गुरुवार, 18 सितंबर 2014

विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 97

 [ " अंतरिक्ष को अपना ही आनंद शरीर मानों . " ]


लेकिन यह तुम कैसे महसूस करोगे ? तुम्हें तो पता ही नहीं कि आनंद क्या है तो तुम उसकी कल्पना कैसे करोगे ? यह बेहतर होगा कि तुम पहले यह अनुभव करो कि पूरा आकाश मौन से भर गया है , आनंद से नहीं . आकाश को मौन से भरा हुआ अनुभव करो . और प्रकृति उसमें सहयोग देगी , क्योंकि प्रकृति में ध्वनियां भी मौन ही होती हैं . शहरों में तो मौन भी शोर से भरा होता है . प्राकृतिक ध्वनियां मौन होती हैं , क्योंकि वे विघ्न नहीं  डालतीं  , वे लयबद्ध होती हैं . तो ऐसा मत सोचो कि मौन अनिवार्य रूप से ध्वनि का अभाव है . नहीं , एक संगीतमय ध्वनि मौन हो सकती है , क्योंकि वह इतनी लयबद्ध है कि वह तुम्हें विचलित नहीं करती बल्कि वह तुम्हारे मौन को गहराती है .
       तो जब तुम प्रकृति में जाते हो तो बहती हुई हवा के झोंके , झरने , नदी या और भी जो ध्वनियां हैं वे लयबद्ध होती हैं , वे एक पूर्ण का निर्माण करती हैं , वे बाधा नहीं डालतीं . उन्हें सुनने से तुम्हारा मौन गहरा हो सकता है . तो पहले महसूस करो कि सारा आकाश मौन से भर गया है ; गहरे से गहरे अनुभव करो कि आकाश और शांत होता जा रहा है , कि आकाश ने मौन बनकर तुम्हें घेर लिया है . और जब तुम्हें लगे कि आकाश मौन से भर गया है , केवल तभी आनंद से भरने का प्रयास करना चाहिए . जैसे-जैसे मौन गहराएगा तुम्हें आनंद की पहली झलक मिलेगी .


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