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    समाधि का अर्थ - ओशो



    Meaning of Samadhi - Osho


     समाधि का अर्थ - ओशो 

    समाधि का अर्थ है सारे विचारों का शून्य हो जाना। ये विचार कैसे शून्य हों, इसके दो रास्ते हैं। एक रास्ता तो यह है कि हम अपने भीतर विचार का पोषण न करें। हम सारे लोग विचार का पोषण करते हैं और संग्रह करते हैं। सुबह से सांझ तक हम विचार को इकट्ठा करते हैं और इकट्ठा करने में हम कभी यह भी ध्यान नहीं र खते कि हम कचरा इकट्ठा कर रहे हैं, फिजूल का कचरा इकट्ठा कर रहे हैं या कोई सार्थक बात भी इकट्ठी कर रहे हैं। 

            अगर मेरे घर में कोई कचरा फेंक जाए तो मैं झगड़ा करूंगा, लेकिन अगर कोई आ दमी आकर दो घंटे मेरे दिमाग में कोई विचार फेंक जाए तो मैं कोई झगड़ा नहीं क रता। दुनिया में एक दूसरे के मस्तिष्क में विचार फेंकने की पूरी स्वतंत्रता है। इससे खतरनाक और कोई स्वतंत्रता नहीं हो सकती, क्योंकि मनुष्य का जितना घात ये वि _चार कर सकते हैं, उतना और कोई चीज नहीं कर सकती। हम इस भांति जाने अनजाने, बिलकुल, मूर्छित अवस्था में, विचारों को इकट्ठा करते रहते हैं। न विचारों की पर्त पर पर्त, हमारे भीतर, पूरे चेतन अचेतन मन पर इकट्ठी हो जाती है। उन की इतनी गहरी दीवारें बन जाती हैं कि उनके भीतर प्रवेश करना मुश्किल हो जात। है। जब भी आप भीतर जाएंगे, वे ही विचार आपको मिल जाएंगे, आत्मा तक प हुंचना संभव नहीं होगा। ये विचार बीच में ही आपको रोक लेंगे, अंदर नहीं जाने दें गे। हर विचार अटकता है और रोकता है, क्योंकि विचार उलझा लेता है। जब भी आप अपने भीतर प्रवेश करेंगे, तभी कोई न कोई विचार आपको रोक लेगा, आप उसी के अनुसरण में लग जाएंगे। जब तक निर्विचार होने का आग्रह इसीलिए है कि जब तक आप निर्विचार न हो जाए तब तक भीतर गति नहीं हो सकती। आप बी च में जाएंगे, बाहर आ जाएंगे। वह विचार आपको बहुत दूर ले जाएगा। उसके एस सिसिएशन्स होंगे, वह आपको दूर ले जाएगा। आप वहीं भटक जाएंगे, आप पूरे भी तर प्रवेश नहीं कर पाएंगे। 

            हर आदमी भीतर जाता है, जितना ज्यादा विचारवान अ दिमी होता है, विचार से भरा होता है, उतने बाहर से ही लौट आता है। जितना जल्दी कोई विचार उसको पकड़ लेता है, वह उतनी ही जल्दी वापस लौट आता है। ब्रिटिश विचारक डेविड ह्यूम ने सिखा है कि मैंने यह सुन कर कि भीतर प्रवेश कर ना चाहिए, बहुत बार भीतर प्रवेश करने की कोशिश की, लेकिन जब भी मैं भीतर गया, मुझे आत्मा तो नहीं मिली कोई विचार मिल जाता था, कोई कल्पना मिल जाती है, कोई स्मृति मिल जाती थी। आत्मा नहीं मिली। मैं बहुत बार भीतर गया, ये ही मुझे मिले। उसने ठीक लिखा है। उसका अनुभव गलत नहीं है। आप भी अप ने भीतर जाएंगे तो यही मिल जाएंगे और ये आपको बाहर ले जाएंगे। तो जिसको भीतर जाना हो, पूरे भीतर जाना हो, उसे बीच की इन सारी बाधाओं को अलग क र देना जरूरी है।

    - ओशो 

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