रविवार, 26 जनवरी 2014

सिद्धार्थ उपनिषद Page 80


सिद्धार्थ उपनिषद Page 80


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 गुरु के प्रति जो उत्तरदायित्व है, वो गोविन्द के प्रति उत्तरदायित्व है. और उत्तरदायित्व ये है कि गोविन्द की इस दुनियां को हम और बेहतर कैसे बना लें. कैसे और अधिक मंगलमय बना दें.
गुरु कर क्या रहा है ? संसार को मंगलमय बनाने में लगा हुआ है. संसार के लोगों की जिंदगी को और मंगलमय बनाने में लगा है. " तरुवर, सरुवर, संतजन और बरसत मेघ " जो वृक्ष होता है, जो सरोवर होता है, जो सदगुरु होता है और जो बरसता मेघ होता है. " परमारथ के कारने चारों धरिया देह " ये चारों शरीर धारण करते हैं सिर्फ मंगल करने के लिए, परमार्थ करने के लिए. और गुरु के प्रति दायित्व ये है,कि उस परमार्थ के कार्य में तुम सहयोग करो.

तुम कहते हो कि हमारी हैसियत क्या है ? एक गिलहरी की कहानी तुमको पता है. राम सेतु बना रहे थे. गिलहरी पहुंची उसने कहा हम भी सेतु बनाने में योगदान करना चाहते हैं. नल चीफ इंजीनियर थे,उनका छोटा भाई नील डिप्टी चीफ इंजीनियर था. उसने कहा भाग यहाँ से बड़े-बड़े जामवान, हनुमान पहाड़ ला रहे हैं. ये गिलहरी ! गिलहरी ने कहा अपने बॉस से भी पूंछ के देखो उनको हमारा सहयोग चाहिए की नहीं. नल-नील दोनों भाई राम के पास गए कहा कि ये गिलहरी जिद्द कर रही है, कि सेतु बाँधने में वो भी कुछ सहयोग करेगी. राम ने कहा तुम लोग क्या कहते हो? नल बोले वो रात-दिन एक भी कर दे तो एक दिन में एक किलो से ज्यादा पत्थर नहीं रख सकती है. बल्कि बीच में वो चलेंगे तो हम लोग को बचाकर चलने में दिक्कत होगी. वो बाधा ही बनेंगी.
भगवान राम ने कहा - क्वांटिटी का सवाल नहीं है, सवाल उसके भाव का है. मैं चाहता हूं कि उसका सहयोग लिया जाए.


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