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    प्रश्नों का विसर्जित हो जाना ध्यान है - ओशो

    Dissolving questions is meditation - Osho


    प्रश्नों का विसर्जित हो जाना ध्यान है - ओशो 

    जिसको मैं ध्यान कह रहा हूं, वह प्रश्नों को विसर्जित करने की दिशा है। प्रश्न है, कयोंकि विचार है। प्रश्न है, क्योंकि चित्त में विचार हैं। अगर विचार न रह जाए तो प्रश्न भी नहीं रह जाएंगे। निर्विचार चित्त में कौन सा प्रश्न उठेगा और कैसे उठेगा? प्रश्न का ढांचा तो विचार से बंधा है। अगर विचार शून्य हो जाए चित्त में तो कोई प्रश्न न उठेगा, कोई जिज्ञासा जाग्रत न होगी। उस शांत क्षण में, जहां कोई जिज्ञासा, कोई प्रश्न नहीं उठ रहा, कुछ अनुभव होगा। जहां विचार नहीं रह जाते, वहां अनुभव का कारण होता है। जहां तक विचार हैं, वहां तक अनुभव का कारण नहीं होता। जहां विचार निःशेष हो जाते हैं, वहां भा व का जागरण होता है, वहां दर्शन का प्रारंभ होता है। विचार पर्दे की तरह हमारे चित्त को घेरे हुए हैं। विचार में हम इतने तल्लीन हैं, इतने आकुपाइड हैं, इतने व्यवस्था हैं कि विचार के अतिरिक्त जो पीछे खड़ा है, उसे देखने का अंतराल, उसे देखने का रिक्त स्थान नहीं मिलता। विचार में अत्यंत आकुपाइड होने, अत्यंत व्यस्त होने, अत्यंत संलग्न होने के कारण पूरा जीवन उन्हीं में चिंतन रहते हुए बीत जाता है। उनके पार कौन खड़ा है, इसकी झलक भी नहीं मिलती। 

            इसलिए ध्यान का अ र्थ है, पूरी तरह अनआकृपाइड हो जाना, व्यस्तता से रहित हो जाना। तो हम अरिहंत-अरिहंत का स्मरण करें, राम-राम का स्मरण करें तो वह तो आकु पेशन ही होगा। वह तो फिर एक व्यस्तता हो जाएगी। वह तो एक काम हो गया। अगर हम कृष्ण की मूर्ति या महावीर की मूर्ति का स्मरण करें, उनके रूप का स्मर ण करें तो वह भी व्यस्तता है।वह ध्यान नहीं होगा। कोई नाम, कोई रूप, कोई प्रति मा, अगर हम चित्त में स्थापित करें तो वह भी विचार हो गया, क्योंकि विचार के सिवाय चित्त में कुछ और स्थिर नहीं होता। चाहे वह विचार भगवान का हो, चाहे सामान्य काम का हो, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। चित्त विचार से भरता है। चित्त __ को निर्विचार, चित्त को अनआकृपाइड छोड़ देना ही ध्यान है।

    - ओशो 

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