर्षों का इतिहास ज्ञात है। तीन हजार वर्षों में साढ़े चार हजार युद्ध हुए हैं। यह घबड़ाने वाली और आश्चर्य कर देने वाली बात है। तीन हजार वर्षों में मनुष्य ने साढ़े चार हजार लड़ाइयां लड़ी हों तो यह तो जीवन शांति का जीवन नहीं कहा जा सकता। अब तक हमने कोई शांति काल नहीं जाना है। दो तरह के हिस्सों में हम मनुष्य के इतिहास को बांट सकते हैं -युद्ध का समय, और युद्ध के लिए तैयारी का समय। शांति का कोई समय, कोई खंड अभी तक ज्ञात नहीं है।

          निश्चित ही, कोई बहुत गहरी विक्षिप्तता, कोई बहुत गहरा पागलपन मनुष्य को पकड़े होगा। कोई रास्ता अब खोज लेना जरूरी है। पुरानी  लड़ाइयां बहुत छोटी लड़ाइयां थी और उनके बाद भी हम बचते चले आए हैं। लेकिन अब शायद जो युद्ध होगा, उसमें मनुष्य को बचने का भी। कोई उपाय न हो। अल्बर्ट आइंस्टीन से मरने के पहले किसी ने पूछा, तीसरा महायुद्ध में किन शस्त्रों का उपयोग होगा? आइंस्टीन ने कहा, तीसरे के प्रति कहना कठिन है, लेकिन चौथे के  संबंध में कहा जा सकता है। सुनने वाला, पूछने वाला हैरान हुआ। उसने पूछा चौथे में किन शस्त्रों का उपयोग होगा? अगर मनुष्य बचा रहा-क्योंकि बचने की कोई संभावना नहीं है, अगर बचा रहा, तो फिर से पत्थर के हथियारों से लड़ाई शुरू कर नी पड़ेगी।

          चूंकि तीसरा महायुद्ध, बहुत संभावना इस बात की है कि सारी मनुष्य जाति को ही नहीं, बल्कि समस्त जीवन मात्र को समाप्त कर दे। पिछले महायुद्ध में पांच करोड़ लोगों की हत्या हुई। पांच करोड़ लोग छोटी संख्या नहीं हीं है। दोनों पिछले युद्धों में मिलाकर दस करोड़ लोग मारे गए। शायद हमें खयाल भी नहीं है कि इन दस करोड़ लोगों की हत्या करने में हमारा भी हाथ है। हम जो यहां बैठे हैं, हम जिम्मेवार है। कोई भी मनुष्य इस जिम्मेवारी और उत्तरदायित्व से बच नहीं सकता। जो भी जमीन पर हो रहा है, उस सब में हमारे हाथ हैं। दो महा युद्ध हमारे भीतर से पैदा हुए और हमने इतनी बड़ी हत्या की । और अब तो हमार ी तैयारी बहुत बड़ी है।

-ओशो 

सोमवार, 8 जून 2020

राजनीतिज्ञों के हाथ में दुनिया का होना शुभ नहीं है - ओशो


The-world-is-not-auspicious-in-the-hands-of-politicians-Osho


राजनीतिज्ञों के हाथ में दुनिया का होना शुभ नहीं है - ओशो 

          क्या आपको पता है, टूमने की आज्ञा से हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम गि रा। दूसरे दिन सुबह पत्रकारों ने टूमेन से पूछा, आप रात को ठीक से सो सके? एक लाख आदमी मर गए थे, स्वाभाविक था कि टूमेन की नींद रात में खराब हुई होत ी, लेकिन टूमेन ने कहा, मैं बहुत आनंद से सोया। सच तो यह है, उसने कहा, इधर तीन चार वर्षों में इतनी शांति से मैं कभी नहीं सोया। एक लाख आदमियों को मार कर अगर हमारे राजनीतिज्ञ शांति से सो सकते हैं तो इन राजनीतिज्ञों के हाथ में दुनिया का होना शुभ नहीं कहा जा सकता। और राजनीतिज्ञ के हाथ में दुनिया हजारों वर्ष से है और राजनीति बिना युद्ध के न तो जी सकती है और न जी है। जिस दिन दुनिया से युद्ध समाप्त होंगे, उस दिन राजनीति का भाव भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि राजनीतिज्ञ युद्ध को जारी रखे, युद्ध क ो बनाए रखे, उसे जिंदा रखे।

         इस संबंध में विचार करना इसलिए बहुत-बहुत आवश्यक हो गया है, क्योंकि पिछले दिनों में राजनीतिज्ञ युद्ध से जो नुकसान पहुंचा सकते थे, इतने बड़े नहीं थे, लेकिन अब तो वे पूरी मनुष्य जाति को नष्ट कर सकते हैं। एक छोटी सी कहानी कहूं और फिर अपनी चर्चा को शुरू करूं। यह कहानी मैंने मुल्क के कोने-कोने में कही हैं। एक बिलकुल झूठी कहानी है।

          एक बहुत बड़े महल के बाहर बड़ी भीड़ थी। भीतर कुछ हो रहा था, उसे जानने क । सैकड़ों बड़ी भीड़ इकट्ठे थे। लेकिन वे साधारण जन नहीं थे। जो बाहर इकट्ठे थे, वे स्वर्ग के देवी और देवता थे और जो महल था वह खुद भगवान का महल था। भी तर वहां कोई बात चली थी, जिसको सुनने के लिए सारे लोग उत्सुक थे। उस बात
पर बहुत कुछ निर्भर था। मैंने कहा, कहानी बिलकुल झूठी है, फिर भी बहुत अर्थपूर्ण है। भीतर ईश्वर का दरबार लगा हुआ था। और तीन आदमी दरबार में खड़े थे। ईश्वर ने उन तीन आदमियों से पूछा, मैं बहुत हैरान हो गया हूं, मनुष्य को बनाक र मैं बहुत परेशान हो गया हूं। मैंने सोचा था, मनुष्य को बनाकर दुनिया में एक आ नंद, एक शांति, एक संगीत पूर्ण विश्व का जन्म होगा। जमीन एक स्वर्ग बनेगी। ले कन मनुष्य को बनाकर भूल हो गयी। जमीन एक स्वर्ग बनेगी। लेकिन मनुष्य को बन कर भूल हो गयी। जमीन रोज नर्क के करीब होती जा रही है और ऐसा वक्त आ सकता है, नर्क में जो लोग पाप करें, उन्हें हमें जमीन पर भेजना पड़े।

