मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 12


                        

सिद्धार्थ उपनिषद Page 12


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प्रेम मुख्यतः तीन प्रकार का होता है-सक्रिय(active),निष्क्रिय (passive)एवं स्थैतिक (static).सक्रिय प्रेम का अर्थ है कि मैं अपने प्रिय को प्रेम करता हूं.निष्क्रिय प्रेम का अर्थ है कि मेरा प्रिय मुझे प्रेम करता है.स्थैतिक प्रेम का मतलब है कि मैं अपने प्रिय के प्रेम में हूं.प्रेम हमारी स्थिति है.स्थैतिक परम ही श्रेष्ठतम प्रेम है.

(66)


हंस का अर्थ है आत्मा में,निराकार में,भीतर के मानसरोवर में स्थित होना.परमहंस का अर्थ है परमात्मा के सच्चिदानंद मंगलमय स्वरुप में लीन हो जाना.

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कामिल मुर्शिद का अर्थ है पूरा गुरु,समर्थ गुरु,जिसमें परमात्मा प्रकट हुआ है.जिसकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं रहा.जिसके लिए कबीर साहब कहते हैं--'करनी बिन कथनी कथे,गुरुपद लहै न सोय .
                                            बातों के पकवान से,धापा नाहीं कोय.'

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समय चैनल ने लगभग एक घंटे का 'ओशो-युगपुरुष'कार्यक्रम प्रसारित किया.मीडीया ओशो के प्रति सकारात्मक रुख अपना रहा है,यह शुभ है.लेकिन पूरे कार्यक्रम में न तो चैनल के रिपोर्टरों ने,न ही साक्षात्कार देने वालों ने ओशो के आध्यात्मिक योगदान पर कुछ भी कहा.ओशो के सांसारिक पक्ष पर ही पूरा कार्यक्रम केंद्रित रहा.

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संबोधि चार प्रकार की होती है-आत्म बोध,अद्वैत बोध,कैवल्य बोध एवं निर्वाण बोध.आत्म बोध का अर्थ है स्वयं को आत्मा के रूप में जानना और उससे तादात्म्य महसूस करना,जिसे हम ओशोधारा के सातवें तल के कार्यक्रम 'चैतन्य समाधी'में जानते हैं.अद्वैत बोध का अर्थ है परमात्मा के विस्तार के रूप में अपनी आत्मसत्ता का ज्ञान,जिसे हम ओशोधारा के १२ वें तल के कार्यक्रम 'अद्वैत समाधी'में जानते हैं.कैवल्य बोध का अर्थ है ब्रह्म को अपनी आत्मा के विस्तार के रूप में अनुभव करना,जिसे हम ओशोधारा के ११ वें तल के कार्यक्रम'कैवल्य समाधी'में जानते हैं.निर्वाण बोध का अर्थ हैं न अंश न पूर्ण,बल्कि परमानंद के रूप में एक ही सत्ता का बोध,जिसे हम ओशोधारा के १४ वें तल के कार्यक्रम'निर्वाण समाधी' में जानते हैं.निर्वाण को ओशो परम संबोधि (ultimate enlighenment)कहते हैं.संबोधि के आगे गोविन्द्पद तक की यात्रा है.


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