रविवार, 22 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 35



सिद्धार्थ उपनिषद Page 35                          


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धर्म के तीन आयाम हैं- जीवन, महाजीवन और परम जीवन. जन्म से लेकर मृत्यु तक की यात्रा जीवन है. कई जन्मों की श्रृंखला महाजीवन है. परमात्मा से जुडकर जीना परमजीवन है. महाजीवन का रहस्य जाने बिना धर्म का समग्र ज्ञान होना असंभव है. इसलिए महाजीवन के क्षेत्र में पश्चिमी सम्मोहनविदों की खोज धार्मिक दृष्टी से अत्यंत महत्वपूर्ण है. विशेषकर माईकल न्यूटन की खोज चौकाने  वाली है. उनकी तीन पुस्तकें- जर्नी ऑफ सोल, डेस्टिनी ऑफ सोल और लाइफ बिटवीन लाइव्स पराजीवन के क्षेत्र में क्रन्तिकारी दृष्टी प्रस्तुत करती हैं. आश्चर्य तो यह है कि उनकी खोज ईसाई और इस्लाम धर्म की एक जन्म की मान्यता को ख़ारिज कर सनातन धर्म की अनेक जन्म की मान्यता को स्थापित करती है. यही नहीं, त्रिदेवों(ब्रह्मा, शिव और विष्णु) और देवताऑ की सत्ता को भी सिद्द करती है. ओशोधारा में महाजीवन प्रज्ञा एवं धूनी चिकित्सा कार्यक्रमों में सहभागियों के अनुभव वैदिक ऋषियों एवं माइकेल न्यूटन द्वारा उदघाटित तथ्यों पर मुहर लगाते हैं.


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भक्ति दो प्रकार की है- गौणी भक्ति एवं परा भक्ति.गौणी भक्ति सकाम भक्ति है, अर्थात कामना पूर्ती के लिए की जाती है. पराभक्ति निष्काम भक्ति है, अर्थात यह अपने आप में आनंददायक है. गौणी भक्ति में देवी-देवताओं को इष्ट मानकर आराधना की जाती है. पराभक्ति में, निराकार सर्वव्यापी गोविन्द का सुमिरन किया जाता है. एक तीसरी भक्ति भी है, जिसे हम सहज भक्ति कह सकते हैं, जिसमें गौणी और परा, सकाम और निष्काम दोनों का मणिकांचन संयोग होता है. इसे वीतकाम भक्ति भी कह सकते हैं. जब कुछ चाहिए, तो देवताओं से जुडकर प्रार्थना कर लो. जब कुछ नहीं चाहिए, तो गोविन्द के सुमिरन में रहने का मज़ा ले लो.


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