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    प्रेम का मंदिर-निर्दोष, सरल - ओशो

    प्रेम का मंदिर-निर्दोष, सरल - ओशो Temple-of-love-innocent-simple-Osho


    सोहन, प्रिय, 

              तेरा पत्र मिला है। और, चित्र भी। उसे देखता हूं-तू कितनी सरल और निर्दोष हो रही है? पूजा और प्रेम का वैसा पवित्र भाव उसमें प्रकट हुआ है ? हृदय प्रेम से पवित्र हो जाता है और मंदिर बन जाता है। इसे तेरे चित्र में प्रत्यक्ष ही देख रहा हूं। प्रभु इस निर्दोष सरलता को निरंतर बढ़ाता चले यही मेरी प्रार्थना है।। २००० वर्ष पहले क्राइस्ट से किसीने पूछा था : “प्रभू के राज्य में प्रवेश के अधिकारी कौन होंगे" उन्होंने एक बालक की और इशारा करके कहा था : “जिनके हृदय वाल कों की भांति सरल हैं।" और, आज तेरे चित्र को देखते-देखते मुझे यह घटना अनायास ही याद हो गई है। माणिक बाबू को प्रेम। बच्चों को आशीष । 

    रजनीश के प्रणाम
    ९-६-१९६५ (दोपहर) प्रति : सुश्री सोहन वाफना, पूना

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