प्रेम का आवरण - ओशो
प्रेम का आवरण - ओशो
मैंने सुना है, एक सुबह एक पति अपना अखबार पढ़ रहा था। उसकी पत्नी ने उसे अखबार पढ़ते देखकर चिंता अनुभव की होगी, क्योंकि पत्नियां यह कभी पसंद नहीं करतीं कि उनका पति उनके अतिरिक्त और किसी चीज में उत्सुक हो। अखबार में भी उत्सुक हो तो समस्या पैदा होती है।
तो उस पत्नी ने कहा, “ऐसा मालूम होता है कि अब तुम मुझे प्रेम नहीं करते। मैं आधे घंटे से बैठी हूं, लेकिन तुमने मेरी तरफ देखा नहीं। तुम अपना अखबार ही पढ़े जाते हो।”
उसके पति ने कहा, “गलती में हो तुम। अब तो मैं तुम्हें और भी ज्यादा प्रेम करता हूं। अब तो तुम्हारे बिना मैं एक क्षण नहीं जी सकता। तुम्हीं मेरी श्वास, तुम्हीं मेरे प्राण हो।”
और आखिर में कहा, “अब बकवास बंद करो, अब मुझे अखबार पढ़ने दो। अब बहुत हो गया!”
एक ऊपर का आवरण जीवन में हम प्रेम का ओढ़े बैठे रहते हैं। और पीछे हमारी सारी क्रूरता और सारी हिंसा मौजूद होती है।
अगर आदमी को जरा खरोंच दो, उसका सारा झूठा व्यक्तित्व खत्म हो जाता है और उसके भीतर से असली आदमी बाहर आ जाता है।
जरा किसी के पैर पर चोट लगा दो, जरा किसी को धक्का दे दो—वह ऊपर से दिखाई पड़ने वाला आदमी समाप्त हो जाता है और दूसरा आदमी मौजूद हो जाता है।
इस आदमी का पता भी नहीं था कि यह इतनी ही दूरी पर, पास ही मौजूद है।
हम सबके भीतर वह आदमी छिपा है। और उस आदमी की मौजूदगी के ऊपर झूठा और विरोधी आवरण है।
भीतर हिंसा मालूम पड़ती है, तो जो विरोधी है—अहिंसा—उसका वस्त्र ओढ़ लिया। भीतर क्रोध है, तो ऊपर क्षमा का वस्त्र ओढ़ लिया। भीतर घृणा है, तो ऊपर प्रेम का वस्त्र ओढ़ लिया।
- ओशो
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