          इसलिए ईश्वर ने कहा, मैं बहुत परेशान हूं और तुम्हें इसलिए बुलाया है कि मैं तुमसे पूछ सकू क क्या कोई उपाय मैं कर सकता हूं जिससे कि दुनिया ठीक हो जाए? वे तीन लोग तीन बड़े देशों के प्रतिनिधि थे-अमरीका, रूस और ब्रिटेन के। अमरीका के प्रतिनिधि ने कहा, दुनिया अभी ठीक हो जाए। एक छोटी सी आकांक्षा हमारी पू री कर दें। ईश्वर ने उत्सुकता से कहा, कौन सी आकांक्षा? अमरीका के प्रतिनिधि ने कहा, हे परमात्मा, जमीन तो रहे, लेकिन जमीन पर रूस का कोई निशान न रह जाए। इतनी सी आकांक्षा पूरी हो जाए, फिर और कोई तकलीफ नहीं, फिर और कोई कष्ट नहीं, फिर सब ठीक हो जाएगा और जैसा चाहा है दुनिया वैसी हो सकेगी

          ईश्वर ने बहुत वरदान दिए थे। ऐसे वरदान देने का उसे कोई मौका नहीं आया था। उसने रूस की तरफ देखा, रूस के प्रतिनिधि ने कहा कि महानुभाव, एक तो हम मनते नहीं कि आप हैं। १९१७ के बाद हमने अपने मंदिरों और मस्जिदों और चर्चों से निकालकर आपको बाहर कर दिया है। लेकिन हम पुनः आपकी पूजा शुरू कर देंगे और फिर आपके मंदिरों में दिए जलाएंगे और फूल चढ़ाएंगे। एक छोटी सी आकां क्षा अगर पूरी हो जाए तो वही प्रमाण होगा ईश्वर के होने का। ईश्वर ने कहा, कौ न सी आकांक्षा? उसने कहा, हम चाहते हैं कि जमीन का नक्शा तो रहे, लेकिन अ मरीका के लिए कोई रंग न रह जाए। ईश्वर ने हैरानी में और घबड़ाकर ब्रिटेन की तरफ देखा। ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने कहा हे परम पिता, हमारी अपनी कोई आकांक्षा नहीं। इन दोनों की आकांक्षाएं एक साथ पूरी हो जाए तो हमारी आकांक्षा पूरी हो जाए।

- ओशो 

रविवार, 7 जून 2020

जब तक प्रतियोगिता है, महत्वाकांक्षा है, तब तक मनुष्य जाति युद्ध से मुक्त नहीं हो सकती - ओशो


Mankind-cannot-be-free-from-war-as-long-as-there-is-competition-ambition-Osho


जब तक प्रतियोगिता है, महत्वाकांक्षा है, तब तक मनुष्य जाति युद्ध से मुक्त नहीं हो सकती - ओशो 

          पहले महायुद्ध में हेनरी फोर्ड कुछ मित्रों का एक जत्था लेकर युद्ध की समाप्ति के लए युरोप की तरफ आया। अमरीका से उसने एक जहाज लिया। कुछ मित्र इक्ट्ठे ि कए जो शांति वादी थे और उस जहाज में उनको लेकर वह युरोप की तरफ गया, ताकि वहां शांति की बातें और खबर पहुंचायी जा सके शांति का मिशन लेकर वह आया। लेकिन हेनरी फोर्ड, जैसे ही जहाज शुरू हुआ, पछताने लगा मन में। उससे भू ल कर ली थी। जिन लोगों को लेकर वह जहाज में चला था शांति के लिए, वे अब आपस में लड़ने लगे।

          उसमें कई कई तरह के राजनीतिज्ञ थे। उसमें एक तरह का शांतिवादी था, उसमें दूसरे तरह के शांति वादी थे। उसमें प्रजातंत्रवादी थे, उसमें सा ग्यवादी थे। उसमें कैथोलिक थे, उसमें प्रोटेस्टेंट थे। उसमें इन आइडियोलाजी को मानने वाले थे, उस आइडियोलाजी को मानने वाले थे। वह जहाज जैसे ही बंदरगाह  से छूटा, वे आपस में लड़ने लगे।  हेनरी फोर्ड मन में पछताया और उसने सोचा, ज्ञ लोग को ले जाकर शांति की बात करनी असंभव है। जो आपस में लड़ते हो, वे शांति के लिए क्या कर सकेंगे।

          हम सारे लोग, जो मनुष्य के भविष्य के लिए विचार करते हो और जिनके मन में यह खयाल आता हो कि जीवन को बचाना और सुरक्षित करना आवश्यक है, उन्हें कुछ बातों पर विचार करना होगा। सबसे पहली बात तो यह विचार करनी होगी। क हम जो व्यक्ति गत रूप से छोटी छोटी बातों में लड़ते हैं और संघर्ष करते हैं। क ही वही संघर्ष, कहीं वही लड़ाई अंततः बड़े पैमाने पर राष्ट्रों का युद्ध तो नहीं बन जाती है? हम जो व्यक्तिगत रूप से करते हैं, छोटे-छोटे रूपों में वही इकट्ठे होकर बडे पैमाने पर युद्ध बन जाता है। कोई राजनीतिक, कोई समाज सुधार मूलतः अंतर नहीं ला सकेगा, अगर व्यक्तियों के चित्त इस बात को समझने में समर्थ न हो जाए कि उनके भीतर जब तक द्वंद्व है, जब तक संघर्ष है, जब तक प्रतियोगिता है, एम्बी शन है, महत्वाकांक्षा है, तब तक मनुष्य जाति युद्ध से मुक्त नहीं हो सकती।

