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    सिद्धार्थ उपनिषद Page 160

    सिद्धार्थ उपनिषद Page 160

    (446)                

    तुम कोई भी साधना करो प्रभु की उसका रिस्पांस खुमारी है . खुमारी का मतलब भांग खाए हुए . सिर घूमने लगे तो समझना परमात्मा रिस्पांस दे रहा है . तुम कोई भी साधना करो यदि नशा सा अनुभव हो तो समझ लेना अब तार जुड़ गया . तुम समाधि करो , सुमिरन करो , ध्यान करो , चैतन्य की , साक्षी कि साधना करो , यदि तुम्हारी साधना स्वीकार हो गई है तो तुम्हें नशा सा होने लगेगा . इसीलिए नानक जी कहते हैं-- " नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन-रात . "

    (447)

     मै जब संन्यास लेने पूना गया तो मेरे सारे मित्रों ने ११ तारीख को संन्यास लेना तय किया ओर ११ मई को उन्होंने संन्यास ले लिया . पर मैं अड़ गया . मैंने कहा कि मैं ओशो से ही माला दीक्षा लूंगा . वहां बिहार के आनंद मैत्रेय थे जो बिहार के लोगो को ज्यादा प्यार करते थे . उन्होंने मुझे बहुत समझाया कि चूकोगे तुम  ओशो नहीं चूकेंगे . उनके पास तो लाखो लोग हैं . तुम नहीं लोगो तो उनको क्या फर्क पड़ेगा . उनका फूल तो खिल गया है . आनंद मैत्रेय से मैं नहीं समझा . ओशो की किताबें पढ़ -पढ़ कर तर्क करना तो खूब आ ही गया था . मैंने उनसे कहा- जिस गुरु को माला देने की फुर्सत नहीं है वो गाइडेंस क्या देगा ? आनंद मैत्रेय ने कहा मैं तर्क से तुमसे हार गया . लेकिन इससे तुम्हारा कोई कल्याण नहीं हो रहा है , लेकिन फिर भी तुमसे इतना कहूँगा चूकोगे तुम . वहां  एक मुक्ता  मां थी . उसने मुझे गजब की बात कही : उसने मुझसे कहा ये ओशो की व्यवस्था है ओशो कोअगर आप गुरु रूप में स्वीकार करना चाहते हैं तोओशो की व्यवस्था को भी आपको स्वीकार करना पड़ेगा . ओशो के प्रति आपके मन में प्रेम है , सम्मान है , और उनकी व्यवस्था के प्रति नहीं है . इसका मतलब ओशो के प्रति भी आपके मन में पूरा सम्मान नहीं है इस बात को ठीक से सोचना तुम , कहीं यह तुम्हारा अहंकार तो नहीं है . मैंने कहा मां तू बिलकुल ठीक कहती है और फिर मैंने संन्यास ले लिया .


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