बुधवार, 25 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 55


                    

सिद्धार्थ उपनिषद Page 55


(211)


हम सभी परमात्मा को प्रेम करते हैं. ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो परमात्मा को प्रेम नहीं करता. यह इस बात से पता चलता है कि जब भी हम किसी विपत्ति में पड़ते हैं, अपने निकट के सम्बन्धी या मित्रों के भी पहले हम परमात्मा कों याद करते हैं. इसलिए परमात्मा के लिए प्रेम पैदा नहीं करना है, केवल डिस्कवर करना है. बोना नहीं है, केवल सिंचन करना है. कबीर साहब कहते हैं- ' दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय. सुख में सुमिरन जो करे, तो दुःख काहे को होय..' सुख में सुमिरन करना ही भक्ति है.

(212)


साधना का पहला सोपान है ध्यान. निराकार के प्रति सतत जागरूकता ध्यान है. ध्यान के द्वारा हम अहंकार से मुक्त हो सकते हैं. ध्यान की उपलब्धि मौन है और उसकी मंजिल है साक्षी.

(213)


साक्षी साधना का दूसरा सोपान है. साक्षी का अर्थ है अपने निराकार स्वरूप का बोध रखते हुए कर्म करने का मजा लेना. साक्षी के द्वारा हम षट् रिपुओं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष से मुक्त हो सकते हैं. साक्षी की उपलब्धि मोक्ष है और मंजिल तथाता है.

(214)


तथाता साधना का तीसरा सोपान है. तथाता का अर्थ है अपने अंतराकाश में, आत्मबोध में, सब्जेक्टिव अवेयरनेस में थिर होना. तथाता के द्वारा हम शिकायत भाव से मुक्त हो सकते हैं. तथाता की उपलब्धि है स्वीकार भाव और मंजिल है समाधि.


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