भविष्य की निरर्थक यात्रा - ओशो
भविष्य की निरर्थक यात्रा - ओशो
मैंने सुना है, एक बूढ़ा आदमी ट्रेन में यात्रा कर रहा था। एक बीच के स्टेशन पर एक युवक भी सवार हुआ। उसके हाथ के बैग को देखकर लगता था कि वह किसी इंश्योरेंस कंपनी का एजेंट होगा।
वह बूढ़े आदमी के पास आकर बैठा। थोड़ी देर बाद उसने पूछा, “क्या महाशय आप बता सकेंगे, आपकी घड़ी में कितना बजा हुआ है?”
वह बूढ़ा थोड़ी देर चुप रहा और उसने कहा, “क्षमा करें, मैं नहीं बता सकूंगा।”
उस युवक ने पूछा, “क्या आपके पास घड़ी नहीं है?”
उस बूढ़े ने कहा, “घड़ी तो जरूर है, लेकिन मैं थोड़ा आगे का भी विचार कर लेता हूं, तभी कुछ करता हूं। अभी तुम पूछोगे कितना बजा है और मैं घड़ी में देखकर बता दूंगा कितना बजा है।
हम दोनों के बीच बातचीत शुरू हो जाएगी। फिर तुम पूछोगे, आप कहां जा रहे हैं। मैं कहूंगा, न्यूयॉर्क जा रहा हूं। तुम कहोगे, मैं भी जा रहा हूं। आप किस मोहल्ले में रहते हैं?
तो मैं अपना मोहल्ला बताऊंगा। संकोचवश मुझे कहना पड़ेगा, अगर कभी वहां आएं, तो मेरे घर भी आना। मेरी जवान लड़की है। तुम घर आओगे, निश्चित ही उसके प्रति आकर्षित हो जाओगे।
तुम उससे कहोगे कि चित्र देखने चलती हो। वह जरूर राजी हो जाएगी। और यह मामला यहां तक बढ़ेगा कि एक दिन मुझे विचार करना पड़ेगा कि बीमा एजेंट से अपनी लड़की की शादी करनी है या नहीं करनी है।
और मुझे बीमा एजेंट बिल्कुल भी पसंद नहीं आते। इसलिए कृपा करो, मुझसे तुम घड़ी का समय मत पूछो!”
इस आदमी पर जरूर हमें हंसी आ सकती है। लेकिन हम सब इसी तरह के आदमी हैं।
हमारा चित्त वर्तमान से छिटक जाता है और भविष्य में उतर जाता है। और भविष्य के संबंध में आप कुछ भी सोचें, सभी ऐसा ही फिजूल और व्यर्थ है। क्योंकि भविष्य है नहीं।
जो भी आप सोचेंगे, सभी कल्पना है, सभी इमेजिनेशन है। जो भी आप सोचेंगे, वह इसी तरह का झूठा और व्यर्थ है।
जैसे इस आदमी का, इस छोटी-सी बात से कि घड़ी में कितना बजा है, इतनी लंबी यात्रा पर कूद जाना।
इसका चित्त हम सबका चित्त है।
- ओशो
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