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    निर्विचार होने और विचारहीन होने में फर्क - ओशो

    Difference between being thoughtless and being thoughtless - Osho


    निर्विचार होने और विचारहीन होने में फर्क - ओशो 

    निर्विचार होने में और विचारहीन होने में फर्क है। निर्वि चार होने का अर्थ है, विचारों का स्वयं त्याग किया। निर्विचार होने से विचारहीन न हीं हो जाते आप, परिपूर्ण विचार को उपलब्ध होते हैं। मैंने कहा, निर्विचारणा विचा र शक्ति के परिपूर्ण जागरण का उपाय है। विचारहीन होने को नहीं कह रहा हूं, नि र्विचार होने को कह रहा हूं। अविवेक के लिए नहीं कह रहा हूं, पूरा विवेक जगाने के लिए कह रहा हूं। पशुओं में विचारणा नहीं है,वे विचार नहीं कर पाते। मनुष्यों में विचार है, वे विचारहीनता को उपलब्ध होते हैं। इसलिए एकदम अबोध व्यक्ति और परिपूर्ण आदमी में समानताएं होती हैं। 

            एकदम अज्ञानी में और परम ज्ञानी में समानताएं मालूम पड़ती हैं। और उनके दफा भूल हो जाती है। उसका कारण है कि दो परिपूर्णताएं एक जगह जाकर मिलती हैं। वह भी अबोध मालूम होगा। परम ज्ञा नी भी अबोध मालूम होता है, अत्यंत बोध के कारण | बहुत प्रकाश हो जाए तो आं ख अंधी हो जाती है। अत्यधिक प्रकाश हो तो आंख बंद हो जाती है, बिलकुल प्रका श न हो तो अंधकार हो जाता है। लेकिन बहुत प्रकाश से पैदा हुआ जो अंधकार है, उसकी गरिमा अलग है। इसी भां त विचार से निर्विचार को उपलब्ध होना बहुत अलग बात है। वह विचारहीनता नह " है, वह विचारशून्यता है।

    - ओशो 

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