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    सिद्धार्थ उपनिषद Page 151

    सिद्धार्थ उपनिषद Page 151

    (436)

    सद्गुरु कौन है पहले इसको समझो - " गुरु-गुरु एको , भेख अनेक . " गुरु केवल एक है - परमात्मा . और वही किसी देहधारी गुरु के माध्यम से काम करता है .  इसलिए गुरुओं का गुरु एक है-- परमात्मा . लेकिन वह गुरुसत्ता किसी न किसी व्यक्ति के माध्यम से काम करती है . तो ऐसा लगता है कि गुरु एक व्यक्ति है . लेकिन गुरु व्यक्ति नहीं है , गुरु के भीतर गोविन्द  काम करता है स्वयं . लोग समझते हैं अलग-अलग गुरु होते हैं . अलग-अलग गुरु नहीं होते हैं गुरु एक ही होता है : कभी वह ओशो के माध्यम से काम करता है , कभी कबीर के माध्यम से , कभी दादू के माध्यम से , कभी मोहम्मद के माध्यम से , कभी कृष्ण के माध्यम से , है तो एक ही सत्ता जो विभिन्न रूपों में प्रगट होती है .

    (437)

    मैं जितना दे रहा हूं तुम लेने में असमर्थ हो क्योंकि तुम्हारी झोली बहुत छोटी है . संत देना चाहता है लेकिन लोग लेने को राजी नहीं हैं आश्चर्य की बात है ! बड़े आश्चर्य की बात है !!!
         
    राजगीर में गौतम बुद्ध का एक वक्तव्य लिखा है-- " यह जानते हुए भी कि कोई मुझे सुनने को तैयार नहीं है , फिर भी इस पर्वत पर नियमित रूप से मैं प्रतिदिन बोले चला जाता हूं . "
       
    उनकी करुणा देखते हो , क्या संतों की करुणा है ! कबीर साहब कहते हैं- " तेरा जन एकाध है कोई , काम , क्रोध , मद , लोभ ,विवर्जित हरि को सुमिरे सोइ . " हे गोविन्द मैंने देख लिया तेरे बंदे हैं ही नहीं : कोई एक भी आधा है वो भी पूरा नहीं है . फिर भी संतों की करुणा वे दिए चले जाते हैं , हर युग में ऐसा होता है . परमात्मा के खरीदार नहीं हैं , लोग छोटी-छोटी बातों में उलझे हुए हैं . किसी को परमात्मा नहीं चाहिए उनकी प्रथम प्रियारिटी कुछ और है . लेकिन संत हैं करुणावश ; क्योंकि उन्होंने स्वाद ले लिया है इसलिए वे अपने आनंद को बाटना चाहते  हैं . लेकिन कोई लेने वाला नहीं है . जैसे  लोगो की उदासीनता अपार है , वैसे ही संतों की करुणा अपार है .


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