रविवार, 22 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 33


                       

सिद्धार्थ उपनिषद Page 33


(133)


राग के दो आयाम है -'प्रेम और मोह. प्रेम सिकुड़ता है तो मोह बन जाता है. मोह कर्म बंध बनाता है, प्रेम मुक्त करता है. मोह से मुक्ति के दो ही उपाय हैं -'निवृत्ति और प्रवृत्ति. निवृत्ति अर्थात छोड़ते-छोड़ते वहाँ पहुँच जाओ, जहाँ छोड़ने को कुछ बाक़ी न बचे. आत्मा ही बच जाए, जिसे छोड़ने का कोई उपाय नहीं. प्रवृत्ति अर्थात सम्मिलित करते चलो, जब तक सम्मिलित करने को कुछ भी न बचे, परमात्मा भी नहीं. बेहतर तो यह होगा कि संवृत्ति मार्ग अपनाओ, जिसमें प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों संयुक्त हों. आती सांस में प्रवृत्ति और जाती सांस में निवृत्ति. यही ओशो का मार्ग है. यही ओशोधारा का मार्ग है -आती सांस में हरि-स्मरण, जाती सांस में आत्म-स्मरण.

(134) 


अस्तित्व बलि प्रथा नहीं स्वीकार करता. भारत, विशेषकर राजस्थान के राजे-रजवाड़े, बलि प्रथा के पोषक थे. इसलिए आश्चर्य नहीं कि भारत एक हजार साल तक गुलाम रहा. चीन के हाथों तिब्बत की दुर्दशा भी वहाँ व्याप्त बलि प्रथा के कारण हुई. नेपाल में राजवंश का नाश और बाद में खात्मा बलि प्रथा के कारण हुआ. नेपाल की वर्तमान जनतांत्रिक सरकार यदि धर्म के नाम पर चल रही बलि प्रथा को नहीं रोकती, तो नेपाल के उज्जवल भविष्य की आशा नहीं की जा सकती .


(135)


क्रोध और दुःख एक ही सिक्के के, शिकायत के, दो पहलू हैं. शिकायत की अभिव्यक्ति क्रोध है और उसका दमन दुःख है और तीनों ही परकेंद्रित हैं. तीनों से मुक्त होने के लिए गौतम बुद्ध ने बड़ा प्यारा सूत्र दिया है -
'न परेसं विलोमानि, न परेसं कताकतं.
 अतनो व अवेखेयो कतानि अकतानि च..'
अर्थात दूसरे का दोष मत देखो. दूसरे के कृत्य-अकृत्य का विचार मत करो. मनुष्य को चाहिए कि वह केवल यह सोचे की परिस्थिति विशेष में उसके लिए क्या विकल्प है और वही करे.


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