- ओशो 

शनिवार, 6 जून 2020

दुखी आदमी के जीवन में एक ही सुख है कि वह किसी को दुख दे पाए - ओशो

There-is-only-one-happiness-in-an-unhappy-man's-life-that-he-can-hurt-someone-Osho

 दुखी आदमी के जीवन में एक ही सुख है कि वह किसी को दुख दे पाए - ओशो 

          क्या आपको यह पता है, जब पहला महायुद्ध हुआ, तो मनोवैज्ञानिक बहुत परेशान हुए। पहला महायुद्ध जितने दिनों तक चला उतने दिन तक यूरोप में चोरियां कम ह ो गयी, हत्याएं कम हो गयी, आत्महत्याएं कम हो गयी, लोग कम पागल हुए। हैरा नी की बात है। मनोवैज्ञानिक समझ नहीं पाए कि इसका क्या कारण है? फिर महा युद्ध हुआ। तब तो और बड़े पैमाने पर यह हुआ। हत्याओं की संख्या एकदम कम ह ो गयी आत्महत्याओं की संख्या कम हो गयी। लोगों ने युद्ध के समय में पागल होना बंद कर दिया। कम। लोग पागल हुए। और क्यों? लोग इतने उत्साहित हो गए, लग इतने आनंदित हो गए कि उन्हें हत्या करने की जरूरत नहीं पड़ी, आत्महत्या क रने की जरूरत नहीं पड़ी। ऊब और बोर्डम कम हो गयी। उदासी कम हो गयी, लोग प्रफुल्लित थे।

          युद्ध ऐसी क्या प्रफुल्लता लाता है? अगर युद्ध इतनी प्रफुल्लता लाता है तो उसका अर्थ है, हमारे भीतर, हमारे मन में युद्ध की कहीं चाह होगी। हम कहीं चाहते होंगे | हमारे भीतर कहीं कोई आकांक्षा होगी, जिससे युद्ध पैदा होता है और अगर सतत युद्ध चलता रहे तो हम बहुत प्रसन्न हो जाएंगे। यह बात अपने खयाल से अप नि काल दें कि यूद्ध से आप उदास हो जाते हैं। आप खुद विचार करें-अभी हिंदस्तान में चीन और पाकिस्तान की लड़ाइयां चलीं, तो आप खयाल करें, आप ज्यादा प्रसन्न थे। आप ज्यादा प्रफुल्लित थे, आप ज्यादा ताजगी से भरे थे। आप खबरों के लिए बड़े आतुर थे। आपकी जिंदगी में एक रस मालूम हो रहा था। क्यों? कुछ कारण है।

          जो मनुष्य सामान्य जीवन से ऊबा हुआ है, वह मनुष्य युद्ध को चाहेगा, हिंसा को च हेगा। बोर्डम जो हमारे जीवन की है, रोज सुबह से सांझ तक हमारे जीवन में न त । कोई रस है, न तो कोई आनंद है, न कोई प्रसन्नता है। जब तक कोई संशेसनल,ज ब तक कि कोई बहुत तीव्र संवेदना करनेवाली बात न घट जाए, हमारे जीवन में क ई प्रफुल्लता, कोई जिंदगी नहीं आती। बर्नार्ड शा से किसी ने पूछा कि किस बात क ो आप समाचार कहते हैं, न्यूज किसे कहते हैं? बर्नार्ड शा ने कहा, अगर एक कुत्ता आदमी को काट खाए तो इसे में न्यूज नहीं कहता। लेकिन एक आदमी कुत्ते को क ट खाए तो इसे मैं न्यूज कहता हूं। इसे मैं समाचार कहता हूं, एक आदमी अगर कु ते को काट खाए।

          यह हमारी जिंदगी की जो ढीली-ढाली रफ्तार है. वह उसको चौंका देती है बात। हम चौंकाने के लिए उत्सुक है. हम चौंकाए जाएं। इसलिए डिटेक्टिव फिल्में हम देखते हैं, जासूसी उपन्यास और कथाएं पढ़ते हैं जिनमें हत्याओं का जोर हो। जिंदगी में भी युद्ध और लड़ाइयां चाहते हैं, संघर्ष और कलह चाहते हैं, ताकि हमारे भीतर व ह जो उदासी, ऊब जिंदगी में छा गयी है, वह टूट जाए। केवल वही मनुष्य का समा ज युद्ध से बच सकता है, जो मनुष्य का समाज अत्यधिक आनंदित और प्रफुल्लित हो। स्मरण रखें, अगर हम उदास हैं, दुखी हैं, रसहीन हमारा जीवन है तो हम भीत र अनजाने भी, अचेतन, अनकांसेस भी युद्ध के लिए तीव्र युद्ध के लिए प्यासे रहेंगे। हमारे भीतर कोई आग्रह कोई आकांक्षा बनी रहेगी कि जीवन को चौंका देने वाली कोई बातें हो जाए।

          युद्ध सबसे ज्यादा जीवन को चौंका देता है। इसलिए जीवन में एक लहर आ जाती है, एक गति आ जाती है। इसलिए सारी मनुष्य जाति बहुत गहरे में युद्ध से प्रेम करती है। युद्ध की आकांक्षा करती है। अभी हिंदुस्तान में जब चीन और पाकिस्तान से उपद्रव चला तो आपने देखा, हिंदुस्ता न भर में कविताएं लिखी जाने लगीं, की आंखों में रौनक और चेतना आ गयी। केसा पागलपन है। कैसे पागलपन है! हम कितने उत्साहित हो गए।

