रविवार, 22 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 34


                           

सिद्धार्थ उपनिषद Page 34


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संसारी संसार में उलझ जाता है, भक्त भगवान में उलझ जाता है, संत कहीं नहीं उलझता. उसकी जिंदगी सुलझी होती है. उसके लिए संसार और भगवान का भेद मिट जाता है. वह अद्वैत में जीता है. क्या बाहर, क्या भीतर, वह सदा मस्त रहता है.

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अध्यात्म के मुख्य दो आयाम हैं -'सगुण और निर्गुण. सगुण में विभिन्न अवतार- ब्रह्मा-विष्णु-शिव,गणेश , इंद्र आदि देवताओं की आराधना का प्रावधान है. निर्गुण में निराकार, ओंकार, घटाकाश, महाकाश, सह्जकाश की आराधना है. सगुण में पूजा है, यज्ञ है, आरती है, मूर्ति है, तीरथ है, व्रत है, अनुष्ठान है,मन्त्र है, गौडी भक्ति है, वर्णात्मक नाम का सुमिरन है. निर्गुण में ध्यान है, समाधि है, परा भक्ति है, सतनाम सुमिरन है. सनातन धर्म में निर्गुण और सगुण दोनों का मणिकांचन समन्वय है. धर्म के प्रति  यही समग्र दृष्टी भी है.

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साधना का आरम्भ ध्यान से है, समाधि मध्य में है और सुमिरन शिखर है. ध्यान अर्थात निराकार के प्रति जागना. समाधि अर्थात अंतराकाश के प्रति जागना. सुमिरन अर्थात ओंकार के प्रति जागना.

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आत्मा से जुडना ज्ञान है. परमात्मा अर्थात हुकमी से जुडना भक्ति है. हुकमी और हुकम (ऋत, ताओ, परम नियम) दोनों से जुडकर जीना संतत्व है.


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