बुधवार, 24 मार्च 2021

अनासक्ति - ओशो

 

Anasakti - Osho

प्यारी मौनू, 

    प्रेम। 

            अनासक्ति का संबंध वस्तुओं से नहीं, विचार से है। अनासक्ति का संबंध बाह्य से नहीं, अंतस से है। अनासक्ति का संबंध संसार से नहीं, स्वयं से है। एक दिन एक भिखारी किसी सूफी फकीर से मिलने आया और अपने देखा कि फकीर एक सुंदर खेमे में मखमल की गद्दी पर बैठे हैं और खेमे की रस्सियां सोने के खूटों से बंधी हैं। वह बोला : आह! मैं भी कहां आ गया हूं? पीर साहब, मैंने तो आप की अनासक्ति और अध्यात्म की बड़ी प्रशंसा सुनी थी। आप तो एक बड़े वीतराग संत मा ने जाते हैं; लेकिन आपके ये शाही ठाठ देखकर मुझे बहुत अफसोस हुआ है।" सूफी फकीर ने हंसकर उत्तर दिया : मैं आपके साथ अभी सब चीजें छोड़ कर चलने को तैयार हूं। और वे सच ही गद्दी से उठकर फौरन भिखारी के साथ चल दिए। उन्होंने जूते भी नह पहने। लेकिन, थोड़ी देर बाद भिखारी परेशान होकर वोला : “अरे! मैं अपना भिक्षा पात्र तो आपके खेमे में ही छोड़ आया? अब क्या करूं? आप यही रुकें-मैं उसे ले आता हूं।" सूफी फकीर ने हंसते हुए कहा : “मित्र! आपके कटोरे ने अभी तक आपका पीछा नहीं छोड़ा! और मेरे खेमे के सोने के खंटे मेरे सीने में नहीं, जमीन में ही गड़े थे।" संसार में होना आसक्ति नहीं है। संसार का मन में होना आसक्ति है। संसार का मन से वाष्पीभूत हो जाना अनासक्ति है। 



रजनीश के प्रणाम
११-९-१९७० प्रति : सुश्री मौनू (क्रांति), जबलपुर म. प्र.