          हमारा नेता कितने जोर से बोलने लगा और हमारी तालियां कितनी जोर से पिटने लगी और हमारे प्राणों में जैसे गति और एक कंपन आ गया। ऐसा लगा जैसे सब मु र्दे जाग गए हो। यह सारी की सारी स्थिति यह बताती हैं कि सामान्य जीवन हमारा बहूत दूखी और बहूत पीड़ित है। और यह भी स्मरण रखें, अगर सामान्य रूपेण हम दुखी हैं तो जो आदमी दुखी होता है, वह आदमी दूसरे को दुख देने में आनंद अनूभव करता है। इ से मैं फिर से दोहराता हूं, जो आदमी दुखी होता है वह दूसरे को दुख दो में आनंद अनूभव करता है। जो आदमी आनंदित होता है वह दसरे को आनंद देने में आनंद अनुभव करता है। जो हमारे पास होता है, उस पे निर्भर होता है, हम दूसरे के साथ क्या करेंगे। चूंकि हम सारे लोग दुखी हैं, इसलिए हमारे जीवन में एक ही सुख है। कि  हम किसी को दुख दे पाए। इसलिए जब भी हम किसी को दुख देते हैं, सताते हैं, परेशान करते हैं तो हम सुख मिलता है।

- ओशो 

गुरुवार, 4 जून 2020

आदमी दूसरे आदमी को सुखी देखने के लिए उत्सुक नहीं है - ओशो

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आदमी दूसरे आदमी को सुखी देखने के लिए उत्सुक नहीं है - ओशो 

एक मुसलमान फकीर था, बायजीद। वह बहुत परेशान था इस बात से कि ईश्वर ने नर्क बनाया ही क्यों? उसे यह परेशानी थी कि ईश्वर जो इतना दयालु है, उसने भी नर्क क्यों बनाया उसने एक रात ईश्वर से प्रार्थना की कि मैं तो समझने में असमर्थ हूं, अगर तू ही मुझे बता सके कि तूने नर्क क्यों बनाया, इतना बुरा नर्क क्यों बनाया।

वह रात सोया, उसे एक सपना आया। निरंतर सोचने के कारण ही वह सप ना उसे आया होगा। उसने सपना देखा, वह स्वर्ग में गया है। वहां चारों तरफ संगी त ही संगीत है और आनंद ही आनंद है। वहां दरख्तों के ऊपर सुंदर फूल हैं, वहां चारों तरफ सुगंध है। लोग बड़े स्वस्थ है। वह जब पहुंचा तो स्वर्ग के लोग भोजन कर रहे थे, घरों-घरों में भोजन चल रहा थ T। उसने कई घरों में झांककर देखा, एक बात से वह बहुत परेशान हुआ। लोगों के हाथ बहुत लंबे हैं, लोगों के शरीर तो बहुत छोटे हैं, लेकिन हाथ बहत लब हैं. इस लए भोजन करने में उन्हें बड़ी तकलीफ होती है। उठाते हैं तो उनको मुंह तक ले जाने में बड़ी अड़चन है, मुंह तक खाना जा नहीं पाता। लेकिन फिर लोग स्वस्थ हैं तो वह हैरान हुआ। उसने जाकर देखा, उसने देखा, घर-घर में लोग एक दूसरे को खाना खिला रहे हैं। खुद तो खा नहीं सकते, उनके हाथ बहुत लंबे हैं, ते एक आद मी दूसरे आदमी को खाना खिला रहा है।

फिर वहां से वह नर्क गया। नर्क में देखा उसने, वहां भी हाथ उतने ही लंबे है, दरख त उतने ही सुंदर हैं और फूल खिले हुए हैं। वहां भी सूगंध है, वहां भी सब ठीक है , लेकिन लोग बिलकुल दुर्बल और परेशान और पीड़ित हैं। वह हैरान हुआ। उसने दे खा, वहां हर आदमी अपना खाना खाने की कोशिश कर रहा है और बगल वाला न खा पाए, इसकी कोशिश भी कर रहा है। खुद के हाथ लंबे हैं, इसलिए खुद के मुंह तक नहीं पहुंचते इसलिए कोई आदमी खाना नहीं खा पा रहा है और किसी तरह थोड़ा बहुत खाना पहुंच भी जाए तो दूसरे लोग उसे धक्का दे रहे हैं । उसकी वजह से उसके पास खाना नहीं पहुंच पा रहा है। उसने देखा, स्वर्ग और नर्क ते बिलकुल एक जैसे हैं, लोग थोड़े अलग-अलग हैं। नर्क में कोई आदमी दूसरे आदमी को सुखी देखने के लिए उत्सुक नहीं है। हर आदमी दूसरे आदमी को दुख देना चाह रहा है। हम सारे लोग भी एक दूसरे को दुख देना चाह रहे हैं।

- ओशो 

मंगलवार, 2 जून 2020

जो आंखे इस विराट में उसे नहीं देख पातीं वो ईंटों की दीवालों में उसे कहाँ देख पाएंगी- ओशो

Those-eyes-that-cannot-see-him-in-this-vast-where-can-they-see-him-in-the-walls-of-bricks-OSHO


जो आंखे इस विराट में उसे नहीं देख पातीं वो ईंटों की दीवालों में उसे कहाँ देख पाएंगी- ओशो 

