आंखों से सुनना - ओशो
आंखों से सुनना - ओशो
एक भिक्षु ने अपने गुरु को पूछा, “मैंने सुना है कि समस्त बुद्ध और समस्त बुद्धों के धर्म एक ही संक्षिप्त सूत्र से पैदा हुए हैं। वह सूत्र क्या है?”
सद्गुरु ने कहा, “वह सदा घूमता रहता है, सदा प्रवाहमान है। उसे पकड़ा नहीं जा सकता। वह ठहरता नहीं, वह सदा गतिमान है। उसे रोका नहीं जा सकता और कोई तर्कों के द्वारा भी उसे पकड़ा नहीं जा सकता। कोई शब्द उसे प्रकट करने में समर्थ भी नहीं हैं।”
स्वभावतः भिक्षु ने पूछा, “तब मैं उसे किस तरह ग्रहण करूं? किस तरह आत्मसात करूं? किस तरह उसे भीतर संभालूं? कैसे उसे अपनी आत्मा में वास करने को पुकारूं?”
सद्गुरु हंसा और उसने कहा, “यदि तुम उसे स्वीकार करना, ग्रहण करना और अपने भीतर बसा लेना चाहते हो, तो तुम्हें एक कला सीखनी होगी।”
“कानों से सुनना तुम जानते हो, अब तुम्हें आंखों से सुनना सीखना पड़ेगा।”
आंखों से सुनना!
चेतना की एक नई दृष्टि का जब जन्म होता है, तो बेचैनी भी होती है, परेशानी भी होती है। क्योंकि सब पुराना अस्तव्यस्त हो जाता है। फिर पुराने से कोई समायोजन नहीं रह जाता।
नई दृष्टि का आविर्भाव एक अराजकता पैदा करता है।
नई दृष्टि के साथ नए जीवन की शुरुआत है—नई आत्मा की।
- ओशो
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