शनिवार, 23 जनवरी 2021

चिंताओं का अतिक्रमण - ओशो

 

Encroachment-of-concerns-Osho

मेरे प्रिय, प्रेम। 

        आपका पत्र पाकर अति आनंदित हूं। जीवन में चिंताएं हैं, लेकिन चिंतित होना आवश्यक नहीं है। क्योंकि, चिंतित होना चिंताओं पर नहीं, वर उनके प्रति हमारे दृष्टि कोण (:जजपजन कम) निर्भर है। इसलिए चिंतित व्यक्तित्व सदा ही हमारा चुनाव है। और अचिंतित व्यक्तित्व भी। ऐसा नहीं है कि अचिंतित व्यक्तित्व के लिए चिंताएं नहीं होती हैं। चिंताएं तो होती ही हैं। वे तो जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं। लेकिन वह उन्हीं ओढ़कर नहीं बैठ जाता है। वह सदा ही उनके पार देख पाता है। अंधेरी रात्रियां उसे भी घेरती हैं, लेकिन उसकी दृष्टि सुबह के उगने वाले सूरज पर लगी होती है। इसलिए, उसकी आत्मा कभी भी अंधकार में नहीं डूब पाती है। और बस इतना ही आवश्यक है कि आत्मा अंधकार में न डूबे । शरीर तो डूबेगा ही। वस्तुतः वह तो डूबा ही है। मरणधर्मा का जीवन अंधकार में ही है। आलोक में अमृत के अतिरिक्त और कोई अपनी जड़ें फैलना चाहे तो कैसे फैला सकत | है? गुण को प्रेम। बच्चों को आशीष। सबको प्रणाम। 



रजनीश के प्रणाम
७-१२-१९७० प्रति : श्री ईश्वरभाई शाह, जीवन जागृति केंद्र, बंबई