          यह मंदिर और मस्जिद कोई परमात्मा के मंदिर नहीं हैं, परमात्मा का मंदिर तो तब सब जगह मौजूद है, क्योंकि जहां परमात्मा मौजूद है, वहां उसका मंदिर __ भी मौजूद है। आकाश के तारों में और जमीन के आसपास में और वृक्षों में, और मनुष्य की और पशुओं की आंखों में और सब तरफ और सब जगह कौन मौजूद है? किसका मंदिर मौजूद है? इतने बड़े मंदिर को, इतने विराट मंदिर को जो नहीं दे ख पाते, वे छोटे-छोटे मंदिर में उसे देख पाएंगे? खुद उसके ही बनाए हुए भवन में जो उसे नहीं खोज पाते, वे क्या आदमी के द्वार बनायी गयी ईंट चूने के मकानों में उसे खोज पाएंगे? जिनकी आंखें इतने बड़े को भी नहीं देख पातीं, जो इतने ओबिय स है, जो इतना प्रकट है और चारों तरफ मौजूद है, चेतना के इस सागर को भी जनका जीवन स्पर्श नहीं कर पाता, वह आदमी के बनाए हुए ईंटों की दीवालों, कार गृहों में, बंद मूर्तियों में उसे खोज पाएगा? नासमझी है, निपट नासमझी है। जो इत ने विराट मंदिर में नहीं देख पाता, वह उसे और कहीं भी देखने में समर्थ नहीं हो सकता।

- ओशो 


विचार आधारभू है, वहां क्रांति का बीज है, जो विचार करेगा, वह आज नहीं कल, क्रांति से गुजरेगा - ओशो


The-idea-is-the-foundation-there-is-the-seed-of-revolution-the-one-who-will-think-he-will-not-go-through-tomorrow-the-revolution-Osho


विचार आधारभू है, वहां क्रांति का बीज है, जो विचार करेगा, वह आज नहीं कल, क्रांति से गुजरेगा - ओशो 

           आप चाहे हिंदू हों, चाहे मुसलमान, चाहे ईसाई। अगर आप विश्वास करते हैं, इ समें कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आपने आंख पर किस रंग की पद्रियां बांध रखी हैं। वे 'हरी हैं कि लाल कि सफेद, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। आंख पर पट्टियां हैं, ब स इतना काफी है। आपके जीवन में विचार का जन्म नहीं हो सकेगा। और हम  चाहते हैं समाज के न्यस्त स्वार्थ कि मनुष्य में विचार पैदा हो। क्योकि विचार आधारभू है, वहां क्रांति का बीज है, जो विचार करेगा, वह आज नहीं कल, खुद तो क्रांति से गु जरेगा ही, उसके आसपास भी वह क्रांति की हवाएं फेकेगा।क्योकि विचार झुकने को राजी नहीं होता, विचार अंधा होने को राजी नहीं होता, विचार आंख बंद कर लेने को राजी नहीं होता।

           मैंने सुना है, एक गांव में एक विचारक तेली के घर तेल खरीदने गया। देखकर, उ से वहां बड़ी हैरानी हुई। तीली तो तेल तौलने लगा। उसके ही पीछे कोल्ह का बैल कोल्ह को चलाए जाता था, बिना किसी चलाने वाले के। कोई चलाने वाला न था। उस विचारक ने उस तेली से पूछा, मेरे मित्र, बड़ा अदभूत है यह बैल। बड़ा धार्मिक बड़ा विश्वासी मालम होता है। कोई चलाने वाला नहीं है और चल रहा है? उस तेली ने कहा, थोड़ा गौर से देखो, देखते नहीं, आंखें मैंने उसकी बांध रखी हैं। आंखें बंधी हैं, उसे दिखाई नहीं पड़ता कि कोई चला रहा है कि नहीं चला रहा है। चल ता जाता है। इस खयाल में है कि कोई चला रहा है। उस विचार ने कहा, लेकिन यह रुककर जांच भी तो कर सकता है कि कोई चलाता है या नहीं उस तेली ने क हा, फिर भी तुम ठीक नहीं देखते। मैंने उसके गले में घंटी बांध रखी है। जब तक चलता है, घंटी बजती रहती है। जब रुक जाता है, घंटी बंद हो जाती है, मैं फौरन
उसे जाकर फिर से हांक देता हूं, ताकि उसे यह भ्रम बना रहता है कि कोई पीछे मौजूद है।

            उस विचारक ने कहा, और यह भी तो हो सकता है कि वह खड़ा हो जाए और सि र हिलाता रहे ताकि घंटी बजे। उस तेली ने कहा, महाराज, मैं आपके हाथ जोड़ता हं. आप जल्दी यहां से चले जाएं, कहीं मेरा बैल आपकी बात न सुन ले। आपकी बातें खतरनाक हो सकती है। बैल विद्रोही हो सकता है। आप कृपा करें, यहां से जा एं और आगे से कोई और दुकान से तेल खरीद लिया करें। यहां आने की जरूरत न हीं है। मेरी दूकान भली भांति चलती है, मुफ्त मुसीबत खड़ी हो सकती है।

            आदमी के शोषण पर भी धर्म के नाम पर बहुत दुकानें हैं। जिन्हें हम परमात्मा के मंदिर कहते हैं, जरा भी वे परमात्मा के मंदिर नहीं हैं, दुकानें हैं. पुरोहित की ईजा द है। परमात्मा का भी कोई मंदिर हो सकता है, जो आदमी बनाए? परमात्मा के f लए भी मंदिर की व्यवस्था आदमी को करनी पड़ेगी क्या? कैसी छोटी, छोटी अजीब बात है बनाएंगे उसके लिए मंदिर? उसके निवास की व्यवस्था हम करेंगे? और ह मारे छोटे-छोटे मकानों में वह विराट समझ सकेगा? प्रवेश पा सकेगा? नहीं, यह तो संभव नहीं है। और इसीलिए जमीन पर कितने मंदिर हैं, कितने चर्च, कितनी मस्जिद, कितने गिरजे, कितने शिवालय, कितने गुरुद्वारे लेकिन धर्म कां है, परमात्मा कहां है? इस ज्यादा धार्मिक और कोई स्थिति हो सकती है, जो हमारी है? और यह मंदिर ही और मस्जिद ही और मस्जिद ही रोज अधर्म के अड्डे बन जाते हैं हत्या के, आगजनी के, बलात्कार के। इनके भीतर से ही आवाजें उठती हैं, जो मनुष्य-मनुष्य को ट्रकड़ों-ट्रकड़ों में तोड़ देती हैं। इनके भीतर से ही वे नारे आ ते हैं, जो आदमी के जीवन में हजार-हजार तरह के विद्वेष, घृणा फैला जाते हैं। हिं सा पैदा कर जाते हैं।

