मंगलवार, 22 मार्च 2016

सिद्धार्थ उपनिषद Page 180


सिद्धार्थ उपनिषद Page 180

(485)

         जितने भी संत, बुद्ध पुरुष हुए सभी ने एक बात कही कि आनंद निराकार में है. लेकिन आकार के साथ क्या किया जाए इसमें बड़ी भिन्नता रही. कृष्ण की पूरी देशना- आनंदित रहो और कर्म करो. भगवान बुद्ध, महावीर ने कहा- निराकार में रहकर आनंदित रहो. बाहर असार है उससे नाता तोडो. गोरखनाथ और पूरे संतमत ने कहा- कि निराकार में आनंद है और बाहर माया है, माया से दूर रहो. सभी संतों में जीसस अपवाद दिखते हैं उन्होंने कहा ठीक है कि निराकार में आनंद है, ओंकार की झंकार है, वर्ड है. पर बाहर जो असहाय लोग हैं उनकी सेवा करो. लेकिन जो असहाय और असमर्थ नहीं हैं उनके साथ क्या करना इस बारे में उनका कोई निर्देशन नहीं है.
और यह पूरे आध्यात्म का इतिहास है. आकार के साथ क्या करो अलग-अलग दिशा निर्देश हैं. परन्तु आकार का कहीं स्वीकार नहीं दिखाई देता है.

          ऐसे में ओशो का आना हुआ. तो मैं भी उत्सुकता से इंतज़ार कर रहा था कि आकार के बारे में ओशो क्या कहते हैं? निराकार के बारे में तो करीब-करीब मतैक्य है. सभी कहते हैं कि आनंद तो निराकार में है. अब चाहे वो निराकार को शून्यता, आत्मा, अनात्ता और परमात्मा आदि कह रहे हों.

          आकार के बारे में पहली बार ओशो  अद्भुत बात कह रहे हैं; किसी ने पूंछा है कि आपका सन्देश क्या है? ओशो ने कहा- जो सन्देश चंडीदास का है वही मेरा है- "आनंद हमार गोत्र, उत्सव अमार जाति." और फिर समझाया कि आनंद का स्रोत निराकार है. और उत्सव का स्रोत आकार है. ओशो कहते हैं कि आनंद और उत्सव ये तुम्हारे जीवन के दो पंख हो जाने चाहिए. लेकिन आनंद कैसे मिलेगा? उत्सव कैसे मिलेगा? ओशो कहते हैं कि निराकार को इतना प्रेम दो कि आनंद बन जाए. अब तक सारे संत लेने की बात कर रहे थे.

          लेकिन ओशो कहते हैं कि निराकार को इतना प्रेम करो, कि स्वयं को इतना प्रेम दो कि आनंद बन जाए. कह रहे हैं स्वयं को प्रेम करना ध्यान है. स्वयं को प्रेम करने का क्या अर्थ है? "मैं हूँ कौन" ! निराकार. अर्थात अपने निराकार को इतना प्रेम दो कि वो आनंद बन जाए तुम्हारा. और फिर कह रहे हैं उत्सव! उत्सव क्या है? कहते हैं कि आकार को इतना प्रेम दो कि उत्सव बन जाए. और ये है जीवन का पूरा स्वीकार.आज ही मैं एक गजल लिख रहा था-" कि अपने पैर को जितना पसार सकें पसारो , रब चादर तैयार करेगा उसके लिए." ओशो की बात अधूरी समझी गई है; आकार को प्रेम दो यह तो हमने समझा ,परन्तु निराकार को प्रेम दो ये शायद हमने नहीं समझा. लेकिन हमें दोनों को समझना है. फिर ये दोनों पंख बन जायेंगे हमारे. आनंद और उत्सव.


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सोमवार, 21 मार्च 2016

सिद्धार्थ उपनिषद Page 179

सिद्धार्थ उपनिषद Page 179


(483)

सांख्य योग कहता है कि देह से तादात्म्य तोड़ो; चैतन्य से तादात्म्य जोड़ो. अष्टावक्र, जनक, महर्षि रमण, जे. कृष्णमूर्ति सांख्य योगी हैं. वे कहते हैं इसके लिए  जागना काफी है, साधना की जरुरत नहीं. मगर निराकार जाने बिना जागरण या चैतन्य  का बोध कैसे होगा? और बिना साधना के कोई निराकार कैसे जानेगा ?

(484)

संबोधि के पांच सोपान हैं-: आत्म ज्ञान, अद्वैत ज्ञान, कैवल्य ज्ञान, निर्वाण ज्ञान और परम पद.

आत्मज्ञान-: आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को आत्मा के रूप में जानना और उससे तादात्म्य महसूस करना. यह चेतन अंतराकाश ही हमारी आत्मा है. मैं चैतन्य आत्मा हूँ. यही आत्मज्ञान है. यही आत्मबोध है. यही संबोधि है. संबोधि का पहला सोपान यही है.

