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    चिंतन शाश्वत और नित्य सत्य पर नहीं ले जा सकता - ओशो

    Contemplation cannot lead to eternal and eternal truth - Osho


    चिंतन शाश्वत और नित्य सत्य पर नहीं ले जा सकता - ओशो 

    ध्यान से मेरा प्रयोजन चित्त की ऐसी स्थिति से हैं, जहां कोई शंका, जहां को ई प्रश्न , जहां कोई जिज्ञासा शेष न रह जाए। हम जीवन सत्य के संबंध में कुछ न कुछ पूछ रहे हैं। ऐसा मनुष्य निरंतर खोजना कठिन है, जो जीवन के सत्य के संबंध में किसी जिज्ञासा को न लिए हो। न तो हमें इस बात का कोई ज्ञान है कि हम कौन  हैं, न हमें इस बात का कोई ज्ञान है कि हमारे चारों ओर फैला जगत क्या है। हम जीवन के बीच में अपने को पाते हैं, बिना किसी उत्तर के, बिना किसी समाधा न के। चारों तरफ प्रश्न हैं और उनके बीच में मनुष्य अपने को घिरा हुआ पाता है।

            इन प्रश्नों में कुछ तो अत्यंत जीवन की बुनियाद से संबंधित हैं, जैसे मैं क्यों हूं? मेरी सत्ता क्यों है? मेरे होने की क्या आवश्यकता है? क्या अनिवार्यता है ? और फि र मैं कौन हूं? और मैं जन्म हूं या मैं मृत्यु हूं? जीवन का यह सारा व्यापार क्यों है ? यह जिज्ञासा, यह प्रश्न प्रत्येक व्यक्ति के मन में, चाहे वह किसी धर्म में पैदा हो, ___ चाहे किसी देश में पैदा हो, उठता है। हम जिज्ञासा को हल करने के दो रास्ते हो सकते हैं। एक रास्ता है फिलासफी या तत्वज्ञान का कि हम सोचें और विचार करें कि हम कौन है, किस लिए हैं और जी वन की पहेली के संबंध में चिंतन के माध्यम से समाधान खोजें। इस भांति जो समाधान खोजा जाएगा, वह बौद्धिक होगा। विचार करके हम निर्णय करेंगे। पश्चिम ने वैसा रास्ता पकड़ा पश्चिम में फिलासफी का जन्म चिंतन के माध्यम से, विचार के माध्यम से, सत्य को जानने की चेष्टा से हुआ। भारत में फिलासफी जैसी कोई चीज पैदा नहीं हुई। जो लोग भारतीय दर्शन को भी फिलासफी कहते हैं, वह नितांत भू ल में हैं। वह शब्द पर्यायवाची नहीं। पश्चिम में उन्होंने सोचा कि विचार के बाहर, हम सत्य के किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे। पिछले ढाई हजार वर्षों में वे किसी नि ष्कर्ष पर नहीं पहुंचे। एक चिंतक दूसरे चिंतक से सहमत नहीं होता। एक चिंतक यु वा अवस्था में जो कहता है, बूढ़ापे में स्वयं ही उसे बदल देता है। आज जो कहा गया, कल वह परिवर्तन हो जाता है। 

            चिंतन शाश्वत और नित्य सत्य पर नहीं ले जा सका। असल में विचार ले ही नहीं जा सकता है। विचार का अर्थ है हम उन बातों के संबंध में सोच रहे हैं जो अननोन हैं, अज्ञात हैं। जैसे मुझे प्रीतिकर लगता है, मैं कहूं, जैसे अंधा प्रकाश के संबंध में विचार करे। तो विचार करेगा क्या? आंख जिसके पास नहीं है, उसके पास प्रकाश के संबंध में विचार करने का कोई उपाय नहीं है। कोई धारणा, कोई केसेप्ट, वह प्रकाश काट नहीं बना सकता। उसका चिंतन सब अंधेरे में टटोलना हो जाएगा। शायद आपको यह खयाल हो कि अंधे को कम से कम अंधेरा तो दीखता होगा। सो च सकता है, अंधेरे के विपरीत जो है, वह सत्य होगा। लेकिन आपको स्मरण दिला ऊं, अंधे को अंधेरा भी दिखता नहीं। अंधे को अंधेरा भी नहीं दीखता है, क्योंकि अं धेरा देखने के लिए भी आंख चाहिए। न अंधे को अंधेरे का पता है, न प्रकाश का प ता। उसे विपरीत का भी पता नहीं है। इसलिए प्रकाश के संबंध में कोई धारणा बन ने की सुविधा उसे नहीं है। जीवन के सत्य के प्रति हम लगभग अंधे हैं। हम जो भी सोचेंगे, जो भी विचार करें गे, वह हमें किसी समाधान पर ले जाने वाला नहीं है। इसलिए भारत के एक बिल कुल नया दृष्टिकोण, एक नया द्वार खोलने की कोशिश की। वह द्वार चिंतन का नह , दर्शन का है। वह फिलासफी का नहीं, दर्शन का है। दर्शन का अर्थ है, हम सत्य को देखना चाहते हैं। विचारना और देखना ये दोनों बहुत अलग बातें हैं। हम सत्य को देखना चाहते हैं।

    - ओशो 

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