• New Post

    विचारशून्यता - ओशो

    thoughtlessness - osho


    विचारशून्यता - ओशो 

    बुद्ध का एक शिष्य था श्रोण | वह राजकुमार था। मुझे उसकी कथा इसलिए प्रिय र ही कि मैंने सारे मुल्क में बार-बार उसे कहा और मुझे उसके मुकाबले कोई भी बा त नहीं दिखाई पड़ती। वह राजकुमार था, वह दीक्षित होकर भिक्षु हो गया। पहले िदन जब वह भिक्षा मां ने जाने लगा तो बुद्ध ने उससे कहा कि अभी तुझे भिक्षा मां गने का ज्ञान नहीं। कल तक राजकुमार था, आज भिक्षा के पात्र को लेकर जाएगा। पता नहीं कैसा तुझे लगे, इसलिए मैंने अपनी एक श्राविका से कहा है कि जब तक तू भिक्षा के मांगने में निष्णात न हो जाए, तब तक भोजन वहीं कर लेना। अभी तू भिक्षा मत मांग, वहां जाकर भोजन कर आ। 

            वह राजकुमार श्रोण, जो कि संन्यासी हो गया था, उस भाविका के घर भोजन कर ने गया। कोई दो मील का फासला था, वह रास्ते भर बहुत बातें सोचने लगा। उसे खयाल आया उन भोजनों का, जो उसे प्रिय थे। उसने आज सोचा, आज पता नहीं कैसा अप्रिय भोजन मिले, कैसा अरुचिकर भोजन मिले, कैसा रूखा-सूखा मिले। उसे जो-जो प्रिय भोजन थे, वे सब स्मरण आए और यह भी खयाल आया कि अके मि लने की संभावना इस जीवन में दुबारा नहीं है। लेकिन जब वह श्राविका के घर पहुं चा और भोजन के लिए बैठा तो देख कर हैरान हुआ कि उसकी थाली में वे ही भ जन थे, जो उसे प्रिय थे। उसे बड़ी हैरानी हुई, उसे बहुत अचंभा हुआ। फिर उसने सोचा, शायद यह संयोग की ही बात होगी कि आज ये भोजन बने हैं। उसने चुपचाप भोजन किया। 

            जब वह भोजन कर रहा था, तो उसे यह खयाल आया कि अब यह भोजन करने के बाद, फिर यह दो मील रास्ता दोपहरी में तय करना है। और अ ज तक ऐसा मैंने कभी नहीं किया। भोजन के बाद मैं विश्राम करता था। अब वह श्राविका पंखा करती थी। उसने कहा, भंते! अगर भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम करें तो मुझ पर बड़ी कृपा होगी। वह फिर थोड़ा हैरान हुआ! उसे लगा कि मैंने सो चा था, संयोग की बात होगी, मैंने सोचा। उसी वक्त उसने एक चटाई डाल दी। ले टते ही उसे खयाल आया कि आज न अपनी कोई साया है, न कोई शैप्या है। वह श्राविका पीछे थी। उसने कहा, भंते! शैया तो न तो आपकी है, न मेरी है। न साया आपका है न मेरा है। वह घबड़ा कर बैठ गया। उसने कहा, बात क्या है, क्या मेरे विचार पढ़ लिए जाते हैं ? उस श्राविका ने कहा, ध्यान का अभ्यास करने से, पहले तो अपने विचार दिखा ई देने शुरू हुए, फिर अपने विचार समाप्त हुए। अब दूसरे के भी विचार दिखाई देने शुरू हो गए। वह उठकर बैठे गया। उसने कहा, अब जाऊं? उस श्राविका ने कहा, आप विश्राम करें, अभी न जाएं।

            उसने जाकर बूद्ध से कहा कि मैं कल से उस श्राविका के यहां भोजन करने नहीं जा सकता। बुद्ध ने कहा, क्या बात है? वह यूवक कहने लगा, बात! मेरा कोई अपमा न नहीं हुआ, बड़ा स्वागत हुआ, बहुत सम्मान हुआ, लेकिन मैं नहीं जाऊंगा। आप छोड़ दें उस बात को। उस श्राविका के यहां मैं नहीं जाऊंगा। बुद्ध ने कहा, बिना ज ने मैं कैसे छोड़ सकता हूं? वह युवक बोला, जानने की बात यह है कि मैं उसके घर गया। वह विचार पढ़ने में समर्थ है और उस संदर युवती को देखकर मेरे मन में विकार और वासना भी उठी तो वह भी पढ़ ली गयी। अब मैं कल उसके द्वार प र कैसे जा सकता हूं। और कौन सा मुंह लेकर जाऊंगा?