अद्वैत ज्ञान-: अद्वैत ज्ञान की घोषणा है- "सोऽहं". यह स्वयं के अद्वैत की घोषणा है. मेरा कंटेंट, मेरी आत्मा उस परम कंटेनर  अर्थात  परमात्मा का हिस्सा है. बस तू ही तू है. मैं  न बचा. बूँद सागर में गिर गई. तू ही तू बच गया. परमात्मा ही परमात्मा. बूँद सागर में गिर गई. बूँद तो रही नहीं, मिट गई.

कैवल्य ज्ञान-: कैवल्य ज्ञान की घोषणा है-" अहं ब्रह्मास्मि".  कैवल्य का अर्थ है- ऐसा क्षण आ जाये चेतना के आकाश में पूर्णतः अकेला रह जाऊं, लेकिन मुझे अकेलापन न लगे. एकाकार हो जाऊं, फिर भी मुझे दूसरे की अनुपस्थिति पता न चले. इस भांति हो जाऊं कि मेरे होने में ही सब समा जाए. मेरा होना ही पूर्ण हो जाए.

निर्वाण ज्ञान-: निर्वाण ज्ञान की घोषणा है-"हरि ओम् तत्सत" अर्थात ओंकार स्वरुप गोविन्द ही सत्य है. जैसे फैलता हुआ महानगर एक गांव को अपने में समेटकर विराट कर देता है; वैसे ही असीम परमात्मा, आत्मा को स्वयं में मिलाकर विराट कर लेता है. ज्ञान मात्र ही शेष रह जाता है. न ज्ञाता बचता है, न ज्ञेय . न बूँद न सागर, केवल भगवत्ता.

परम पद-: परम पद की घोषणा है-"ईशावास्यमिदं सर्वम्". आध्यात्मिक यात्रा की दिशा तो है, लेकिन कोई मंजिल नहीं है. इस यात्रा में कई पड़ाव आते हैं. आखिरी पड़ाव परम पद है. जिसका अर्थ है परम विश्राम. जिसमें हम परमात्मा को "अचलपुरुष" के रूप में जानते हैं. अचलपुरुष के सुमिरन में जीना ही परमपद है .

आत्म ज्ञान जिसे हम ओशोधारा के 9 वें तल के कार्यक्रम में जानते है. अद्वैत ज्ञान को हम ओशोधारा के 12 वें तल के कार्यक्रम में जानते हैं. कैवल्य ज्ञान को हम ओशोधारा के 13 वें तल के कार्यक्रम में जानते हैं. निर्वाण ज्ञान को हम ओशोधारा के 14 वें तल के कार्यक्रम में जानते हैं. परम पद ज्ञान को हम ओशोधारा के 26 वें तल के कार्यक्रम में जानते हैं.


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सिद्धार्थ उपनिषद Page 178

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(480)

नाद गाड़ी है, संयम (धारणा, ध्यान, समाधी, होश, सुरति, सुमिरन) मार्ग है, गुरु द्वारा निर्धारित कार्यक्रम (ओशोधारा में २८ संबोधि कार्यक्रम) मील के पत्थर हैं, चेतन आकाश मंजिल है और आनंद साध्य है.
         

(481)

विपस्सना का अर्थ है भीतर देखना, भीतर के प्रति जागना. पतंजलि जिसे प्रत्याहार कहते हैं, उसी को बुद्ध विपस्सना कह रहे हैं. विपस्सना ३ प्रकार का होता है- अनापानसती योग, विचारसती योग और भावसती योग.
अनापानसती योग में सांस के प्रति, विचारसती योग में विचार के प्रति और भावसती योग में भाव के प्रति जागना होता है.
           

(482)

मन के द्वारा मंत्र दोहराना जाप है. सांस के द्वारा मंत्र दोहराना अजपा है.
अजपा ४ प्रकार का है.
१. सांस की आवाज "सोऽहं" अथवा "ओम् हूं" के रूप में सुनना .
२. सांस के द्वारा मंत्र जाप; उदाहरण के लिए श्वास  अर्थात भीतर आती सांस के द्वारा "ओम्" और प्रश्वास के साथ "हूं" का जाप.
३. नाद श्रवण करते हुए सांसों के द्वारा मंत्र जाप; उदाहरण के लिए नाद सुनते हुए श्वास के  द्वारा "ओम्" और नाद सुनते  हुए प्रश्वास के द्वारा "हूं" का जाप.
४. दाहिने कान से नाद श्रवण करते हुए सांसों के द्वारा मंत्र जाप; उदाहरण के लिए दाहिने कान से नाद सुनते हुए श्वास द्वारा "ओम्" और दाहिने कान से नाद सुनते हुए प्रश्वास के द्वारा "हूं" का जाप.


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