            अगर किसी दिन, किसी आदमी ने यह मेहनत उठानी पसंद की और यह हिसाब ल गाया कि मंदिर और मस्जिदों के नाम पर कितना खून बहा है, तो आप हैरान हो जाएंगे, और किसी बात पर इतना खून कभी भी नहीं बहा है। और आप हैरान हो जाएंगे कि आदमी के जीवन में जितना दुख, जितनी पीड़ा इनके कारण पैदा हुई है और किसी के कारण पैदा नहीं हुई है। और आदमी-आदमी के बीच जो प्रेम हो सक ता था, वह असंभव हो गया है, क्योंकि आदमी-आदमी के बीच चर्च और मंदिर बड । मजबूत दीवाल की तरह आ जाते हैं। और क्या कभी हम सोचते है, कि जो दीवालें आदमी को आदमी से अलग कर देती हों, वे दीवाले आदमी को परमात्मा से मि लाने का सेतु बन सकते हैं, मार्ग बन सकती हैं? जो आदमी को ही आदमी से नहीं मिला पातीं, वह आदमी को परमात्मा से कैसे मिला पाएंगे?

- ओशो

आकांक्षा विराट के मिलन की, और पकड़े हुए हैं क्षुद्र सींखचों को - ओशो

Aspiration-of-Virat-meets-and-is-holding-loud-petals-Osho

आकांक्षा विराट के मिलन की, और पकड़े हुए हैं क्षुद्र सींखचों को जोर से- ओशो 

          मैंने सुना है, एक पहाड़ी सराय पर एक युवक एक रात मेहमान हुआ। जब वह पहा. डी में प्रवेश करता था तो घाटियां उसने किसी बड़ी अदभुत और मार्मिक अवाज से गूंजती हुई सुनी। घाटियां में कोई बड़े मार्मिक, बड़े आंसू भरे, बहूत प्राणों की पूर । ताकत से रोता और चिल्लाता था। यह आवाज गूंज रही थी घाटियों में स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। वह हैरान हुआ कि कौन स्वतंत्रता का प्रेमी इन घाटियों में इतने जोर से आवाज करता होगा। लेकिन जब वह सराय के निकट पहुंचा तो आवाज और निकट सूनाई पड़ने लगी, शायद सराय से ही आवाज उठती थी। शायद कोई वहां बंदी था।

          उसने अपने घोड़े की रफ्तार आर तेज कर ली। वह सराय पर पहुंचा तो हैरान हो गया।यह किसी मनुष्य की आवाज न थी। सराय के द्वार पर पिंजड़े में एक तोत । बंद था और जोर से स्वतंत्रता-स्वतंत्रता चिल्ला रहा था। उस युवक को बड़ी दया आयी उस तोते पर। वह युवक भी अपने देश की आजादी की लड़ाइयों में बंद रहा था, कारागृहों में और वहां उसने अनुभव किया था, परतंत्रता का दुख। वहां उसने आकांक्षा अनुभव की थी, मुक्त आकाश की। वहां उसकी आकांक्षा ने, वहां उसके स वप्नों ने स्वतंत्रता के जाल गूंथे थे। आज उसे तोते की आवाज में अपनी उस सारी पीड़ा से कराहती हुई आत्मा का अनुभव हुआ, और सराय का मालिक अभी जागता
था। सोचा उसने रात में इस तोते को स्वतंत्र कर दूं।

          राज जब सराय का मालिक सो गया, वह युवक उठा। उसने जाकर पिंजड़े का द्वार खोला। सोचा था स्वतंत्रता का प्रेमी तोता उड़ जाएगा, लेकिन द्वार खोलते ही तोते ने सींखचे पकड़ लिए पैरों से और जोर से चिल्लाने लगा-स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतं त्रता। वह युवक हैरान हुआ। द्वार खुले थे, उड़ जाना चाहिए था, न उड़ जाने की कोई बात न थी। लेकिन शायद उसने सोचा, मुझसे भयभीत हो, इसलिए उसने हाथ भीतर डाला लेकिन तोते ने उसके हाथ पर चोट की। पिंजड़े के सीखचों को और जोर से पकड़ लिया। युवक ने यह सोचकर कि कहीं उसका मालिक न जाग जाए, चोट भी सही और किसी तरह बमुश्किल उस तोते को निकाल कर आकाश में उड़ा दिया।

           वह युवक बड़ी शांति से सो गया, एक आत्मा को स्वतंत्र करने का आनंद उसे अनु भव हुआ था। लेकिन सुबह, जब उसकी नींद खुली तो उसने देखा, तोता वापस आ ने पिंजड़े में आकर बैठ गया है। द्वार खुला पड़ा था, और तोता चिल्ला रहा है स्वतं त्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता। वह बहुत हैरान हुआ, वह बहूत ही मुश्किल में पड़ गया। यह आवाज कैसी, यह प्यास कैसी, यह आकांक्षा कैसी! यह तोता पागल तो नहीं है। वह तोते के पिंजड़े के पास खड़े होकर यही सोचता था कि सराय का मालिक व हां से निकला, और उसने कहा, बड़ा अजीब है तुम्हारा तोता। मैंने इसे मुक्त कर ि दया था, लेकिन यह तो वापस लौट आया। उस सराय के मालिक ने कहा, तुम पहले आदमी नहीं हो, जिसने इसे मुक्त किया हो। जो भी यात्री यहां ठहरता है, उसक आवाज के धोखे में आ जाता है। रात इसे मुक्त करने की कोशिश करता है। सूबह खुद ही हैरानी में पड़ जाता है, तोता वापस लौट आता है।

