परमात्मा किसकी सुने? - ओशो
परमात्मा किसकी सुने? - ओशो
मैंने सुना है कि पहले परमात्मा यहीं जमीन पर रहता था। बीच बाजार में ही रहता था। मगर लोगों ने उसे बहुत परेशान कर दिया।
लोग सुबह से शाम तक कतार लगाए उसके सामने खड़े रहते। रात में भी उसे जगाकर कहते, “इस वक्त ऐसा होना चाहिए, इस वक्त ऐसा होना चाहिए।”
एक आदमी कहता, “आज पानी गिराओ!”
दूसरा उसी वक्त आकर कहता, “आज पानी मत गिराना, आज मैंने घड़े बनाए हैं, सूख जाने दो!”
एक कहता, “आज मैंने खेत में बीज डाले हैं, पानी गिराओ।”
और कोई कहता, “धूप निकालो, आज कपड़े सुखाने हैं।”
घबड़ा गया होगा, पागल हो गया होगा! भाग खड़ा हुआ।
तब से लौटकर नहीं देखा उसने यहां।
और जहां-जहां आदमी पहुंच जाता है, वहां से वह भाग जाता है। यहां से गया तो हिमालय पर रहने लगा। फिर आदमी हिमालय पहुंच गया, उसने हिमालय छोड़ दिया। फिर वह चांद पर रहने लगा।
अब आदमी चांद पर पहुंच गया, उसने चांद छोड़ दिया।
तुम यह मत सोचना कि चांद पर वह रहता नहीं था—रहता था। तुम्हारे पहुंचने की वजह से भाग गया।
तुम जहां जाओगे, वहीं से वह भाग जाएगा। वह तुमसे डरता है।
तुम ऐसे सवाल उठाते हो कि परमात्मा भी सोचता होगा—आखिर किसकी सुनूं?
- ओशो
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