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    एक सीधा सत्य - ओशो

     

    A simple truth - Osho

    एक सीधा सत्य - ओशो 

    एक धर्म गुरु ने एक रात एक सपना देखा। सपने में उसने देखा कि वह स्वर्ग के द्वार पर पहुंच गया है। जीवनभर उस स्वर्ग की ही बातें की थीं और जीवनभर स्वर्ग का रास्ता क्या है, यह लोगों को बताया था। उसे निश्चित था कि जब मैं स्वर्ग के द्वार पर पहूंचूंगा तो स्वयं परमात्मा मेरे स्वागत को तैयार रहेंगे। लेकिन वहां द्वार प र तो कोई भी नहीं था। द्वार खुला भी नहीं था, बंद था। द्वार इतना बड़ा था कि उ सके ओर छोर को देख पाना संभव नहीं था। उस विशाल द्वार के समक्ष खड़े होकर, वह एक छोटी चींटी जैसा मालूम होने लगा। उसके द्वार को बहुत खटखटाया, लेकिन उस विशाल द्वार पर, उस छोटे से आदमी की आवाजें भी पैदा हुई या नहीं, इस का पता चलना तक कठिन था। 

            वह बहुत डर गया। निरंतर उसने यही कहा था कि परमात्मा ने, अपनी ही शक्ल में, आदमी को बनाया और आज इस विराट द्वार के समक्ष, खड़े होकर वह इतना छोटा मालूम होने लगा । बहुत चिल्लाने , बहुत द्वार पीटने पर, द्वार से कोई एक छोटी खिड़की खुली और ि कसी ने झांका। जिसने झांका था, उसकी हजार आंखें होंगी और इतनी तेज रोशनी थी उन आंखों की कि वह धर्मगुरु दीवाल के एक छोटे से कोने में सरक गया। इतन | डर गया और चिल्लाया कि आप कृपा कर चेहरा भीतर रखें। हे परमात्मा! आप चेहरा भीतर रखें, मैं बहुत डर गया हूं। उस हजार आंखों वाले व्यक्ति ने कहा, मैं परमात्मा नहीं हूं, मैं तो यहां का पहरेदार हूं, द्वारपाल हूं। तुम कहां हो ? मुझे दिखाई नहीं पड़ते, तुम कितने छोटे हो और कहां छिप गए हो। उस धर्मगुरु ने चिल्ला कर कहा कि मैं परमात्मा के दर्शन करना चाहता हूं और स्वर्ग में प्रवेश पाना चाहत । हूं। 

            उस द्वारपाल ने पूछा, तुम हो कौन और कहां से आए हो? उसने कहा, क्या आपको पता नहीं? मैं एक धर्मगुरु हूं और पृथ्वी से आ रहा हूं। उस हजार आंखों व ले आदमी ने कहा, पृथ्वी! यह कहां है? यह धर्मगुरु हैरान हुआ, कहा, तुम्हें पृथ्वी का भी पता नहीं? उस हजार आंखों वाले ने कहा कि किसी यूनिवर्स में? तुम किस विश्व की, पृथ्वी की बात कर रहे हो? करोड़ों यूनिवर्स हैं, करोड़ों विश्व हैं। प्रत्ये क विश्व के करोड़ों सूरज हैं, प्रत्येक सूरज की अपनी पृथ्वीयां हैं। तुम किसी पृथ्वी की बात करते हो? क्या नंबर है तुम्हारी पृथ्वी का, क्या इंडेक्स नंबर है? उसे तो कुछ पता नहीं था। उसने कहा कि हम तो एक ही विश्व को जानते हैं और एक ही सूरज को। और हमने इसलिए उनका कोई नाम नहीं रखा, कोई नंबर नहीं रखा। उस पहरेदार ने कहा, तब बहुत मुश्किल है पता लगाना कि तुम कहां से आ रहे हो । पहली बार ही इस द्वार पर पृथ्वी का नाम सुना गया है और मनुष्य शब्द भी पह ली बार ही मेरे कानों में पड़ा है। उस धर्मगुरु के तो प्राण बैठ गए, सोचा था, परमात्मा द्वार पर स्वागत को मिलेंगे। यहां तो इसका भी कोई पता नहीं है कि जिस पृथ्वी से वह आ रहा है वह कहां है। 

            फिर भी उस पहरेदार ने कहा, तुम निश्चित रहो, मैं अभी पूछताछ करवाता हूं। थो. डा समय तो लग जाएगा, उस भवन में खोज करवाता हूं कि तुम किस पृथ्वी की ब तें करते हो, जहां सारी पृथ्वियों के संबंध में, हमारे पास आंकड़े इक्वे हैं, नक्शे हैं, लेकिन कुछ महीने लग जाएंगे। इसके पहले तो पता लगना कठिन है कि तुम कहां से आते हो, किस जाति के हो और तुम्हारा यहां आने का क्या प्रयोजन है। उसने कहा कि मैं परमात्मा के दर्शन करना चाहता हूं। उस पहरेदार ने कहा, अनंत वर्ष हो गए, मुझे इस द्वार पर। अभी तो मैं भी परमात्मा के दर्शन नहीं कर पाया। और अब तक मैं ऐसे व्यक्ति से भी हनीं मिला हूं, इस स्वर्ग के द्वार पर, जिसने परमात मा के दर्शन किए हों। परमात्मा की पूरी सृष्टि को ही जान लेना कठिन है। परमात मा का जानना तो और भी कठिन है। वह तो समग्रता का ही नाम है। घबराहट में उस धर्मगुरु की नींद टूट गयी। वह पसीने से लथपथ था। घबरा गया थ T। फिर रातभर उसे नींद नहीं आ सकी। वह बार-बार यही सोचता रहा कि कहीं मनुष्य ने, अपने अहंकार के ही प्रभाव में तो यह सारी बातें नहीं सोच ली हैं कि प रमात्मा ने आदमी को अपनी ही शक्ल में बनाया और परमात्मा आदमी से मिलने को उत्सुक है, पुकार रहा है और स्वर्ग के द्वार और मोक्ष यह कहीं मनुष्य ने अपने ही मन की कल्पनाएं तो नहीं खड़ी कर ली हैं? 