          उसने कहा, बड़ी अज ब तोता है तुम्हारा। उस बूढ़े मालिक ने कहा, तोता ही नहीं, हर आदमी इसी तर ह अजीब है। जीवन भर चिल्लाता है, मुक्ति चाहिए. स्वतंत्रता चाहिए और उन्हीं स 'खिचों को पकड़े बैठा रहता है, जो उसके बंधन हैं और उसके कारागृह हैं। मैंने जब यह बात सुनी तो मैं भी बहुत हैरान हुआ। फिर मैंने आदमी को बहुत गौर से देखने की कोशिश की, तो मैंने पाया कि जरूर यह बात सच है। आदमी का पिं जड़ा दिखायी नहीं पड़ता, यह दूसरी बात है, लेकिन हर आदमी उन पिंजड़े के सीखचों को पकड़े हुए हैं, यह भी बहुत ऊपर से दिखायी नहीं पड़ता, क्योंकि तोते का 'ि पजड़ा बहुत स्थूल है, आदमी का पिंजड़ा बहूत सूक्ष्म है। आंख एकदम से उसे नहीं दे ख पाती। लेकिन थोड़े ही गौर से देखने पर यह दिखायी पड़ जाती है कि हम एक ही साथ दोनों काम कर रहे हैं कि आकांक्षा कर रहे हैं मुक्ति की, आकांक्षा कर रहे हैं किसी विराट के मिलन की, और क्षुद्र सींखचों को इतने जोर से पकड़े हुए हैं कि हम उन्हें छोड़ने का नाम भी नहीं लेते। और कुछ लोग हैं, जो हमारे इस विरोधाभ स का हमारे इस कंट्राडेक्शन का, हमारे जीवन की इस बहुत अदभुत उलझन का फायदा उठा रहे हैं।

          तोते के ही मालिक नहीं होते. आदमी के भी मालिक हैं, और वे मालिक भली भांति जानते हैं कि आदमी जब तक पिंजड़े के भीतर बंद हैं, तभी तक उसका शोषण हो सकता है। तभी तक उसका एक्सप्लाइटेशन हो सकता है। जि स दिन वह पिंजड़े के बाहर हैं, उस दिन शोषण की कोई दीवाल, किसी भांति का शोषण संभव नहीं रह जाएगा। और सबसे गहरा शोषण जो आदमी का हो सकता है , वह उसकी बुद्धि के और उसके विचार का शोषण, उसकी आत्मा का शोषण है। दुनिया में उन लोगों ने, जिन्होंने आदमी के शरीर को कारागृह में डाला हो, उनका अनाचार बहुत बड़ा नहीं है। जिन्होंने आदमी के आसपास दीवालें खड़ी की छे, उन्हों ने कोई बहुत बड़ी परतंत्रता पैदा नहीं की। क्योंकि एक आदमी की देह भी बंद हो सकती है, कारागृह में और फिर भी हो सकता है कि वह आदमी बंदी न हो। उसक । आत्मा, दीवाली के बाहर उड़ान भरे, उसकी आत्मा सूरज के दूर पंथों पर यात्रा करें, उसके सपने दीवालों को अतिक्रमण कर जाए। देह बंद हो सकती है, और हो सकता है, भीतर जो बैठा हो, वह बंद न हो।

          जिन लोगों ने मनुष्य के शरीर के लिए कारागृह उत्पन्न किए, वे बहुत बड़े जेलर नहीं थे। लेकिन जिन्होंने मनुष्य की आत्मा के लिए सूक्ष्म कारागृह बनाए हैं, वे मनुष्य के बहूत गहरे में शोषक, मनुष्य के जीवन पर आने वाली चिंताओं, दुखों का बोझ डालने वाले. सबसे बड़े जिम्मेदार, वे ही लोग हैं। और वे लोग कौन है? जिन लोगों ने भी धर्म के नाम पर धर्मों को नि र्मित किया है, वे सभी लोग, जिन लोगों ने परमात्मा के नाम पर छोटे-छोटे मंदिर खड़े किए हैं और मस्जिद, और चर्च वे सभी लोग। जिन लोगों ने भी धर्म के नाम पर शास्त्र निर्मित किए हैं और दावा किया है, उन शास्त्रों में परमात्मा की वाणी होने को वे सभी लोग। वे सभी लोग, उन्होंने मनष्य के अंतस चित्त को बांध लेने की बड़ी सूक्ष्म ईजादें की हैं, वे सभी लोग।

- ओशो 

मनुष्य को सब तरह से जैसे पकड़ लिया गया है जंजीरों में- ओशो

मनुष्य को सब तरह से जैसे पकड़ दिया गया है जंजीरों में- ओशो


मनुष्य को सब तरह से जैसे पकड़ लिया गया है जंजीरों में- ओशो 

           मैंने सुना है, एक नगर के द्वार पर एक राक्षस का निवास था। और बड़ी अजीब उ सकी आदत थी। वह जिन लोगों को भी द्वार पर पकड़ लेता, उनसे कहता कि मेरे पास एक बिस्तर है, अगर तुम ठीक-ठीक उस बिस्तर पर सो सके तो मैं तुम्हें छोड़ दूंगा। अगर तुम बिस्तर पर छोटे साबित हुए तो मैं। तुम्हें खींचकर बिस्तर के बराब र करने की कोशिश करूंगा। उसमें अक्सर लोग मर जाते हैं, तुम भी मर सकते हो, और अगर तुम लंबे साबित हुए तो तुम्हारे हाथ पैर काट करके बिस्तर के बराबर करने की कोशिश करूंगा और उसमें भी अक्सर लोग मर जाते हैं! और मैं तुम्हें बताये देता हूं कि अब तक एक भी मनुष्य उस बिस्तर से वापस नहीं लौट पाया. फिर में उसका भोजन कर लेता हूं।

