सोमवार, 30 दिसंबर 2013

सिद्धार्थ उपनिषद Page 73



सिद्धार्थ उपनिषद Page 73


(269)


तुम कहो कि जो प्राइमरी स्कूल में पढ़ा था, वो तो बहुत अच्छा लगा था.  हर बार आप स्कूल बदल देते हैं.  हर बार आप क्लास बदल देते हैं, तो प्रगाढ़ता नहीं आती. इस क्लास से उस क्लास, उस क्लास से उस क्लास.
अब तुम पहली ही क्लास में जिंदगी बिता दोगे, या आगे की क्लास करोगे बताओ.तो निश्चित आगे की क्लास करोगे तो course बदल जायेगा. वही-वही course पढाया जायेगा क्या ? वही बाबर का बेटा हुमांयु, हुमांयु का बेटा अकबर कब तक रटते रहोगे बताओ. कुछ आगे का करना है कि नहीं.

पहली क्लास में नाद का ज्ञान कराया जाता है. बंदा बोल रहा है वह तो ठीक लग रहा था.  अब आपने आगे नूर का बता दिया, उसके आगे अमृत का बता दिया,  उसके बाद उमंग और शक्ति,  ऊर्जा और स्वाद , दिव्य गंध, दिव्य खुमारी,  दिव्य मंगल.  दुनियां भर की झंझट खड़ी कर दी.  तुम कहोगे एक किलोमीटर जो चढाया था वो तो ठीक लगा था.  लेकिन किलोमीटर पर किलोमीटर...जिंदगी भर क्या आप चलाते रहोगे.  नहीं घबड़ाओ मत दो कोस और चलो.

नेतरहाट स्कूल में मै पढता था. तो मेरे क्लास टीचर ने कहा कि हम सब बूढाघाट झरना देखने चलेंगे.  हम लोग भी उत्साहित थे.  करीब 4-5 किलोमीटर हम लोग चले. एक गाँव वाले से पूंछा कि भई बूढाघाट झरना कितनी दूर है ?  उसने कहा 2 कोस. ( 2 कोस मतलब 4 mile = 6 k.m. ) हम लोग 5 किलोमीटर और चले.  फिर पूंछा - गाँव वाले ने कहा 2 कोस.  हमने कहा हद ही हो गई .  फिर भी मन-मानकर 5-6 किलोमीटर और चले. एक गाँव वाले से फिर पूंछा - कि भई बूढाघाट झरना कितनी दूर है ?  वह बोला बस 2 कोस .  अब सोंचो कि सुबह से चलते-चलते शाम हो गई और अभी भी बोल रहा है 2 कोस.  तो गाँव वालों को कहा कि तुम सब कितने झूंठे हो, जो बोलता है 2 कोस.  वो गाँव वाला हंसा और बोला -  इस बार असली 2 कोस.  हमने कहा बाकी जो कह रहे थे,  उसने कहा वे करुणा वान लोग थे. अगर वहीँ बोल देते 10 कोस तो तुम लोग वहीँ से लौट जाते.  तो समझ लेना इशारा !  मै कहूँगा 2 कोस और चलो.


Page    -    1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 
21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 
41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 
61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 
81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 
116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 
131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 
161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 
176 177 178 179 180 

सिद्धार्थ उपनिषद Page 72



सिद्धार्थ उपनिषद Page 72


(267)


अधिकतर सूफी non-veg होते हैं. इसलिए सूफी आत्मज्ञान को तो पा सकते हैं, परमपद को नहीं पा सकते. इसलिए किसी सूफी संत ने परमपद पाया हो यह बड़ा मुश्किल मामला है.
तुमको यह जानकार आश्चर्य होगा कि स्वयं मोहम्मद साहब non-veg नहीं खाते थे. लेकिन अधिकतर सूफी  non-veg खाते हैं, ये बात भी ठीक है. और तुमको ये भी जानकर आश्चर्य होगा कि अधिकतर सूफी घट (अंतराकाश) की ही साधना करते हैं.

'लोग दयरो हरम के मोहताज हैं, कुछ सयाने घट में उलझे क्या करें.'
अधिकतर लोग तो मंदिर और मस्जिद, बस पंडित की दौड़ मंदिर तक, मियां की दौड़ मस्जिद तक. लेकिन कुछ सयाने लोग.. प्रज्ञावान लोग हैं, साधक वर्ग के लोग हैं. वो भी घट में उलझ गए - नाद में, नूर में, अमृत में, चैतन्य में, आनंद में,घट के भीतर जो निराकार है उसमें उलझ गए. 

" लोग दयरो हरम के मोहताज हैं, कुछ सयाने घट में उलझे क्या करें.'
   मेरे मुर्शिद ने कहा 'सिद्धार्थ'सुन, आसमां खुद है खुदा क्या करें."

(268)


इस आकाश में परमात्मा..ओशो एक गजब की बात कहते हैं - 'जिसने आकाश में जीवंतता को देखा, जिसने आकाश में चैतन्यता को देखा. उसी ने परमात्मा को पहचाना, शेष कोई परमात्मा को नहीं जानता .
घट में तुमने परमात्मा का दीदार कर लिया , तो आत्मा का दीदार घट में होता है. परमात्मा का दीदार घट में नहीं होता है. रवीन्द्रनाथ ने कहा था -,
'Chirodin tomar akash
Tomar batash,
Amar prane
Bajae bãsh'
तो सूफियों को आकाश में परमात्मा नजर आता ही नहीं. जो non-veg खाते हैं उनसे परमात्मा पर्दा कर लेता है. अगर तुमने non-veg खाया तो परमात्मा का एक पर्दा डल गया. फिर भी इतना माफ कर देता है घट तक.  घट में देख सकते हो.  बाहर (बहिराकाश में) नहीं देख सकते हो.  तुम्हारी आँखों पर पर्दा डाल दिया जाता है.
 लेकिन ओशोधारा में आ गए हो तो हम non-veg बंद करा देतें हैं, करुणा से.  ताकि तुम घट के अंदर नहीं,  घट के बाहर भी उसका दीदार कर सको.


Page    -    1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 
21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 
41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 
61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 
81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 
116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 
131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 
161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 
176 177 178 179 180