            इसी कहानी से, इसलिए मैं शुरू करना चाहता हूं, धर्मगुरु के इस सपने से कि आद मी एक बहुत बड़े भ्रम लोक में जीता है। वह स्वयं को न जाने क्या-क्या समझ लेत । है, जब कि इस विराट विश्व के किसी कोने में, उसका कोई अस्तित्व नहीं है। इस विश्व की विराटता को हम अनुभव करें और फिर उसके सामने अपने को खड़ा करें तो हम कहां रह जाते हैं, हम कहां हैं? यह पृथ्वी बहुत छोटी है। हमारा सूरज इस पृथ्वी से साठ हजार गुना बड़ा है। और यह सूरज, जितने सूरज हम जानते हैं, उनमें सबसे छोटा है। और कोई दो अरब सूरज जान लिए गए हैं और प्रत्येक सूरज का अपना विस्तार है। ये दो अरब सूरज ही समाप्ति नहीं हैं, उनके आगे भी विश व होगा, उसके आगे भी विस्तार होगा, उसके आगे भी फैलाव होगा। इतने अनंत िवश्व के एक छोटी सी पृथ्वी के कोने पर, छोटा सा प्राणी है मनुष्य। उसकी भी को ई बहुत बड़ी संख्या नहीं है। कोई साढ़े तीन अरब उसकी संख्या है। अगर हम और प्राणियों की संख्या के हिसाब से विचार करेंगे तो पाएंगे, वह कहीं भी नहीं है। और । छोटे-छोटे प्राणी हैं, उनकी संख्या अनंत है। उसमें छोटी सी संख्या का यह मनुष्य है

            मनुष्य का यह जो ह्यूमन कार्नर है, यह तो छोटा सा कोना है, इस जगत में हम अ पने को न मालूम क्या समझ बैठे हैं। अपने को न मालूम क्या सोच बैठे हैं। यह मनुष य भी बहुत थोड़े से दिन जिता है कोई सत्तर अस्सी वर्ष, ज्यादा से ज्यादा सौ वर्ष । इस अनंत विश्व के विस्तार में सौ वर्ष की कोई गणना नहीं, कोई कीमत नहीं, क ई जगह नहीं। पृथ्वी को बने ही कोई दो अरब वर्ष हो गए और पृथ्वी बहुत नया आगमन है जगत में। अरबों खरबों वर्ष पीछे है। उनकी शृंखला का कोई अंत नहीं।

            उतना ही समय आगे, अनंत, इटर्नल, कोई अंत नहीं। उसमें एक छोटे से क्षण मग एक आदमी जी लेता है और न मालूम क्या सोच लेता है। स्पेस के खयाल से भी आदमी ना कुछ है, टाइम के खयाल से भी आदमी ना कुछ है।धार्मिक व्यक्ति मैं उसे कहता हूं, जो अपने अपने इस ना कुछ होने के अनुभव को उपलब्ध हो जाता है। लेकिन धार्मिक व्यक्ति की कथा उलटी रही है। धार्मिक घोषण [ करता है, अहं ब्रह्मास्मि, मैं ब्रह्म , मैं हूं ईश्वर, मैं हूं आत्मा, मैं हूं अनंत आत्मा, मैं हूं मोक्ष का अधिकारी, मैं यह हूं, मैं वह हूं! धार्मिक व्यक्ति इन बातों की घोषणा करता है! 

            ऐसे व्यक्ति को मैं धार्मिक नहीं कहता धार्मिक व्यक्ति वह है जो अपनी इस नथिंगनेस को, ना कुछ होने को अनुभव कर ले। जिस दिन यह ना कुछ होना अनुभव हो जाता है, उसी दिन जीवन के बंद द्वार खुल जाते हैं और सब कुछ होने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। लेकिन ना कुछ होने का अनुभव अत्यंत प्राथमिक है। बलकुल पहली सीढ़ी है कि हम जानें कि हम कुछ भी नहीं हैं। लेकिन यह हमें पता लगना कठिन हो जाता है, क्योंकि हम मनुष्यों के बीच में जीते हैं। हम सबका भ्रम चूंकि समान है, इसलिए उस भ्रम का कभी खंडन नहीं होता। हम सब एक दूसरे के भ्रम के पोषक बनते चले जाते हैं।

    - ओशो 

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