सोमवार, 30 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 69

        

सिद्धार्थ उपनिषद Page 69


(261)


संकल्प शक्ति अवचेतन की शक्ति है. मन जो सदा विचार करता है और द्वैत में रहता है. करें कि नहीं करें, यह ठीक है यह गलत है. जो सदा दो extreme पर सोचता है.  जानना तब तक मन काम कर रहा है.
जैसे ही ह्रदय के तल पर उतरते हो, सबकांशस के तल पर उतरते हो या तुम जब किसी के प्रेम में पड़ जाते हो. तो वहाँ सबकांशस (ह्रदय) काम करता है. इसलिए कोई समझदार व्यक्ति क्यों प्रेम में पडेगा. क्योंकि प्रेम में दुःख ही दुःख है. पड़ने के बाद ये भी देखता है, कि ये कहाँ फंस गए.  एक शायर कहता है -

" चाँद सा हुश्न है तो गगन में बसे, फूल सा रंग है तो चमन में हंसे.
   चैन चोरी न कोई हमारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे.
   एक दिन क्या मिले मन उड़ा ले गए, मुफ्त में उम्र भर की जलन दे गए.
   बात हमसे न कोई दुबारा करे, मन दुबारा-तिबारा पुकारा करे."  

अच्छे खासे थे ये कहाँ की झंझट मोल ले ली. लेकिन कितना भी मन को समझाओ वह राजी नहीं होता. क्योंकि प्रेम  सबकांशस के तल पर होता है. और सबकांशस  में एक ही विचार होता है, वहाँ दो नहीं होता है.

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सम्मोहन-प्रज्ञा कार्यक्रम में हम तुम्हें सबकांशस से जोड़ने की कला बता देते हैं. अब सबकांशस में कोई विचार डाल  दो तो उसका नाम संकल्प है, उसका नाम संकल्पना है. वहाँ एक ही होता है, दो नहीं.
गाँधी जी ने सकल्प ले लिया इस देश को आजाद करना है. अब वहाँ द्वैत नहीं है उनके मन में. बस उस मार्ग पर चल रहे हैं. तो जब एक विचार हो जाये तो उसका नाम संकल्प है. और जब तक दो विचार हों तो वह विचार है, वह मन है. मन में हमेशा दो होता है, सकल्प में हमेशा एक होता है. विचार एक हो जाये तो उसका नाम संकल्प है. और विचार जब दो हो जाये तो वह चित्त है.  सबकांशस (ह्रदय) के तल पर संकल्प होता है जबकि मन के तल पर द्वैत होता है, द्वन्द होता है, विचार होता है, संशय होता है. सारा खुरापात मन के तल पर होता है. और सारा सार कह लो, अद्वैत कह लो, एक का भाव कह लो; वह हृदयके तल पर होता है. उसी का नाम संकल्प है.


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