गुरुवार, 21 जनवरी 2021

मैं-एक स्वप्न-एक निद्रा - ओशो

I--a-dream--a-sleep-Osho


प्यारी कंचन, प्रेम। 

        तेरा पत्र और तेरी जिज्ञासा । मैं जहां है वही वाधा है। इसलिए प्रतिपल-जागते सोते, उठते-उठते-मैं के प्रति सजग वह। वह कहां-कहां और कब-कब उठता है, उसे देख पहचान और स्मरण रख। क्योंकि उसकी पहचान-उसकी प्रत्यभिज्ञा (त्तमववहदपजपवद) ही उसकी मृत्यु है। वह सत्य नहीं है-बस स्वप्न ही है।

        और स्वप्न के प्रति जागने से स्वप्न टूट जाता है। स्वप्न को छोड़ नहीं जा सकता है। जो है ही नहीं-उसे छोड़ने का उपाय ही नहीं है। उसके प्रति तो बस जागना ही पर्याप्त है। अहंकार मनुष्य का स्वप्न है-उसकी निद्रा है। इसलिए जो उसे छोड़ने-त्यागने की चेष्टा में पड़ते हैं वे और भी दूसरे भ्रम में पड़ते हैं। उसकी विनम्रता-निरहंकारिता भी स्वप्न ही होती है। जैसे कोई निद्रा में ही जागने का स्वप्न देख ले। तू उस चक्कर में मत पड़ जाना। बस एक ही ध्यान रख-जाग और पहचान । वहां सबको प्रणाम। 


रजनीश के प्रणाम
१८-७-१९६८ प्रति : सुश्री कंचन बहन, बलसार, गुजरात