चित्रकार की दृष्टि - ओशो
चित्रकार की दृष्टि - ओशो
पश्चिम के बहुत बड़े चित्रकार विन्सेंट वान गॉग ने ऐसे चित्र बनाए हैं कि लोग बड़े चकित होते थे। एक चित्र में वृक्ष इतने ऊंचे चले गए हैं कि चांद-तारों को छू रहे हैं।
किसी ने पूछा कि वान गॉग, हमने वृक्ष बहुत देखे हैं, मगर कोई वृक्ष चांद-तारों को नहीं छूता।
वान गॉग ने कहा, “मैं कोई फोटोग्राफर नहीं हूं, चित्रकार हूं। फोटोग्राफर तो उतना ही कर सकता है, जितना बाहर है। मैं वृक्षों की आत्मा को पहचानता हूं। मैं इनके पास बैठा हूं, मैंने वृक्षों के भीतर झांका और देखा है। मैंने वृक्षों का अनुभव किया है।
माना कि वे चांद-तारों तक पहुंच नहीं पाते, लेकिन उनकी आकांक्षा है। वे पहुंचना चाहते हैं। मैंने उनके हृदय की धड़कन सुनने के लिए कान लगाया है। हर वृक्ष चांद-तारों को छूना चाहता है। यह मैं तुमसे कहता हूं, मेरी मानो, भरोसा करो, मैं उनकी भाषा जानता हूं। जो वे नहीं कर पाते हैं, वह मैंने उनके लिए किया है।”
यह चित्रकार है, यह कोई फोटोग्राफर नहीं है। फोटोग्राफी में और चित्रकला में यही तो फर्क है।
अभी कुछ दिन पहले पश्चिम में बड़ा तहलका मचा था। चर्चिल की पत्नी ने चर्चिल का एक बनाया हुआ चित्र, जिसकी कीमत कम-से-कम दस लाख से लेकर पचास लाख रुपए तक थी, जला दिया।
जब चित्र बनाया गया था, चर्चिल जिंदा थे। लेकिन जैसे ही चित्र बनाया गया, पत्नी को पसंद नहीं आया। चर्चिल को भी पसंद नहीं आया। उन्होंने उसे तहखाने में छिपाकर रख दिया।
जिस चित्रकार ने बनाया था, वह दुनिया के बड़े चित्रकारों में से एक था। फिर उस चित्र का कुछ पता ही नहीं चला। चर्चिल के मरने के बाद खोजबीन शुरू हुई कि वह चित्र कहां है, लेकिन तब भी उनकी पत्नी ने कुछ पता नहीं चलने दिया।
फिर जब पत्नी मरी, तब खोजबीन पूरी तरह शुरू हुई कि अब तो चित्र मिलना ही चाहिए। खोजबीन करने से पता चला कि चित्र तो मिला नहीं, लेकिन नौकर-चाकरों से खबर मिली कि वह चित्र चर्चिल की पत्नी ने जला दिया।
वह लाखों रुपए की अमूल्य निधि जला दी गई। क्यों? पत्नी नाराज थी, चर्चिल भी उस चित्र से नाराज थे।
चर्चिल ने चित्रकार से कहा भी था, “क्या मैं ऐसा दिखाई पड़ता हूं?”
चित्रकार ने कहा, “आप ऐसे दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन आप ऐसे हैं।”
- ओशो
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