स्वतंत्रता और परतंत्रता की भ्रांति - ओशो
स्वतंत्रता और परतंत्रता की भ्रांति - ओशो
यूनान में एक विचारक हुआ—एपिक्टेटस। उसको यूनान के सम्राट ने बुलाया और कहा कि मैंने सुना है कि तुम कहते हो कि तुम्हें कोई परतंत्र नहीं कर सकता। यह बात गलत है।
एपिक्टेटस ने कहा, “तो करके दिखाएं, महाराज!”
बड़ी हिम्मत की चुनौती थी। एक नंगा फकीर सम्राट से कह रहा था, “तो करके दिखाएं!”
वह सम्राट भी बहुत दुष्ट प्रकृति का था। उसने सिपाही बुला रखे थे। एपिक्टेटस को हथकड़ियों से बंधवा दिया और कहा, “अब?”
लेकिन उसने कहा, “मैं परतंत्र नहीं हूं। जिसको आपने परतंत्र किया है, यह तो देह है, यह मैं नहीं।”
उसने सिपाहियों से कहा, “इसकी टांग उखाड़ दो।”
वे उसकी टांग पकड़कर तोड़ने लगे। उसने कहा, “देखो, तोड़ तो रहे हो, लेकिन अभी तक मैं महाराज के कुछ काम पड़ जाता था। अब आगे काम न पड़ सकूंगा, वह खयाल रखना। मजे से तोड़ो!”
टांग उसकी तोड़ी जा रही है, लेकिन वह ऐसे कह रहा है जैसे कोई चीज किसी और की तोड़ी जा रही हो।
टांग तोड़ दी गई। एपिक्टेटस हंसता रहा। उसने कहा, “तुम मेरी देह को चाहो तो जंजीरों में डाल दो, कारागृह में डाल दो, लेकिन मुझे तुम कैद नहीं कर सकोगे। मैं स्वतंत्रता हूं।”
तो एक एपिक्टेटस है, जो कहता है, “मैं स्वतंत्र हूं”—कारागृह में पड़ा है, टांग तोड़ी जा रही है, जंजीरों में बंधा हुआ है।
और एक सिकंदर है, जो मरते वक्त अनुभव करता है कि मेरा सारा साम्राज्य, सारा धन, सब व्यर्थ गया। मैं मर रहा हूं ऐसे ही जैसे एक कुत्ता मरता है।
फर्क क्या है?
दोनों ही भ्रांतियां हैं। न तो कोई परतंत्र है, न कोई स्वतंत्र। परमात्मा है—और एक है।
तुम जो भ्रांति बनाना चाहो, बना सकते हो। अगर तुम्हें स्वतंत्रता की भ्रांति बनानी है तो शरीर से अपने को भिन्न मान लेना, तो स्वतंत्रता की भ्रांति पैदा हो जाएगी। अगर परतंत्रता की भ्रांति बनानी है, शरीर के साथ अपना तादात्म्य कर लेना, तो परतंत्रता की भ्रांति पैदा हो जाएगी।
लेकिन एक ही है। दो होते तो स्वतंत्रता-परतंत्रता हो सकती थी।
अगर तुम ठीक से समझना चाहो तो यह अस्तित्व एक परस्परतंत्रता है—न स्वतंत्रता, न परतंत्रता, बल्कि परस्परतंत्रता। सब एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
- ओशो
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