           उस बिस्तर के बराबर आदमी खोजना मुश्किल था। या तो आदमी थोड़ा छेटा पड़ जाता, या थोड़ा बड़ा, और उसकी हत्या सुनिश्चित हो जाती। धर्मों ने भी मनुष्य को बनाने के ढांचे कर रखे हैं। आदमी या तो उनसे छोटा पड़ जाता है या बड़ा। और तब पंगू होने के अतिरिक्त अंग भंग हो जाने के अतिरिक्त को ई मार्ग नहीं रह जाता है। ऐसे पंगु करने वाले धर्मों ने जितना नूकसान किया है उत ना जिन्हें हम नास्तिक कहें, अधार्मिक कहें, उन लोगों ने भी नहीं किया है।

            मनुष्य को सब तरह से जैसे पकड़ दिया गया है जंजीरों में। बात मुक्ति की और स्वतंत्रता की है। लेकिन स्वतंत्रता और मुक्ति की बात करने वाले लोग ही कारागृह को खड़ा __ करनेवाले लोग भी हों, तो बड़ी कठिनाई हो जाती है। जीवन की धारा को सब तरह से बांधकर एक सरोवर बनाने की कोशिश की जाती है, जब कि सरोवर बनते ही सरिता के प्राण सूखने लगते हैं, उसकी मृत्यु होनी शुरू हो जाती है। सरिता का जीवन है अबाध बहे जाने में नए-नए रास्तों पर, नवीन-न वीन मार्गों पर, अज्ञात की दिशा में खोज करने में सरिता की जीवंतता है, उसकी लविंगनेस है और उसी अज्ञात के पथ पर, कभी उसका मिलन उस सागर से भी होता है, जिसके लिए उसके प्राण तड़पते हैं। कभी उस प्रेमी से उसका मिलना हो जा ता है। सरोवर है सब तरफ से बंद, दीवालें खड़े करके हर जाता है, फिर उसके प्रा ण सूखते तो जरूर हैं, कचरा उसमें इकट्ठा भी होता है, गंदगी उसमें भरती है, कीचड़ होती है। पानी तो धीरे-धीरे उड़ जाता है, धीरे-धीरे कीचड़ का धर ही वहां शेष रह जाता है। और उस सरोवर को, सागर से मिलने की सारी संभावनाएं फिर समाप्त हो जाती है।

- ओशो 

तथाकथित धर्म ने मनुष्य को उदास, चिंतित और दुखी किया है - ओशो

तथाकथित धर्म ने मनुष्य को उदास, चिंतित और दुखी किया है - ओशो


तथाकथित धर्म ने मनुष्य को उदास, चिंतित और दुखी किया है - ओशो 

          एक राजकुमार था बचपन से ही सुन रहा था कि पृथ्वी पर एक ऐसा नगर भी है ज हां कि सभी लोग धार्मिक हैं। बहुत बार उस धर्म नगर की चर्चा , बहुत बार उस ध म नगर की प्रशंसा उसके कानों में पड़ी थी। जब वह युवा हुआ और राजगद्दी का म लिक बना तो सबसे पहला काम उसने यही किया कि कुछ मित्रों को लेकर, यह उ स धर्म नगरी की खोज में निकल पड़ा। उसकी बड़ी आकांक्षा थी, उस नगर को देख लेने की, जहां कि सभी लोग धार्मिक हो।

          बड़ा असंभव मालूम पड़ता था यह बहुत दिन की खोज, बहुत दिन की यात्रा के बाद, वह एक नगर में पहुंचा, जो बड़ा अनू ठा था। नगर में प्रवेश करते ही उसे दिखायी पड़े ऐसे लोग, जिन्हें देखकर क चकि त हो गया और उसे विश्वास भी न आया कि ऐसे लोग भी कहीं हो सकते हैं। उस नगर का एक खास नियम था, उसके ही परिणाम स्वरूप यह सारे लोग अपंग हो ग ए हैं। देखो, द्वार पर लिखा है, कि अगर तेरा बांया हाथ पाप करने को संलग्न हो तो उचित है कि तू अपना बाया हाथ काट देना, बजाय कि पाप करे। देखो, लिखा है, द्वार पर कि अगर तेरी एक आंख तुझे गलत मार्ग पर ले जाए तो अच्छा है कि उसे तू निकाल फेंकना, बजाय इसके कि तू गलत रास्ते पर जाए।

          इन्हीं वचनों का पालन करके यह गांव अपंग हो गया है। छोटे-छोटे बच्चे, जो अभी द्वार पर लिखे इ न अक्षरों को नहीं पढ़ सकते हैं, उन्हें छोड़ दें तो इस नगर में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो धर्म का पालन करता हो और अपंग न हो गया हो। वह राजकुमार उस द्वार के भीतर प्रविष्ट नहीं हुआ, क्योकि वह छोटा बच्चा नहीं थ [ और द्वार पर लिखे अक्षरों को पढ़ सकता था। उसने घोड़े वापस कर लिए और उ सने अपने मित्रों को कहा, हम वापस लौट चलें, अपने अधर्म के नगरों को, कम से कम आदमी वहां पूरा तो है!

          इस कहानी से इसलिए मैं अपनी बात शुरू करना चाहता हूं कि सारी जमीन पर ध मों के तथाकथित रूप ने आदमी को अपंग किया है। उसके जीवन को स्वस्थ और पू र्ण नहीं बनाया बल्कि उसके जीवन को खंडित, उसके जीवन को अवस्था, पंगु और कुंठित किया है। उसके परिणाम स्वरूप सारी दुनिया में, जिनके भीतर भी थोड़ा वि चार है, जिनके भीतर भी थोड़ा विवेक है, जो थोड़ा सोचते हैं और समझते हैं, उन सब के मन में धर्म के प्रति एक विद्रोह की तीव्र भावना पैदा हुई है। यह स्वाभावि क भी है कि यह भावना पैदा हो। क्योकि धर्म ने, तथाकथित धर्म ने जो कुछ किया है, उससे मनुष्य आनंद को तो उपलब्ध नहीं हुआ, वरन उदास, और चिंतित और दुखी हो गया है।

- ओशो