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    सिद्धार्थ उपनिषद Page 156

    सिद्धार्थ उपनिषद Page 156

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    सच्चे धर्म का अर्थ होता है जो अनुभव पर आधारित हो . तुम्हारे अपने अनुभव पर आधारित हो . और झूठा धर्म क्या होता है ? जो किताब पढ़ करके , परंपरा से , मान्यता पर आधारित हो . जैसे निरंकारी है वो कहते हैं ये आकाश परमात्मा है , जानते नही हैं . अब तुमने बिना जाने मान लिया कि आकाश परमात्मा है तो ये तुम्हारे लिए झूठा धर्म है . लेकिन अगर अनुभव तुम्हारा हो जाए आकाश की जीवंतता का ... ओशो कहते हैं-- " जिसने आकाश की जीवंतता को जाना उसने परमात्मा को पहचाना . "
         
    मेरे लिए शिव जी सत्य हैं याद रखना , तुम्हारे लिए शिव जी सत्य नहीं हैं . तुम मान  करके शिव जी की पूजा कर रहे हो तो तुम्हारा धर्म सच्चा धर्म नहीं है . मैं जान करके शिव जी की पूजा कर रहा हूं . तो मेरे लिए यह सच्चा धर्म है . मुझे पता है कि मैं जब भी पुकारूंगा वे आयेंगे , आना पड़ेगा . तो मेरे लिए उनका अस्तिव सच्चा है . लेकिन तुम्हारे लिए सच्चा नहीं है . हां ! तुम भी हमारे साथ चलो  तो तुम भी उनकी उपस्थिति को रिलाइज करोगे और फिर तुम्हारे लिए भी शिव जी , विष्णु जी , सब , सच्चे हो जायेंगे . क्योंकि सबका अस्तित्व है . तो एक शब्द में मैं कहना चाहूँगा : अनुभव पर आधारित तुम अगर कुछ पूजा-पाठ , साधना कर रहे हो तो वह सच्चा धर्म है . और मान्यता पर , किसी से सुना है इसलिए पूजा , साधना कर रहे हो तो ये झूठा धर्म है . असली बात है अनुभव करो . एक सूफी शायर कहता है -- "  नाम ही नाम ले लिया , जानते उसे वाकई नहीं . कहते हो बस खुदा-खुदा , देखा उसे कभी नहीं .
                                                 

    ऐसे खुदा की बंदगी कुफ़्र है  बंदगी नहीं , खाली जो गुजरे एक नफ़स , मौत है जिंदगी नहीं . "

    बिना खुदा को याद किये एक सांस भी ले रहे हो तो तुम अधर्म में जी रहे हो . बिना जाने मान्यता पर टिकी भक्ति मोह है . जानों और फिर उसके प्रेम में पडो .


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