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    जैसे तुम हो - ओशो

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    जैसे तुम हो - ओशो


    मैंने सुना है, लंदन में एक बहुत अद्भुत फोटोग्राफर था। उसने अपने स्टूडियो के सामने एक तख्ती लगा रखी थी। उस तख्ती पर उसने अपनी फोटो उतारने के दामों की सूची लिख रखी थी।

    उस पर लिखा था:

    जैसे आप हैं, अगर वैसा ही फोटो उतरवाना है तो पांच रुपए।

    जैसे आप दिखाई पड़ते हैं, अगर वैसा फोटो उतरवाना है तो दस रुपए।

    जैसा आप चाहते हैं कि दिखाई पड़ें, अगर वैसा फोटो उतरवाना है तो पंद्रह रुपए।


    एक गांव का ग्रामीण वहां पहुंचा। वह भी चित्र उतरवाना चाहता था। वह हैरान हुआ कि चित्र भी क्या तीन प्रकार के हो सकते हैं!

    उसने फोटोग्राफर से पूछा, “क्या पांच रुपए को छोड़कर कोई दस और पंद्रह रुपए वाला फोटो भी उतरवाता है?”

    उस फोटोग्राफर ने कहा, “तुम पहले आदमी हो, जो पांच रुपए वाला फोटो उतरवाने का विचार कर रहे हो। अब तक यहां कोई पांच रुपए वाला फोटो उतरवाने नहीं आया।

    जिनके पास पैसे होते हैं, वे पंद्रह रुपए वाला ही उतरवाते हैं। मजबूरी हो, पैसे कम हों, तो दस रुपए वाला उतरवाते हैं। लेकिन मन उनका पंद्रह रुपए वाले पर ही रहता है।

    पांच रुपए वाला तो कोई मिलता नहीं। जो जैसा है, वैसा चित्र कोई भी उतरवाना नहीं चाहता।”

    हम अपने व्यक्तित्व को ऐसी पर्त-पर्त ढांके हुए हैं। इससे एक पाखंड पैदा हुआ है। इस पाखंड से सारा मनुष्य-चित्त रुग्ण हो गया है।

    और अगर कोई बहुत जिद्दी हो और पाखंडी न होना चाहता हो, और अपने भीतर के अंधकार, घृणा और क्रोध को हटाने का आग्रह करता रहे, तो उसके लिए विक्षिप्त हो जाने का खतरा भी है।

    - ओशो

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