    बुद्ध ने कहा, मैंने जान कर तुझे वहां भेजा है। वही तुम्हारी साधना का हिस्सा है। कल भी तुम्हें वहीं जाना होगा और परसों भी तुम्हें वहीं जाना होगा। और उसके बा द के दिनों में भी तुमको जाना होगा, उस दिन तक, जब कि तुम उस द्वार से निर्वि चार होकर न लौटो। मजबूरी थी, उस भिक्षु को वहां जाना पड़ा। बुद्ध ने कहा, एक स्मरण रखना, किसी विचार से लड़ना मत, किसी विचार से संघर्ष मत करना, कि सी विचार के विरोध में खड़े मत होना। एक ही काम करना कि जब तू रास्ते से ज ए तो अपने भीतर सजगता रखना और जो भी विचार उठते हों, उनको देखते जा ना। सिर्फ देखते हुए जाना और कुछ भी मत करना। तुम्हारा निरीक्षण, तुम्हारा आज जर्वेशन बना रहे, तुम देखते रहो। अनदेखा कोई विचार न उठे, बेहोशी में कोई वि चार न उठे तुम्हारी आंख भीतर गड़ी रहे और तुम देखते रहो कि कौन से विचार उठ रहे हैं। सिर्फ निरीक्षण करना, लड़ना मत।

            वह युवक गया। जैसे-जैसे उस महिला का द्वार करीब आने लगा, मकान करीब आने लगा, उसकी घबराहट और बेचैनी बढ़ने लगी। जैसे-जैसे बेचैनी बढ़ने लगी, वैसे-वै से वह सजग होने लगा। वैसे-वैसे भय का बिंदु करीब आने लगा जैसे-जैसे लगने लग , वह महिला करीब ही होगी, जो पढ़ सकती है, वैसे-वैसे वह अपनी आंख को भी तर खोलने लगा। जब वह सीढ़ियां चढ़ता था, उसने पहली सीढ़ी पर पैर रखा, उसने अपने भीतर देख । तो उसके भीतर कोई विचार नहीं। उसने दूसरी सीढ़ी पर पैर रखा, भीतर बिलकु ल सन्नाटा मालूम पड़। उसने तीसरी सीढ़ी पर पैर रखा, उसे दिखाई पड़ा, अपने आ र-पार देख रहा हूं, वह एकदम खाली पड़े हैं। वहां कोई विचार नहीं है। वह बहुत घबड़ाया । ऐसा उसने कभी अनुभव नहीं किया था कि बिलकुल विचार ही न हों औ र जब विचार बिलकुल न थे तो उसे ऐसा लगा जैसे हवा हो गया हो, हलका हो ग या हो। वह गया और उसने भोजन किया। 

                फिर नाचता हुआ वापस लौटा। उसने बुद्ध के पैर पकड़ लिए। उसने बुद्ध से कहा-अदभुत अनुभव हुआ। जब मैं उस की सीढ़ियों पर पहुंच कर भीतर बिलकुल सजग हो गया, सचेत हो गया, होश से भर गया तो मैं हैरान हो गया। एक भी विचार न था, सब विचार शून्य हो गए। बुद्ध ने कहा, विचार से शून्य होने का उपाय, विचार के प्रति पूरा सजग होना है। जो व्यक्ति जितना सजग हो जाएगा, विचारों के प्रति उतने ही विचार, उसकी भां त उसके मन में नहीं आते, जैसे घर में दीया जलता हो तो चोर नहीं आते। घर में अंधकार हो तो चोर घर के अंदर आते हैं ? भीतर जो होश को जगा लेता है, उतने ही विचार क्षीण हो जाते हैं। जितनी मूर्छा होती है भीतर, जितना सोयापन होत । है भीतर, उतना ज्यादा विचारों का आक्रमण होता है। जितना जागरण होता है, उतने ही विचार क्षीण हो जाते हैं।

    - ओशो 

    कोई टिप्पणी नहीं