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    सिद्धार्थ उपनिषद Page 41


     सिद्धार्थ उपनिषद Page 41                                             


    (155)


    जीवन वृक्ष की तरह है. वृक्ष की जड़े पाताल की गहराइयों में जीती हैं. उसकी डालियां आकाश की ऊंचाइयों में बढती हैं. उसके तने धरती के समानांतर फैलते हैं. ऐसे ही जीवन की जड़ शरीर के भीतर आत्मा में है. उसकी वृद्धि ब्रह्म से व्याप्त आकाश में है. उसका फैलाव संसार में है. कहीं से सिकुड़े, तो जीवन वृक्ष सिकुड़ जाता है.

    (156)


    ध्यान और समाधि हमें आत्मा में थिर करते हैं. सुमिरन हमें ब्रह्म में विकसित करता है. कर्म हमें संसार में प्रतिष्ठित करता है. ब्रह्मानंद, आत्मानंद और कर्मानंद तीनों से जीवन पूर्णता को प्राप्त करता है.

    (157)


    जीवन एक मंदिर की तरह है. आत्मा प्रज्ज्वलित दीप की तरह है. ब्रह्म मंदिर की दीवारों की तरह है. संसार मंदिर की चहल-पहल है. जैसे मंदिर की दीवारें दीपक की लौ को हवाओं से बचाती है, ऐसे ही ब्रह्म के सुमिरन से हमारी चेतना निष्कंप होकर प्रज्ज्वलित रहती है.

    (158)


    जगत हमारी प्रतिध्वनि है. जो दोगे, वही मिलेगा. इसलिए वही पाने की आशा करो, जो तुम दूसरों को दे रहे हो. सम्मान दोगे, सम्मान मिलेगा. अपमान दोगे, अपमान मिलेगा. प्रशंसा दोगे, प्रशंसा मिलेगी. निंदा दोगे, निंदा मिलेगी. प्रेम दोगे, प्रेम मिलेगा. नफरत दोगे, नफरत मिलेगी. क्षमा दोगे, क्षमा मिलेगी. द्वेष दोगे, द्वेष मिलेगा. ' बैर से बैर शांत नहीं होता. ' उपहार दोगे, उपहार मिलेगा. तिरस्कार दोगे, तिरस्कार मिलेगा. स्वतंत्रता दोगे, स्वतंत्रता मिलेगी. परतंत्रता दोगे, परतंत्रता मिलेगी. सॉरी कहोगे, सॉरी सुनने मिलेगा. थैंक्यू कहोगे, थैंक्यू सुनने मिलेगा. शिकायत में रहोगे, शिकायत मिलेगी. अहोभाव में रहोगे, अहोभाव मिलेगा.


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