सोमवार, 30 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 70

            

सिद्धार्थ उपनिषद Page 70


(263)


भय मुक्त होने का एक ही तरीका है. कि जान लो 'मैं आत्मा हूँ'. जब तक अपना असली चेहरा, पहचान तुमको नहीं मालूम, असली स्वरुप तुमको नहीं मालूम. तब तक भय में जिओगे. जिस दिन जान लोगे मैं आत्मा हूँ, तब तुम भी कृष्ण कि तरह कह सकोगे - ' नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः .
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः '
मुझे शस्त्र काट नहीं सकते. आग जला नहीं सकती. जल सड़ा नहीं सकता है. हवा सुखा नहीं सकती.
तो जब तक ' मैं आत्मा हूँ '  इसको नहीं जानोगे तब तक डरोगे. मन के तल पर... जब तक लहरों के तल पर जी रहे हो, तब तक कंपोगे. जिस दिन जान लोगो मैं  लहर नहीं मैं  तो समुद्र हूँ. समुद्र में कहाँ लहर होती है. समुद्र तो शांत, प्रगल, गंभीर होता है.

(264)


इसलिए तुम संतों को देखोगे कुछ भी हो जाये वो कंपते नहीं. जापान में भूकंप आ गया. एक झेन फकीर बैठा हुआ था. बाकी सब लोग तो भागे. जैसे यहीं भूकंप आ जाए, तो तुम क्या सोचते हो बैठे रहोगे मेरा प्रवचन सुनने के लिए. सब इधर भागोगे, उधर भागोगे. कोई चिंता भी नहीं करेगा कि जरा देखे तो सही गुरु जी भी बैठे हैं.
ऐसे ही सारे शिष्य भाग खड़े हुए. झेन फकीर बैठा रहा और हँसता रहा. भूकंप विदा हुआ, शिष्य वापस आये और बोले- गुरुदेव आप कहीं नहीं गए, हम तो भागे. फकीर बोला मैं भी भागा. तुम बाहर भागे, मैं भीतर भागा. वहाँ भागा जहाँ भूकंप का प्रवेश नहीं होता है.

(265)


तो निश्चित रूप से जब तक तुम ऊपर-ऊपर जिओगे; शरीर के तल पर, मन के तल पर, ह्रदय के तल पर, प्राण के तल पर. तब तक डरोगे. जिस दिन जुड जाओगे ,  प्रज्ज्वलित;  कभी-कभी कवि भी ऋषि की तरह बात करता है.

दिनकर कहते हैं - 'प्रज्ज्वलित प्राण हो जाओ.' क्या है प्रज्ज्वलित प्राण ?  एक मोमबत्ती जलाना. शुरू में  मोमबत्ती की लौ बड़ी होगी. धीरे-धीरे देखोगे वह छोटी हो जायेगी. फिर अपने स्रोत से जुडेगी और दूसरी बार जब वह लहरेगी तो अब उसमें कंपन नहीं होगा. उसको कहते हैं प्रज्ज्वलित प्राण. 
ऐसे ही जब तुम आत्मा के स्रोत से जुड़कर जिंदगी को जीते हो तो उसको कहते है प्रज्ज्वलित प्राण. उस दिन के बाद कोई भय नहीं होता है.

लेकिन जब तक तुम ऐसे ही बाती अपनी जला रहे हो, तब तक भय में जिओगे . क्योंकि तुम जानते हो बाती कब तक जलेगी बुझ जायेगी. अब बुझी की तब बुझी. जब तक बुझने की संभावना है, तब तक डरोगे. जिस दिन प्रज्ज्वलित प्राण हो जाओगे, उस दिन जानोगे मैं बुझने वाला नहीं. उस दिन तुम निर्भय हो जाते हो.


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