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    सिद्धार्थ उपनिषद Page 57


       सिद्धार्थ उपनिषद Page 57        


     (218)


    प्रेम अथवा भक्ति साधना का सातवां सोपान है. भक्ति का अर्थ है गोविन्द के साथ जीवन की सहभागिता का मजा लेना. भक्ति रिक्तता से मुक्त करती है. इसकी उपलब्धि उत्सव है. जीवन एक रास हो जाता है. प्रेम की मंजिल गोविन्द है, नित्य प्रेम है, अथवा मंजिल है ही नहीं, क्योंकि हमें गोविन्द तक जाना नहीं होता, बल्कि स्वयं गोविन्द हमारे पास आ जाता है. हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है. गुरु रामदास की तरह हम गा उठते हैं- ' वडा मेरा गोबिंदु अगम अगोचर आदि निरंजनु निरंकारु जीउ. ता की गति कहीं न जाई अमिति वडिआई मेरा गोबिंद अलख अपार जीउ.'

    (219)


    जून, 2013 में उत्तराखंड में आई प्रलयंकारी बाढ़ में सैकड़ों स्थानों पर भूस्खलन हुआ. हजारों लोगो की जान गई. लाखों मकान ध्वस्त हो गए. करोड़ों की संपत्ति बरबाद हो गई. केदारनाथ में सर्वाधिक नुकसान हुआ, लेकिन मंदिर कों कोई नुकसान नहीं हुआ. क्या यह संयोग मात्र है ? वस्तुतः प्रकृति के नियंत्रण के लिए दैविक शक्तियां नियुक्त हैं, जिनकी स्वीकृति से सब कुछ घटित होता है.

    (220)


    दैवी कोप एवं प्राकृतिक विपदा से बचने के लिए हमें अपनी सोच बदलनी होगी. पर्यावरण का ख्याल रखते हुए निर्माण करना होगा. स्वच्छता और कुशलता की संस्कृति अपना कर ही हम अपनी रक्षा कर सकते हैं.

    (221)


    कामना और प्रार्थना में भेद है. यदि 90 प्रतिशत अपेक्षा और 10 प्रतिशत अहोभाव है, तो वह कामना है. यदि 90 प्रतिशत अहोभाव और 10 प्रतिशत अपेक्षा है, तो वह प्रार्थना है.


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