उधार की हंसी - ओशो
उधार की हंसी - ओशो
मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन फ्रांस की यात्रा पर गया। फ्रांसीसी भाषा उसे आती नहीं थी। किसी फ्रांसीसी मित्र ने उसे अपने घर आमंत्रित किया था और कुछ अन्य मित्रों को भी बुलाया था।
भोजन के बाद गपशप हुई। एक सज्जन ने एक फ्रांसीसी चुटकुला कहा। सारे फ्रांसीसी सुनकर जोर से हंसने लगे।
मुल्ला भी खिलखिलाकर हंसा—ऐसा कि सबको मात कर दिया। एकदम लोटने-पोटने लगा।
उसकी हंसी और उसका लोटना-पोटना देखकर उन सबकी हंसी तो खो ही गई। वे एकदम सकते में आ गए। उन्होंने पूछा, “क्या आप हमारी भाषा समझते हैं?”
मुल्ला ने कहा, “भाषा नहीं समझता, लेकिन आप में मुझे विश्वास है। बात जरूर कुछ हंसी की ही रही होगी। मैं आप पर भरोसा करता हूं। मैं आस्तिक आदमी हूं। मैं सदा दूसरों पर भरोसा करता रहा हूं।
जब आप सब हंस रहे हैं, तो बात हंसी की रही ही होगी। अब उसमें और मुझे जानने की जरूरत क्या है?”
पर भेद तुम्हें समझ में आता है?
एक बात को समझकर तुम हंसो और एक बात को यह मानकर हंसो कि होगी ही हंसने की—इसमें जमीन-आसमान का अंतर है।
यह हंसी झूठी रही, चाहे कितना ही लोटो-पोटो। चाहे कितने ही जोर से खिलखिलाओ, लेकिन तुम्हारे हृदय से यह नहीं उठी। नहीं उठ रही है, नहीं उठ सकती है।
- ओशो
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