शनिवार, 28 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 58

 

सिद्धार्थ उपनिषद Page 58


(222)

नाद का स्रोत आकाश है. वह बाहर-भीतर सर्वत्र गूंज रहा है - बहिराकाश में भी, अंतराकाश में भी. उसे हमारे कान नहीं सुनते, हमारी चेतना सुनती है. जो नाद हम सुनते हैं, वह मुख्यतः बाहर के आकाश में गूंज रहा है. फिर कान बंद करने पर ध्वनि की तीव्रता बढ़ क्यों जाती है ? ऐसा बाहर की भौतिक ध्वनियों के अवरुद्ध हो जाने के कारण होता है. 

     
(223)

बाएं तरफ गूंजता हुआ अनाहत नाद दूर से आता हुआ सुनाई देता है और कम मधुर होता है, जब कि दायें तरफ से आता हुआ नाद पास से आता हुआ सुनाई देता है और ज्यादा मधुर होता है.

(224)

हमारी दाहिनी आँख और दाहिना कान सहस्रार से जुड़ा है, इसलिए दाहिने कान की तरफ ध्यान देने से हम सहस्रार से जुड जाते हैं और  मधुर ध्वनि सुनना शुरू कर देते हैं.

(225)

अनाहत नाद तो एकरस है, लेकिन हमारी चेतना उसे वैसे ही सात भागों में बांट देती है, जैसे रंगहीन प्रकाश को प्रिज्म सात भागों में बांट देता है. इसलिए नाद की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि हमारी चेतना उसे कहाँ से सुन रही है. नाद की गुणवत्ता श्रेष्ठतम तब होती है, जब हमारी चेतना सहस्रार पर थिर होकर उसे  सुनती है.

            (226)

आकार का स्मरण संसार है. निराकार के प्रति जागरण ध्यान है. निराकार का स्मरण योग है. ओंकार का स्मरण सुमिरन है. निराकार और आकार का एक साथ स्मरण साक्षी है. निराकार में डूबना समाधि है.



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