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    सिद्धार्थ उपनिषद Page 180


    सिद्धार्थ उपनिषद Page 180

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             जितने भी संत, बुद्ध पुरुष हुए सभी ने एक बात कही कि आनंद निराकार में है. लेकिन आकार के साथ क्या किया जाए इसमें बड़ी भिन्नता रही. कृष्ण की पूरी देशना- आनंदित रहो और कर्म करो. भगवान बुद्ध, महावीर ने कहा- निराकार में रहकर आनंदित रहो. बाहर असार है उससे नाता तोडो. गोरखनाथ और पूरे संतमत ने कहा- कि निराकार में आनंद है और बाहर माया है, माया से दूर रहो. सभी संतों में जीसस अपवाद दिखते हैं उन्होंने कहा ठीक है कि निराकार में आनंद है, ओंकार की झंकार है, वर्ड है. पर बाहर जो असहाय लोग हैं उनकी सेवा करो. लेकिन जो असहाय और असमर्थ नहीं हैं उनके साथ क्या करना इस बारे में उनका कोई निर्देशन नहीं है.
    और यह पूरे आध्यात्म का इतिहास है. आकार के साथ क्या करो अलग-अलग दिशा निर्देश हैं. परन्तु आकार का कहीं स्वीकार नहीं दिखाई देता है.

              ऐसे में ओशो का आना हुआ. तो मैं भी उत्सुकता से इंतज़ार कर रहा था कि आकार के बारे में ओशो क्या कहते हैं? निराकार के बारे में तो करीब-करीब मतैक्य है. सभी कहते हैं कि आनंद तो निराकार में है. अब चाहे वो निराकार को शून्यता, आत्मा, अनात्ता और परमात्मा आदि कह रहे हों.

              आकार के बारे में पहली बार ओशो  अद्भुत बात कह रहे हैं; किसी ने पूंछा है कि आपका सन्देश क्या है? ओशो ने कहा- जो सन्देश चंडीदास का है वही मेरा है- "आनंद हमार गोत्र, उत्सव अमार जाति." और फिर समझाया कि आनंद का स्रोत निराकार है. और उत्सव का स्रोत आकार है. ओशो कहते हैं कि आनंद और उत्सव ये तुम्हारे जीवन के दो पंख हो जाने चाहिए. लेकिन आनंद कैसे मिलेगा? उत्सव कैसे मिलेगा? ओशो कहते हैं कि निराकार को इतना प्रेम दो कि आनंद बन जाए. अब तक सारे संत लेने की बात कर रहे थे.

              लेकिन ओशो कहते हैं कि निराकार को इतना प्रेम करो, कि स्वयं को इतना प्रेम दो कि आनंद बन जाए. कह रहे हैं स्वयं को प्रेम करना ध्यान है. स्वयं को प्रेम करने का क्या अर्थ है? "मैं हूँ कौन" ! निराकार. अर्थात अपने निराकार को इतना प्रेम दो कि वो आनंद बन जाए तुम्हारा. और फिर कह रहे हैं उत्सव! उत्सव क्या है? कहते हैं कि आकार को इतना प्रेम दो कि उत्सव बन जाए. और ये है जीवन का पूरा स्वीकार.आज ही मैं एक गजल लिख रहा था-" कि अपने पैर को जितना पसार सकें पसारो , रब चादर तैयार करेगा उसके लिए." ओशो की बात अधूरी समझी गई है; आकार को प्रेम दो यह तो हमने समझा ,परन्तु निराकार को प्रेम दो ये शायद हमने नहीं समझा. लेकिन हमें दोनों को समझना है. फिर ये दोनों पंख बन जायेंगे हमारे. आनंद और उत्सव.


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