मंगलवार, 8 जून 2021

स्वयं को जन्म देने की प्रसव पीड़ा - ओशो

  

Osho-the-pain-of-childbirth

प्यारे वावूभाई, 

    प्रेम। 

            पत्र पाकर आनंदित हं। आत्मक्रांति का क्षण निकट है। उसके पूर्व प्रसव पीड़ा से भी गूजरना पड़ता है। स्वयं को जन्म देने से बड़ी कोई पीड़ा नहीं है। लेकिन, उसके बाद जीवन का परमानंद भी है। इसलिए, प्यास, प्रार्थना और प्रतीक्षा को ही साधना समझें । शेष शुभ। वहां सबको प्रणाम। 

रजनीश के प्रणाम 

२७-३-१९७० प्रति : वावूभाई (अव स्वामी कृष्ण चैतन्य), संस्कार तीर्थ, आजोल, गुजरात