शुक्रवार, 27 जून 2014

सिद्धार्थ उपनिषद Page 138

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(412)

किसी को जानने के लिए तीन बातें जानना जरूरी है - नाम, रूप और गुण . गोविन्द को भी जानने के लिए भी यही तीन बातें जरूरी हैं. गोविन्द का नाम है - नाद. रूप है - ज्योतिर्कण, कॉस्मिक मैट्रिक्स. और गुण है - नूर, आनंद, प्रेम. और संतों ने इसे ही ' शब्द ' कहा  हैं. और इन तीनों को एक साथ जानने वाला ' चैतन्य ' है ..

(413)

स्पिरिट = सूक्ष्म शरीर + आत्मा . जीव = स्पिरिट +  बॉडी . जड़ और चेतन का जहाँ मिलन , जहाँ ग्रंथि पड़ जाती है वहां जीवन होता है .

(414)

समाधि और सम्बोधि में क्या अंतर है ?  समाधि परमात्मा से मिलन होना और छूट जाना है . सम्बोधि परमात्मा से विवाह हो जाना है .

(415)

जीवन क्या है ? जीवन उत्सव है . परमात्मा अपना प्रेम पक्षियों , पशुओं , पेड़ों और हमारे साथ शेयर करता है . कई के साथ प्रेम की शेयरिंग उत्सव है .


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(410)

आत्मा केन्द्र की तरह है मन परिधि की तरह है . आत्मा सूर्य की तरह है मन उसकी किरण की तरह है . आत्मा निराकार है मन आकार है . आत्मा सब्जेक्टिव कान्सशनेस है मन आब्जेक्टिव कान्सशनेस है . मन में विचार होता है आत्मा में विचार नहीं होता है . मन में विषय होता है आत्मा में विषय नहीं होता है . मन में विकार होता है आत्मा में विकार नहीं होता है . मन का आकार है आत्मा का कोई आकार नहीं है .

(411)

" आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे..." यह अगर किसी बंदे के लिये गाया जाए तो गीत है . गुरु के लिए , गोविन्द के लिए गाया जाए तो गीता हो गया . "जूली आई लव यू " अगर जूली कोई लड़की है तो गीत है और अगर जूली परमात्मा है तो गीता है . इसलिए गाने को गीता समझ के गाना है , गीत समझ के नहीं . भाव पर बड़ा निर्भर है . " मानो तो मै गंगा मां हूँ , न मानो तो बहता पानी " करोड़ों-अरबों लोगों का हजारों साल से जो पवित्रता का भाव जुड़ गया उसने गंगा को गंगा बना दिया . अभी भी वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं ; कि गंगा के पानी में ऐसा क्या है ? जो दूषित नहीं होता , खराब नहीं होता . वो कभी भी नहीं जान पाएंगे . क्योंकि ये करोड़ों-करोड़ों भारतवासियों का भाव है पवित्रता का , जिसने गंगा को गंगा बना दिया है . तुम्हारे भाव की ऊर्जा होती है , तुम्हारे भाव की शक्ति होती है .



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(409)

जीवित गुरु के साथ तुम रुक नहीं सकते  किसी विधि पर . लेकिन जब विधि देकर गुरु शरीर से विदा हो गया तब ज्यादा खतरा है , वह विधि तुम्हारे लिए अटकाव बन जाए . ओशो के साथ ऐसा दुर्भाग्य हुआ ; वे दे के गए सक्रिय-ध्यान . आध्यात्म के लिए "सक्रिय-ध्यान" नर्सरी-क्लास की बात है . लेकिन सब रुक गए . गजब का दुर्भाग्य हुआ ! ओशो ने कहा किसी विधि पर रुको मत , उस विधि पर रुको मत . जीवित गुरु के पास रहोगे तो तुम्हारी यात्रा के लिए आगे की विधियाँ देता रहेगा . जीवित गुरु जानता है तुम्हें कहां आगे बढ़ाना है , कैसे आगे बढ़ाना है . अगर जीवित गुरु के साथ चलते रहे , चलते रहे ... जीवित गुरु हमेशा नया होता है , विधियाँ पुरानी पड़ जाती हैं . जीवित गुरु कभी पुराना नहीं पड़ता क्योंकि झरना ऊपर से सदा झरता रहता है .  जीवित गुरु बचा के तुमको ले चलता है और "परमपद" तक पहुंचा देता है .



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 (407)

 तुम्हें पता है हमारी मां कितनी रातें हमारे लिए जागती है . मां ने जो हमारे लिए किया है क्या हम चुका सकते हैं ? कभी चुकाया जा सकता है . माना कि मां जैसा पिता का योगदान नहीं होता है ; फिर भी लालन-पालन में ,पढ़ाने में कसर तो नहीं रखता , जो भी किया जा सकता है लालन-पालन में करता है . सम्मान तो सभी का करना है . माता-पिता का सर्वाधिक सम्मान करना है .

(408)

" मन मस्त हुआ तो क्यों बोले ." मन मस्त हो गया तो बोलेगा भला ! नहीं बोलेगा . ओशो दिनभर नहीं बोलते थे . केवल सुबह प्रवचन देने आये बोलते थे , शाम प्रवचन में बोलते थे . बुल्लेशाह कहते हैं-" वाक् सुखं चुपकित्ता ." वाक् मतलब - अनाहतनाद . ऐसा आनंद मिला कि अब चुप हो गया मैं . तो निश्चित रूप से सुमिरन तो चुप रहकर ही किया जा सकता है . अगर बोलोगे तो सुमिरन कैसे होगा . कम बोलने की आदत डालो . जरूरी हो तो बोलो . कोई तुम्हारी सलाह मांगे तो तुम जरूर बोलो . ध्यानी को , भक्त को अधिक से अधिक मौन रहना चाहिए .



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