आदत का बंधन - ओशो
आदत का बंधन - ओशो
मैंने सुना है कि महाराष्ट्र के एक संत, एकनाथ, यात्रा पर जाते थे तो गांव के बहुत लोग उनके साथ जा रहे थे। उन दिनों यही रिवाज था कि अगर तीर्थयात्रा पर भी जाना हो तो किसी संत के साथ जाना।
क्योंकि संत के साथ जाओगे तो ही तीर्थ पहुंचोगे। अकेले चले जाओगे, तीर्थ आ भी जाएगा, मगर तुम पहुंचोगे नहीं, क्योंकि तुम्हें तीर्थ का कुछ पता नहीं है। जो पहुंच गया हो तीर्थ, उसके साथ तीर्थयात्रा पर लोग जाते थे।
तो गांव के बहुत लोग एकनाथ के साथ हो लिए। गांव का एक चोर भी साथ जाना चाहता था—जाहिर चोर। छोटे गांव जब थे दुनिया में तो सभी चीजें जाहिर थीं कि कौन चोर है, कौन जुआरी है, कौन शराबी है। छोटे गांव में बचा क्या और छिपा क्या?
मैं एक बहुत छोटे-से गांव में पैदा हुआ। बचपन में अपने नाना के घर रहा। इतना छोटा गांव था कि मुश्किल से कोई ढाई सौ-तीन सौ आदमी थे। सब एक-दूसरे से परिचित थे।
एक रात एक चोर घुस आया। मुझे भलीभांति याद है, मेरे नाना को दिन-रात पान चबाने की आदत थी। छोटा-सा घर था। उन्होंने मुझे भी उठा लिया, मुझसे बात करने लगे। मेरी नानी को भी उठा लिया और पान लगाकर, चबा-चबाकर थूकने लगे।
वह चोर एक कोने में बैठा था और वे उसी की तरफ थूक रहे थे। जब चोर की बरदाश्त के बाहर हो गया, तो वह भाग गया।
दूसरे दिन सुबह वह उनकी दुकान पर आया और बोला, “खूब किया! सारी कमीज खराब कर दी!”
छोटा गांव था। चोर भी जानता था, साहूकार भी जानते थे कि कौन कहां है और कौन क्या कर रहा है।
वह कह भी गया, “हद कर दी! चोरी का तो मौका ही नहीं दिया। रात भर तुम जागते ही रहे और मेरी कमीज भी खराब कर दी।”
मेरे नाना ने उससे कहा, “कोई फिक्र न करो, कमीज तुम यहां से दूसरी ले जाना। मगर सोच-समझकर आया करो! कहां आ गए? थोड़ा खयाल रखा करो।”
वह चोर भी एकनाथ के साथ जाना चाहता था। उसने कहा, “मैं भी चलूंगा।”
एकनाथ ने कहा, “भाई, तेरी आदत पुरानी है। तू अपनी आदत से चूकेगा नहीं। हम तुझे भलीभांति जानते हैं। तू भाई न ही जा तो अच्छा। कई लोग जत्थे में होंगे और तू चीजें चुराएगा, परेशानी खड़ी होगी। लंबी यात्रा है, फिर तुझे बीच से भेज भी नहीं सकेंगे। लोग शिकायत भी करेंगे।”
लेकिन उस चोर ने कहा, “मैं कसम खाता हूं कि यात्रा शुरू होने के दिन से लेकर जिस दिन यात्रा समाप्त होगी, तब तक चोरी नहीं करूंगा। आगे की मैं नहीं कहता। मगर यात्रा में चोरी नहीं करूंगा। आप मेरा वचन स्वीकार करें।”
एकनाथ ने कहा, “ठीक है।”
दिन अच्छे थे वे। अब तो तुम साहूकार के वचन का भी भरोसा नहीं कर सकते, तब चोर के वचन का भी भरोसा किया जा सकता था। तब डाकुओं में भी एक भलापन होता था, अब भले आदमियों में भी डाकू दिखाई पड़ते हैं।
चोर ने अपने वचन का पालन किया। महीनों लगे यात्रा में, लेकिन उसने चोरी नहीं की।
लेकिन एक उपद्रव शुरू हो गया। एक आदमी के बिस्तर की चीजें दूसरे आदमी के बिस्तर में मिलने लगीं। किसी के संदूक की चीजें किसी और के संदूक में मिलने लगीं।
एकनाथ को शक हुआ। उन्होंने उससे पूछा, “भाई, तू कुछ कर तो नहीं रहा है?”
उसने कहा, “देखिए, आपसे मैंने कहा था कि चोरी नहीं करूंगा, सो मैं चोरी नहीं कर रहा हूं। लेकिन मेरा अभ्यास तो मुझे जारी रखना पड़ेगा। रात मुझे नींद ही नहीं आती।”
“तो मैं चुराता नहीं हूं। इसके खीसे से निकालकर उसके खीसे में रख देता हूं। तब मुझसे राहत मिलती है। फिर मैं निश्चित हो जाता हूं। दो-तीन बजे रात को कुछ काम कर लेता हूं, तब सो जाता हूं।”
“अब इसमें आप बाधा मत दीजिए। चीजें मिल ही जाएंगी, सभी यहीं हैं, कोई कहीं जाता नहीं है। मगर लौटकर फिर मुझे अपना चोरी का काम तो करना ही पड़ेगा, इसलिए अभ्यास भी जरूरी है।”
उस चोर ने कहा, “देखो, आप भी रोज भगवान की प्रार्थना करते हैं कि नहीं? ऐसे ही मेरा यह काम है।”
- ओशो
.jpg)
कोई टिप्पणी नहीं